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जैसे-जैसे ईरान युद्ध बढ़ रहा है, ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है. एशिया पर इसका सबसे ज्यादा असर दिख रहा है, क्योंकि कई देश खाड़ी देशों की आपूर्ति और ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर निर्भर हैं. ऐसे हालात में, भारत ऊर्जा सुरक्षा के एक मजबूत स्तंभ के रूप में उभरा है.
भारत दुनिया का चौथे सबसे बड़ा रिफाइनर है. इसके साथ ही वो पेट्रोलियम उत्पादों के पांचवें सबसे बड़े निर्यातक के रूप में, न सिर्फ अपनी मांग पूरी कर रहा है, बल्कि अपने पड़ोसी देशों की भी मदद कर रहा है.
श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी दी कि भारत ने हाल ही में कोलंबो को लगभग 38,000 मीट्रिक टन ईंधन की आपूर्ति की है. भारत भूटान और नेपाल को भी बिना रुके ईंधन भेज रहा है, जो पूरी तरह से भारत पर निर्भर हैं.
इसके अलावा, भारत अप्रैल तक ढाका (बांग्लादेश) को लगभग 40,000 मीट्रिक टन अतिरिक्त डीजल भेजने की तैयारी भी कर रहा है.
‘इंडिया टुडे’ की ओपन सोर्स इंटेलिजेंस टीम के विश्लेषण (जो इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों पर आधारित है) से पता चलता है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़ी शुरुआती बाधाओं को काफी हद तक दूर कर लिया गया है. भारत के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने कहा है कि दिल्ली ने अपनी सप्लाई चेन में बदलाव किया है और अब वो 40 से ज्यादा देशों से कच्चा तेल खरीद रहा है.
भारत के कच्चे तेल के आयात का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बाहर के रास्तों से आता है, जिससे जोखिम कम हो गया है.
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भारत रिफाइंड पेट्रोलियम का शुद्ध निर्यातक बना हुआ है और 150 से ज्यादा देशों को ईंधन की आपूर्ति कर रहा है. पड़ोस में ये ‘नेबरहुड फर्स्ट’ की नीति के अनुरूप है, जो इस संकट के बीच वास्तविक रूप में काम कर रही है.
नेपाल और भूटान ईंधन के लिए पूरी तरह भारत पर निर्भर हैं, वहां आपूर्ति में कोई बाधा नहीं आई है. भूटान के उद्योग, वाणिज्य और रोजगार मंत्रालय ने कहा कि भारत के साथ स्थापित ढांचे के तहत आपूर्ति सुरक्षित है. नेपाल ऑयल कॉर्पोरेशन के प्रवक्ता मनोज कुमार ठाकुर ने भी पुष्टि की कि घरेलू मांग के मुताबिक भारत से आपूर्ति सामान्य बनी हुई है.
बांग्लादेश पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन के महाप्रबंधक मोहम्मद मुर्शेद हुसैन आजाद ने बताया कि हाल ही में 15,000 टन डीजल पहुंच चुका है और अप्रैल के लिए 40,000 टन की योजना है. ये ईंधन असम की नुमालीगढ़ रिफाइनरी से ‘भारत-बांग्लादेश मैत्री पाइपलाइन’ के जरिए भेजा जा रहा है. 2024 की अशांति के दौरान रुकी ये पाइपलाइन फरवरी में राजनीतिक बदलाव के बाद फिर से शुरू हो गई है.
श्रीलंका में, भारत की तरफ भेजी गई 38,000 मीट्रिक टन ईंधन की खेप वहां की तत्काल कमी का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा पूरा करती है. ये आंकड़े दिखाते हैं कि भारत इस क्षेत्र में एक मुख्य ‘स्टेबलाइजर’ (स्थिरता लाने वाला) के रूप में कार्य कर रहा है.
ईरान युद्ध में साउथ एशिया को कौन ईंधन दे रहा है?
आंकड़े दक्षिण एशिया की ऊर्जा स्थिति में एक बड़ा अंतर दिखाते हैं. पाकिस्तान अपने तेल का लगभग 83 प्रतिशत खाड़ी देशों से लेता है, जबकि बांग्लादेश लगभग 80 प्रतिशत और श्रीलंका 65 प्रतिशत के लिए उन पर निर्भर है. हालांकि, भारत की स्थिति 54 प्रतिशत खाड़ी से, 34 प्रतिशत अन्य स्रोतों से और लगभग 12 प्रतिशत घरेलू उत्पादन से ज्यादा संतुलित है.
नेपाल और भूटान पूरी तरह से भारत पर निर्भर हैं. ये अंतर एक बड़ी कमजोरी को दिखाता है, जहां ज्यादातर दक्षिण एशिया स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बाधाओं को लेकर संवेदनशील है, वहीं भारत की विविधतापूर्ण खरीदारी और रिफाइनिंग क्षमता उसे इन झटकों को सहने और पड़ोसियों की मदद करने में सक्षम बनाती है.
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भारत की बड़ी तैयारी
पेट्रोलियम मंत्रालय ने बाजार को भरोसा दिलाया है कि कच्चे तेल का आयात स्थिर है. दुनिया भर के 41 स्रोतों (जिनमें पश्चिमी गोलार्ध के देश भी शामिल हैं) से तेल मंगाकर किसी भी कमी को पूरा कर लिया गया है. भारत की रिफाइनरियां 100 प्रतिशत से ज्यादा क्षमता पर काम कर रही हैं और तेल कंपनियों ने अगले 60 दिनों के लिए कच्चा तेल सुरक्षित कर लिया है. सरकार का कहना है कि आपूर्ति में कोई कमी नहीं है.
(इनपुट- विजयेश तिवारी)
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