ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल की जंग: नए वर्ल्ड ऑर्डर की एक झलक, जहां देशों पर 'सिर्फ़ मज़े के लिए' हमला हो सकता है – BBC

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अमेरिका, इसराइल और ईरान के बीच चल रहा टकराव आगे चलकर दुनिया के उन पहले बड़े संघर्षों में गिना जा सकता है, जो एक नए उभरते वैश्विक सिस्टम या वर्ल्ड ऑर्डर में लड़े जा रहे हैं, जहां दशकों से नज़र आ रहे अंतरराष्ट्रीय नियमों का असर पहले जैसा मज़बूत नहीं रह गया है.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लंबे समय तक युद्ध और कूटनीति एक तय ढांचे के अंदर चलते थे, जिसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं ने बनाया था.
भले ही कई बार इन नियमों को अपने हिसाब से इस्तेमाल किया गया, लेकिन देश आमतौर पर अपनी कार्रवाई को उसी सिस्टम के अंदर सही ठहराने की कोशिश करते थे. सैन्य कार्रवाई के साथ क़ानूनी दलीलें, कूटनीतिक बातचीत या अंतरराष्ट्रीय सहयोग का गठन भी होता था.
लेकिन मौजूदा युद्ध में इन बातों की भूमिका बहुत सीमित दिखाई दे रही है. रणनीतिक फ़ैसले अब ज़्यादा तुरंत सैन्य, राजनीतिक या सुरक्षा जमा-गुणा के आधार पर लिए जा रहे हैं, बजाय इसके कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय क़ानून या वैश्विक सहमति के साथ जोड़ा जाए.
इन शर्तों में ईरान के लिए ऐसी स्थिति कोई नई नहीं है. कई दशकों से वह अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और राजनीतिक अलगाव में जी रहा है.
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समय के साथ उसने ऐसे नेटवर्क और आर्थिक तरीक़े विकसित कर लिए हैं, जिनसे वह इन प्रतिबंधों से बच सके. दुनिया के सबसे सख़्त प्रतिबंधों में रहने के बावजूद ईरान तेल का निर्यात करता रहा है और अपने क्षेत्रीय प्रभाव को बनाए रखा है.
इस रणनीति में ईरान अक्सर अपने क़दम सोच-समझकर बढ़ाता रहा है. पहले के संकटों में उसकी प्रतिक्रिया ऐसी रही है कि वह अपने विरोधियों पर दबाव बढ़ाए, लेकिन हालात को बड़े क्षेत्रीय युद्ध में न बदलने दे.
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उसका मक़सद आमतौर पर यह होता है कि विरोधी देशों पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव बढ़े, ताकि बाहर के देश बीच-बचाव कर स्थिति को शांत करने की कोशिश करें.
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इसराइल भी ऐसे माहौल में काम करने का आदी रहा है, जहां अंतरराष्ट्रीय नियम हमेशा सीधे तौर पर उसकी कार्रवाई को नहीं रोकते. उसकी सैन्य नीति लंबे समय से इस बात पर ज़ोर देती है कि अगर कोई बड़ा ख़तरा दिखे तो जल्दी और तय तरीक़े से कार्रवाई की जाए. पहले से हमला करना (प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक) और पूरी ताक़त का इस्तेमाल करना उसकी रणनीति का हिस्सा रहा है.
हालिया सालों में ग़ज़ा जैसे संघर्षों में इसराइल की कार्रवाई पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज़्यादा सवाल उठे हैं, ख़ासकर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय जैसे मंचों पर. इसके बावजूद इसराइल का मानना रहा है कि उसकी सुरक्षा सबसे पहले है और इसके लिए कड़े सैन्य क़दम ज़रूरी हैं, ख़ासकर जब उसे अमेरिका का मज़बूत समर्थन मिलता है.
अमेरिका की स्थिति इस सिस्टम में अलग रही है. वह सिर्फ़ एक हिस्सा नहीं था, बल्कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद बने अंतरराष्ट्रीय सिस्टम को बनाने और चलाने में उसकी बड़ी भूमिका रही है. युद्ध के बाद उस समय जो गठबंधन, संस्थाएं और नियम बने, उन्होंने दुनिया में अमेरिका के प्रभाव को और बढ़ाया।
हाल के दशकों में अमेरिका ने इस सिस्टम को सबसे ज़्यादा खुलकर 2003 में इराक़ पर हमले के दौरान दरकिनार किया था. तब भी उसने इस कार्रवाई को एक बड़े गठबंधन के रूप में दिखाने की कोशिश की. तथाकथित "कोएलिशन ऑफ़ द विलिंग" नाम के इस समूह में ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और पोलैंड जैसे देश शामिल थे, साथ ही कई और देशों ने अलग-अलग स्तर पर समर्थन दिया था.
हालांकि इस युद्ध की क़ानूनी वैधता पर काफ़ी बहस हुई, फिर भी अमेरिका ने इसे एक अंतरराष्ट्रीय सहयोग के रूप में पेश करने की कोशिश की.
हालांकि, मौजूदा टकराव में शामिल सभी पक्षों के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों और वैधता पर ज़ोर पहले जितना अहम नहीं दिख रहा है. बड़े नेताओं के बयान भी अलग तरह के नज़र आए हैं. उदाहरण के लिए 14 मार्च को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि लगातार किए गए कई हमलों ने ईरान के खार्ग द्वीप का बड़ा हिस्सा "पूरी तरह तबाह" कर दिया है.
उन्होंने एनबीसी न्यूज़ से कहा, "हम मज़े के लिए इसे कुछ और बार भी निशाना बना सकते हैं." ऐसे बयान दिखाते हैं कि अब भाषा ज़्यादा सीधी है और पहले के बड़े अमेरिकी सैन्य अभियानों की तरह कूटनीतिक तरीक़े से नहीं रखी जा रही है.
इस नए तरीक़े में आर्थिक साधनों का इस्तेमाल भी ज़्यादा आक्रामक तरीक़े से किया जा रहा है. टैरिफ़, व्यापार पर रोक और वित्तीय क़दम अब सिर्फ़ विरोधियों पर ही नहीं, बल्कि पुराने साझेदार देशों पर भी लगाए जा रहे हैं. यूरोप के कई देश, जिनमें ब्रिटेन और दूसरे नेटो सहयोगी शामिल हैं, वे रक्षा ख़र्च, माइग्रेशन नीति, व्यापार और रूस से रिश्तों जैसे मुद्दों पर अमेरिका की आलोचना का सामना कर चुके हैं.
ऐसी नीतियां थोड़े समय के लिए असरदार लग सकती हैं, ख़ासकर अगर दूसरे देश अभी भी पुराने अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करते हों. लेकिन लंबे समय में इसका क्या असर होगा, यह साफ़ नहीं है. अगर नियम बनाने वाला सबसे बड़ा देश ही उन नियमों को कम अहमियत देने लगे, तो बाक़ी देश भी ख़ुद को उनसे कम बंधा हुआ महसूस कर सकते हैं.
पिछले टकरावों में ईरान का रवैया दिखाता है कि पहले ये मुश्किलें कैसे संभाली जाती थीं. 2025 की गर्मियों में हुए 12 दिन के युद्ध जैसे संकटों के दौरान भी तेहरान ने जवाबी कार्रवाई की, लेकिन अपनी तय सीमाओं का काफ़ी हद तक पालन किया. हालांकि यह संघर्ष भी सामान्य अंतरराष्ट्रीय नियमों से अलग था, फिर भी ईरान की प्रतिक्रिया संतुलित रही.
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जब ईरान ने क़तर में अमेरिका के अल उदैद एयर बेस पर मिसाइलें दागीं, तो ऐसा लगा कि इस हमले से पहले क़तर और अमेरिका, दोनों को अनौपचारिक तौर पर चेतावनी दी गई थी. इससे पहले इराक़ में हुए ईरानी हमलों में भी ऐसा ही संकेत देखा गया था. भारी नुक़सान झेलने के बाद भी तेहरान की जवाबी कार्रवाई इस तरह की लगती थी कि वह हालात को और ज़्यादा न बढ़ने देना चाहता है.
लेकिन मौजूदा संघर्ष में ये सीमाएं कमज़ोर पड़ती दिख रही हैं. सुप्रीम लीडर अली ख़ामेनेई की शुरुआती हमलों में मौत के बाद, ईरान ने अरब क्षेत्र में अमेरिका के ठिकानों पर हमले किए. इनमें सैन्य अड्डों के साथ-साथ कुछ नागरिक ठिकाने और बुनियादी ढांचा भी निशाने पर आए. इसी दौरान ईरान की कार्रवाई से दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ में आवाजाही भी प्रभावित हुई.
इसके असर तुरंत दिखे. ऊर्जा बाज़ार में तेज़ हलचल हुई और इस संकरे समुद्री रास्ते में रुकावट के कारण दुनिया भर की सप्लाई चेन पर असर पड़ा. इस घटना ने दिखाया कि जब टकराव को सीमित रखने वाले पुराने नियम कमज़ोर पड़ते हैं, तो एक क्षेत्रीय संघर्ष भी बहुत जल्दी वैश्विक आर्थिक झटका बन सकता है.
इन घटनाओं से दुनिया की दूसरी बड़ी ताक़तें भी अपने-अपने निष्कर्ष निकाल सकती हैं. रूस को ऊंची ऊर्जा क़ीमतों से फ़ायदा हो सकता है और उस पर लगे प्रतिबंधों का असर कुछ कम हो सकता है, भले ही यूरोपीय संघ इसका विरोध करे. वहीं चीन यह ध्यान से देखेगा कि अंतरराष्ट्रीय नियम कितनी हद तक बदल रहे हैं और किस दिशा में जा रहे हैं.
इस समय यूरोप की भूमिका घटनाओं की दिशा तय करने में काफ़ी सीमित नज़र आ रही है. कूटनीतिक कोशिशों के बावजूद, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन ज़्यादातर हालात को प्रभावित करने के बजाय सिर्फ़ देख रहे हैं.
मिडिल ईस्ट के इस युद्ध से उठने वाला बड़ा सवाल सिर्फ़ एक संघर्ष के नतीजे तक सीमित नहीं है. यह उस अंतरराष्ट्रीय सिस्टम से जुड़ा है, जिसने 1945 के बाद से दुनिया की राजनीति और रिश्तों को आकार दिया है. भले ही यह सिस्टम हर जगह पूरी तरह स्वीकार नहीं था और अक्सर उस पर सवाल उठते रहे, फिर भी इसने एक ढांचा दिया जिसके अंदर ताक़त का इस्तेमाल होता था.
अगर यह ढांचा और कमज़ोर होता है, तो दुनिया का माहौल कम अनुमान लगाने लायक हो सकता है. ऐसे में देश साझा नियमों पर कम और अपनी ताक़त पर ज्यादा भरोसा करेंगे. ऐसी स्थिति में वे देश भी जिन्होंने इस सिस्टम को बनाया था, इसके कमज़ोर होने के ऐसे असर देख सकते हैं, जिनका अंदाज़ा लगाना मुश्किल होगा.
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