पूरे अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप और उनकी नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन के बावजूद युद्ध के मोर्चे पर किसी तरह की नरमी न दिखना दुखद और चिंताजनक है। डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में यह तीसरा देशव्यापी विरोध-प्रदर्शन था। बड़ी संख्या में ऐसे अमेरिकी हैं, जो अपने देश में राजा जैसा नेता नहीं चाहते। उन्होंने अपने विरोध-प्रदर्शन अभियान का नाम बेबाकी से ‘नो किंग्स’ रखा। अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ने ऐसे-ऐसे निर्णय लिए हैं, जिनसे खुद अमेरिका में तनाव और चिंता की स्थिति लगातार बनी हुई है। यह भी ध्यान देने की बात है कि ट्रंप और युद्ध के खिलाफ ऐसे प्रदर्शन दुनिया के किसी भी देश में नहीं देखे गए हैं। एक अनुमान के अनुसार, 3,000 से ज्यादा जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। लोकतंत्र तो यही कहता है कि इस प्रदर्शन का असर अमेरिकी राष्ट्रपति पर पड़ना चाहिए, लेकिन अफसोस की बात है कि ऐसे दो प्रदर्शन पहले हो चुके थे, मगर ट्रंप पर कोई असर नहीं हुआ था। अमेरिका में लोग चाहते हैं कि ट्रंप शासन-प्रशासन में किसी तरह की मनमानी से बचें और अमेरिका के वास्तविक हितों की रक्षा करें।
अमेरिका में हुए इन प्रदर्शनों में देश के आम लाेग ही नहीं, खास लोग भी शरीक रहे, पर उनकी आवाज भी अनसुनी कर दी गई। अनगिनत अमेरिकियों को शिकायत है कि उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों, मतदान के अधिकार पर हमले हो रहे हैं। अमेरिका में जीवन की लागत तेजी से बढ़ रही है। वहां लोग नहीं चाहते कि ट्रंप किसी तानाशाह की तरह शासन करें। अमेरिका में विरोध-प्रदर्शन का संदेश साफ है, लेकिन लोगों के हाथों में ज्यादा विकल्प नहीं हैं। सवा साल पहले डोनाल्ड ट्रंप को लोगों ने ही चुना है और उनका कार्यकाल अभी बहुत बाकी है। संकेत यही है कि ट्रंप इस युद्ध को जल्दी खत्म नहीं कर पाएंगे। यही कारण है, पेंटागन ईरान में कई हफ्तों के जमीनी अभियान की योजना बना रहा है, जिसमें खारग द्वीप और होर्मुज जलडमरूमध्य के पास तटीय क्षेत्रों पर कार्रवाई शामिल है। ईरान के आसपास 10,000 अतिरिक्त जमीनी सैनिकों को तैनात करने पर विचार किया जा रहा है। यह कहना चाहिए कि खाड़ी के देशों में जमीनी युद्ध बहुत घातक होते हैं और इसमें अमेरिका को भी भारी जान-माल की हानि होने की आशंका है। वैसे भी, जिस तरह की ईरान की मारक क्षमता है, उसमें अमेरिका की सैन्य उपस्थिति कितनी सुरक्षित होगी, कहना मुश्किल है। अमेरिका नुकसान के आंकड़े पेश नहीं कर रहा है, लेकिन माना जा रहा है कि अब तक इस युद्ध में उसके अनेक सैनिक मारे गए हैं और 300 से ज्यादा घायल हुए हैं।
अमेरिका के आक्रामक तेवर-कलेवर की वजह से दुनिया में चिंता फैल रही है। जो लोग अमेरिका के युद्धों को जानते हैं, उन्हें ज्यादा चिंता हो रही है। अमेरिकी जमीनी सेना को ईरान में तैनात किया जाता है, तो जोखिम कई गुना बढ़ जाएगा। अफगानिस्तान में जब अमेरिका ने हमला बोला था, तब वहां 2,400 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक मारे गए थे। इराक में जब हमला हुआ, तब 4,492 अमेरिकी सैनिक शहीद हुए थे। अमेरिका न अफगानिस्तान की जंग को पूरी तरह जीत पाया और न इराक में उसे विनाशकारी हथियार मिले। अमेरिका ने 2003 से 2012 के बीच युद्ध पर 728 अरब डॉलर खर्च किए, पर नतीजे मनमाफिक नहीं रहे। अमेरिकी नीतियों की वजह से ही इस्लामिक स्टेट खड़ा हुआ और तालिबान को भी मजबूती मिली। देखने वाली बात होगी कि समाधान के लिए निकला अमेरिका कहीं समस्या न बढ़ा दे।
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