आज बांग्लादेश में चुनाव, BNP-जमात में सीधी टक्कर; भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण? – Jagran

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गुरुवार को बांग्लादेश में होने वाले आम चुनाव के नतीजे सिर्फ ढाका की सत्ता नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की कूटनीतिक दिशा तय करेंगे। भारत की नजरें इन परिणाम …और पढ़ें
भारत नई चुनी हुई सरकार के साथ काम करने को तैयार (फाइल फोटो)
जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। गुरुवार को बांग्लादेश में होने वाले आम चुनाव के नतीजे सिर्फ ढाका की सत्ता का फैसला नहीं करेंगे, बल्कि पूरे क्षेत्र की कूटनीतिक दिशा और रणनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।
नई दिल्ली की नजरें खास तौर पर इन परिणामों पर टिकी हैं, क्योंकि संभावित सत्ता परिवर्तन भारत-बांग्लादेश संबंधों, सीमा सुरक्षा, पूर्वोत्तर की स्थिरता और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर दूरगामी असर डाल सकता है।
बीएनपी की संभावित वापसी, चीन और अमेरिका की बढ़ती सक्रियता तथा भारत के आर्थिक और सामरिक हित, इन सबके बीच यह चुनाव दक्षिण एशिया की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत साबित हो सकता है। यही वजह है कि जिस बेसब्री से इस चुनाव के परिणाम का इंतजार बांग्लादेश की जनता को है, नई दिल्ली में भी उससे कम नहीं है।
बांग्लादेश में अभी चुनाव का जो माहौल है, उसको लेकर जानकार यह मान रहे हैं कि बीएनपी ही सबसे प्रमुख दल के तौर पर सामने आने वाली है। पूर्व में जब बीएनपी की सरकार रही, तब भारत-बांग्लादेश संबंधों में खटास देखी गई थी। सीमापार उग्रवाद, अवैध घुसपैठ और सुरक्षा सहयोग जैसे मुद्दे विवाद का कारण बने थे।
लेकिन बीएनपी की नेत्री व पूर्व पीएम खालिदा जिया की मौत के बाद भारत ने इस बात के साफ संकेत दे दिए हैं कि वह मौजूदा माहौल में बांग्लादेश की इस सबसे बड़ी राजनीतिक दल के साथ तालमेल बैठाने को तैयार है।
खालिदा जिया के निधन पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर का ढाका जाना और भारतीय संसद में उनके प्रति शोक प्रस्ताव व्यक्त करना इसी कूटनीतिक लचीलेपन का संकेत माना जा रहा है। ढाका स्थित भारतीय उच्चायुक्त लगातार बीएनपी के नेताओं के साथ संपर्क में हैं। दूसरी बड़ी पार्टी इस बार चुनाव में जमाते-इस्लामी है। भारतीय उच्चायोग जमात के नेताओं के साथ भी संपर्क में है।
भारतीय विदेश मंत्रालय का रवैया बांग्लादेश को लेकर अब यह साफ हो चुका है कि चुनाव में चाहे जिसकी भी सरकार आये, वह उसके साथ संबंधों को आगे बढ़ाने को लेकर उसी जज्बे के साथ काम करेगी जैसा पूर्व पीएम शेख हसीना के कार्यकाल में किया जा रहा था।
बीएनपी और जमात नेताओं के साथ होने वाली मुलाकातों के बारे में विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है अभी तक उक्त दोनों दलों के नेताओं की तरफ से ऐसा कोई संकेत नहीं आया है कि वह भारत के साथ संबंधों की अहमियत को कमतर कर रहे हों।
देखा जाए तो जिस तरह से बांग्लादेश में चीन, पाकिस्तान और अमेरिका की एक साथ गहरी रुचि जगी है, उसको देखते हुए भारत के पास और दूसरा विकल्प नहीं है। बांग्लादेश व भारत के बीच 4,100 किलोमीटर लंबी सीमा है और पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम की सुरक्षा, व्यापार और सामाजिक स्थिरता सीधे तौर पर बांग्लादेश की आंतरिक स्थिति से जुड़ी हुई है।
ऐसे में ढाका में बनने वाली सरकार का रुख भारत के पूर्वोत्तर की सुरक्षा और स्थिरता पर सीधा असर डाल सकता है। शेख हसीना के कार्यकाल में भारत ने बांग्लादेश में बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, कनेक्टिविटी और रेल परियोजनाओं में बड़े निवेश किए। बिजली आपूर्ति, पेट्रोलियम पाइपलाइन, सड़क और जलमार्ग कनेक्टिविटी से दोनों देशों के रिश्तों को नई मजबूती मिली।
भारत यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि इन परियोजनाओं की निरंतरता और सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी। ये परियोजनाएं भारत के लिए सिर्फ आर्थिक निवेश का सवाल नहीं, बल्कि ‘नेबरहुड फ‌र्स्ट’ नीति की विश्वसनीयता का भी प्रश्न है।
अगर नई सरकार भारत विरोधी रुख अपनाती है या परियोजनाओं की समीक्षा करती है, तो इसका असर न केवल द्विपक्षीय व्यापार पर पड़ेगा बल्कि क्षेत्रीय संपर्क (कनेक्टिविटी) की व्यापक योजनाओं पर भी होगा।भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में लंबे समय तक सक्रिय रहे उग्रवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई में बांग्लादेश की पिछली सरकार ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया था।
अगर नई सरकार इस सहयोग को कम करती है या सीमा प्रबंधन ढीला पड़ता है, तो इसका असर भारत की आंतरिक सुरक्षा पर पड़ सकता है। अवैध आव्रजन, तस्करी और कट्टरपंथी नेटवर्क जैसी चुनौतियां फिर उभर सकती हैं। इसके साथ ही ई दिल्ली को उम्मीद है कि चुनी हुई सरकार इस रुझान को संस्थागत रूप नहीं देगी और द्विपक्षीय संबंधों को व्यवहारिकता के आधार पर आगे बढ़ाएगी।
भारत के लिए यह महत्वपूर्ण है कि ढाका में कोई भी सरकार उग्र राष्ट्रवाद या बाहरी शक्तियों के प्रभाव में आकर संतुलन न खोए। शेख हसीना को सत्ता से बेदखल करने के बाद प्रोफेसर मोहम्मद युनूस की अंतरिम सरकार के दौरान कुछ हलकों में भारत विरोधी बयानबाजी और भावनाओं का उभार देखा गया है।
बांग्लादेश पर वैश्विक शक्तियों की नजर भी इस चुनाव को और महत्वपूर्ण बना रही है। चीन पहले से ही बांग्लादेश में बुनियादी ढांचे और रक्षा सहयोग के जरिए अपनी उपस्थिति मजबूत कर चुका है। विश्लेषकों का मानना है कि बीजिंग बांग्लादेश को भारत पर परोक्ष दबाव बनाने के रणनीतिक मंच के रूप में देखता है, खासकर हिंद महासागर क्षेत्र में।
दूसरी ओर, अमेरिका की दिलचस्पी बंगाल की खाड़ी में स्थित सेंट मार्टिन द्वीप और व्यापक समुद्री सुरक्षा ढांचे से जुड़ी मानी जा रही है। हिंद-प्रशांत रणनीति के तहत वाशिंगटन इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाना चाहता है ताकि चीन की गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सके। ऐसे में ढाका की नई सरकार का झुकाव किस ओर रहता है, यह दक्षिण एशिया की सामरिक दिशा तय कर सकता है।
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