ईरान पर इसराइल और अमेरिका के संयुक्त हमले जारी हैं. वहीं ईरान भी जवाबी कार्रवाई कर रहा है.
इस दौरान दुनिया की नज़र सिर्फ़ इन हमलों की बढ़ती व्यापकता पर नहीं है.
दुनिया की नज़रें इस बात पर भी टिकी हैं कि कौन से देश इसराइल-अमेरिका का खुलकर समर्थन कर रहे हैं और किन देशों ने संकट की इस घड़ी में ईरान के साथ खड़े रहने का फ़ैसला किया है.
हर बयान, हर सैन्य कदम और हर कूटनीतिक संकेत को सावधानी से परखा जा रहा है. ख़ासकर उन देशों के जिनके रिश्ते ईरान के साथ मज़बूत माने जाते हैं, जैसे चीन.
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चीन ने ईरान पर हुए इसराइली और अमेरिकी हमलों को 'संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के ख़िलाफ़' बताया है.
चीन के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है, "ईरान के सर्वोच्च नेता पर हमला और उनकी हत्या, ईरान की संप्रभुता और सुरक्षा का गंभीर उल्लंघन है."
"यह क़दम संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों, अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी नियमों के विरुद्ध है. चीन इसका सख़्त विरोध और कड़ी निंदा करता है."
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चीन ने शांति बनाए रखने की अपील की है.
चीन ने कहा, "हम तुरंत सैन्य कार्रवाई रोकने, तनावपूर्ण हालात को और न बढ़ाने की अपील करते हैं. साथ ही मध्य पूर्व और पूरी दुनिया में शांति और स्थिरता बनाए रखने की अपील करते हैं."
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चीन ने अपनी प्रतिक्रिया में कहीं भी इसराइल या अमेरिका के ख़िलाफ़ कड़े शब्दों का प्रयोग नहीं किया है.
चीन के इस रुख़ की क्या वजह है? विशेषज्ञ और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार इसके पीछे के कारणों को समझाते हुए लेख लिख रहे हैं.
इन वजहों को विस्तार से समझने से पहले ये जान लेते हैं कि पिछले साल जून महीने में जब ईरान, इसराइल और अमेरिका के बीच ऐसे ही हालात पैदा हुए थे, तब चीन ने कैसे और किन शब्दों में प्रतिक्रिया दी थी.
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बीते साल ईरान पर हुए हमले के बाद चीन ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा था कि इसराइल ने 'रेड लाइन क्रॉस की है.'
इसके एक दिन बाद 14 जून को शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) ने बयान जारी कर ईरान पर इसराइली हमले की निंदा की थी.
15 जून को चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराग़ची से बात की थी.
चीनी विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर इसे ईरान की संप्रभुता, सुरक्षा और क्षेत्र की एकता का उल्लंघन बताया था. साथ ही, ईरानी अधिकारियों को निशाना बनाकर किए गए हमले और आम लोगों की मौत की कड़ी निंदा की थी.
अपने बयान में चीन ने कहा था, "इसराइल की ये हरकतें संयुक्त राष्ट्र के नियमों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी सिद्धांतों के ख़िलाफ़ हैं. ख़ासतौर पर इसराइल का ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला करना बहुत ख़तरनाक है और इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं."
यानी, अगर पीछे मुड़कर देखें तो बीते साल भी चीन की प्रतिक्रिया में कोई बड़ा बदलाव नज़र नहीं आया था.
यही कारण है कि बीते साल भी यह सवाल चर्चा का विषय बना था कि आख़िर चीन ने इतनी संतुलित प्रतिक्रिया क्यों दी.
तब नई दिल्ली स्थित स्वतंत्र थिंक टैंक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में विशिष्ट फ़ेलो मनोज जोशी ने अपने एक लेख में लिखा था कि ईरान के साथ मज़बूत रिश्ते होते हुए भी चीन सावधानी भरा और संतुलित रुख़ अपना रहा है.
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अब हालिया हुए हमलों के बाद लंदन में विदेश मामलों के थिंक टैंक चैटम हाउस में मिडिल ईस्ट एंड नॉर्थ अफ़्रीका प्रोग्राम में एसोसिएट फ़ेलो अहमद अबूदू ने चीन की संयमित प्रतिक्रिया पर लेख लिखा है.
वह लिखते हैं, ''ईरान पर इसराइल-अमेरिका के संयुक्त हमले को लेकर चीन ने जो प्रतिक्रिया दी है, उसे सुनकर कुछ लोगों को लग सकता है कि उसने ईरान का साथ छोड़ दिया है. या फिर मुश्किल समय में वह ईरान का एक भरोसेमंद साझेदार साबित नहीं हुआ है."
"लेकिन वेनेज़ुएला में जब अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई की मदद से वहां के तेल सेक्टर पर नियंत्रण कर लिया था और चीन के नज़दीकी सहयोगी निकोलस मादुरो को अगवा कर लिया, तब भी चीन ने कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं दी थी. तो चीन के लिए ये कोई नई बात नहीं है."
ईरान के संदर्भ में वह लिखते हैं, ''चीन ने हमेशा से ही ईरान को सीधा सैन्य समर्थन देने से परहेज़ किया है. 2025 के 12 दिन के युद्ध के दौरान भी चीन ने तेहरान को कोई असल सैन्य या बड़ी आर्थिक मदद नहीं दी थी.''
इसके पीछे वह दो प्रमुख कारण गिनाते हैं.
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अहमद अबूदू लिखते हैं कि चीन और ईरान व्यापक रणनीतिक साझेदार हैं, फिर भी साल 2015 के ईरान न्यूक्लियर डील (जेसीपीओए यानी जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन) से पहले चीन ने ईरान पर संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व वाले आर्थिक प्रतिबंधों का समर्थन किया था.
चीन खुलकर कहता है कि वह ईरान के परमाणु हथियार बनाने के ख़िलाफ़ है. चीन को चिंता है कि अगर ईरान परमाणु शक्ति बना, तो मध्य-पूर्व में बड़ा युद्ध छिड़ सकता है.
ऐसा हुआ तो खाड़ी क्षेत्र के अहम समुद्री रास्ते बंद हो सकते हैं, जिससे चीन के तेल आयात पर तो असर पड़ेगा ही साथ ही खाड़ी के देशों में उसके आर्थिक हितों को भी नुक़सान पहुंचेगा.
साथ ही अगर ईरान परमाणु शक्ति बना, तो चीन के दूसरे प्रतिद्वंद्वी जैसे जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया में भी परमाणु हथियार बनाने की होड़ बढ़ेगी और चीन के लिए नई सुरक्षा चुनौती खड़ी हो जाएगी.
हालांकि, वह इस बात का समर्थक है कि परमाणु अप्रसार संधि के सदस्य देश के रूप में ईरान को शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा इस्तेमाल करने का अधिकार है.
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दूसरे कारण को रेखांकित करते हुए वह लिखते हैं, चीन ईरान में एक कमज़ोर शासन को अपने लिए ख़तरे के साथ-साथ मौक़े के रूप में भी देखता है.
वह नहीं चाहता कि यहां कोई पश्चिम समर्थक सरकार आए, लेकिन मौजूदा शासन के कमज़ोर होने का फ़ायदा उठाकर वह ईरान को अपने ऊपर और अधिक निर्भर बना सकता है.
चीन की कोशिश यह भी है कि वह अपने लंबे रणनीतिक लक्ष्यों को हासिल करे, लेकिन ऐसा करते हुए अमेरिका को सीधे तौर पर नाराज़ भी न करे.
वह चाहता है कि दोनों देशों के रिश्तों में एक संतुलन और स्थिरता बनी रहे. ख़ासकर ऐसे समय में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अप्रैल में चीन यात्रा की संभावना जताई जा रही है.
चार फ़रवरी को ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच फ़ोन पर बातचीत हुई, जिसमें ईरान, ताइवान और व्यापार जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई.
इससे यह संकेत मिलता है कि चीन ईरान के मुद्दे पर अपेक्षाकृत नरम रुख़ अपनाकर, ताइवान और व्यापार जैसे अपने मूल हितों पर अमेरिका से कुछ रियायतें हासिल करने की रणनीति पर काम कर सकता है.
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नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में चीनी अध्ययन केंद्र में एसोसिएट प्रोफ़ेसर अरविंद येलेरी के मुताबिक़ चीन के लिए अब विदेश नीति से जुड़े फ़ैसले लेना पहले से ज़्यादा कठिन हो गया है.
वह कहते हैं, ''चीन एक ऐसी व्यवस्था से चलता है जहां सत्ता एक ही कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ में है. ऐसी व्यवस्था में विदेश नीति काफ़ी जटिल होती है."
"ईरान को लेकर चीन का रुख़ सिद्धांतों पर टिका दिखता है. वह बातचीत, संप्रभुता और स्थिरता पर ज़ोर देता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल सिद्धांतों पर जोर देने से क्षेत्रीय संकट सुलझते हैं?"
"पिछले 30–35 वर्षों में चीन खुद को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थक बताता आया है. उसने बार-बार कहा है कि वह अलग तरह की वैश्विक व्यवस्था चाहता है. लेकिन जब ऐसी जटिल स्थिति उभरती है, तो उसकी सक्रियता सीमित दिखती है."
"ईरान का मामला इसी सीमा को उजागर करता है, जहां उसके आर्थिक हित बड़े हैं, लेकिन राजनीतिक दखल अपेक्षाकृत कम."
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फ़िलहाल अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से जूझ रही ईरानी अर्थव्यवस्था के लिए चीन एक बड़ा सहारा है.
2025 में चीन ने ईरान के निर्यात किए गए तेल का सबसे बड़ा हिस्सा खरीदा. हालांकि, चीन को भी सस्ते दरों पर तेल मिले, तो फ़ायदा एक तरफ़ा नहीं रहा है.
लेकिन चीन ने हाल के वर्षों में ईरान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ने से बचाने की भी कोशिश की है. उसने उसे ब्रिक्स और एससीओ (शंघाई सहयोग संगठन) की सदस्यता दिलाने में समर्थन दिया.
साथ ही, दोनों देशों के बीच 2021 में 25 साल का रणनीतिक समझौता भी हुए था. अरविंद येलेरी के अनुसार चीन ईरान को बैलिस्टिक मिसाइल के पार्ट्स या ईंधन की सप्लाई भी करता रहा है. वहीं बैलिस्टिक मिसाइल की टेक्नोलॉजी में भी चीन ने मदद की है.
जबकि हथियार प्रसार रोधी प्रतिबंधों में सिर्फ़ परमाणु ही नहीं बल्कि बैलिस्टिक मिसाइलें भी आती हैं.
इन सबके बावजूद ऐसी परिस्थिति में जब ईरान सीधे सैन्य दबाव और क्षेत्रीय तनाव का सामना कर रहा है, चीन की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित और सतर्क दिखाई देती है. वह आर्थिक और कूटनीतिक सहयोग तो जारी रखता है, लेकिन किसी खुले सैन्य समर्थन या प्रत्यक्ष टकराव से दूरी बनाए रखता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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