Iran vs USA: इस्लामाबाद में हुई हाई-लेवल US–Iran शांति वार्ता आखिरकार बिना किसी समझौते के खत्म हो गई। करीब 21 घंटे चली इस बातचीत से उम्मीद थी कि 40 दिन चले युद्ध के बाद स्थायी शांति का रास्ता निकलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जहां अमेरिका ने कहा कि ईरान ने उसकी शर्तें नहीं मानीं, वहीं ईरान ने सीधा आरोप लगाया-“US वो सब मांग रहा था, जो वो युद्ध से हासिल नहीं कर पाया।” यही टकराव इस पूरी बातचीत की सबसे बड़ी वजह बन गया।
ईरान का साफ कहना है कि अमेरिका ने बातचीत में ऐसी शर्तें रखीं जो एकतरफा थीं। तेहरान के मुताबिक, Washington उन चीजों को टेबल पर हासिल करना चाहता था, जो वह युद्ध के दौरान नहीं कर पाया। इसलिए ईरान ने सीधा “NO” कह दिया और बातचीत वहीं खत्म हो गई।
स्ट्रेट ऑफ होर्मूज (Strait of Hormuz) इस पूरे विवाद का केंद्र बन गया है। ईरान ने साफ कर दिया है कि जब तक “भरोसेमंद सीज़फ़ायर” नहीं होता, यह अहम तेल रूट बंद रहेगा। इसका मतलब है-वैश्विक तेल आपूर्ति (Global Oil Supply )और अर्थव्यवस्था (Economy) पर सीधा असर पड़ सकता है।
ईरान का दूसरा बड़ा मुद्दा उसका परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Program) है। अमेरिका चाहता है कि ईरान परमाणु हथियार न बनाने की गारंटी दे, जबकि ईरान इसे अपने अधिकार का हिस्सा मानता है। यही वजह है कि दोनों देश किसी कॉमन ग्राउंड पर नहीं पहुंच पाए।
ईरान के अधिकारियों ने यह भी कहा कि बातचीत “अविश्वास के माहौल” में हुई थी, इसलिए एक ही बैठक में समझौते की उम्मीद करना गलत था। यानी विश्वास की कमी (Trust Deficit) अभी भी सबसे बड़ी समस्या है।
बातचीत फेल होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है। अमेरिका पहले ही सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दे चुका है, और ईरान भी अपने रुख पर सख्त बना हुआ है। अगर जल्द कोई नया समझौता नहीं हुआ, तो Middle East में तनाव और बढ़ सकता है। US–Iran वार्ता का फेल होना सिर्फ एक डिप्लोमैटिक खबर नहीं, बल्कि एक बड़ा ग्लोबल सिग्नल है। तेल सप्लाई, महंगाई, और युद्ध का खतरा-सब कुछ अब इस टकराव पर निर्भर करता है।
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