ईरान ने अमेरिका को बना दिया पंगु! 40 दिन की जंग में अरब मुल्कों में एक दर्जन बेस तबाह – AajTak

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मध्य पूर्व में हालिया जंग ने शक्ति संतुलन की पूरी तस्वीर बदल दी है. जहां कभी अमेरिका के सैन्य ठिकाने उसकी ताकत और प्रभाव का प्रतीक माने जाते थे, वहीं अब वही बेस उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनते नजर आ रहे हैं. ईरान के जवाबी हमलों ने सऊदी अरब, UAE, कतर और बहरीन जैसे देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ढांचे को गहरी चोट पहुंचाई है.
विशेषज्ञों का कहना है कि खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के कम से कम एक दर्जन सैन्य ठिकाने इतने बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं कि अब उनका इस्तेमाल करना भी मुश्किल हो गया है. न्यूयॉर्क टाइम्स ने पहले ही बताया था कि हमलों की वजह से अमेरिकी एयरबेस इस्तेमाल करने योग्य भी नहीं हैं. हालांकि ट्रंप प्रशासन ने अब तक नुकसान की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है.
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मिडिल ईस्ट आई की रिपोर्ट की मानें तो जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में मिडिल ईस्ट पॉलिटिक्स प्रोजेक्ट के डायरेक्टर ने बताया कि, “यह अमेरिका की ताकत का पूरा ढांचा था, जिसे ईरान ने एक महीने के भीतर बेकार कर दिया.” उनका मानना है कि असली नुकसान की तस्वीर अभी भी सामने नहीं आई है.
सऊदी-UAE से कतर तक अमेरिका एयरबेस का बुरा हाल
अरब के जिन देशों में ये बेस मौजूद हैं, जैसे कि बहरीन, सऊदी अरब, यूनाइटेड अरब अमीरात, कुवैत और कतर में इन ठिकानों तक पहुंच बेहद सीमित कर दी गई है. जंग के दौरान इन देशों ने अपने आसमान में मिसाइलों की तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्डिंग पर भी रोक लगा दी थी, जिससे यह सवाल भी उठे कि क्या वे इन ठिकानों की असली हालत छिपाना चाहते थे.
ईरान ने बहरीन में अमेरिकी नौसेना के फिफ्थ फ्लीट के हेडक्वार्टर को निशाना बनाया था, कभी अमेरिका की समुद्री ताकत का केंद्र माना जाता था, अब खुद खतरे में है. विशेषज्ञ कहते हैं, “ऐसा नहीं लगता कि हम कभी पहले की तरह वहां अपनी फिफ्थ फ्लीट को वापस रख पाएंगे. यह अब बहुत ज्यादा असुरक्षित हो चुका है.”
खाड़ी युद्ध के बाद अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में मजबूत की पकड़
असल में, अमेरिका का यह सैन्य नेटवर्क 1990 के खाड़ी युद्ध के बाद मजबूत हुआ था. तब से लेकर अब तक करीब 19 बड़े सैन्य ठिकाने इस क्षेत्र में बनाए गए, जहां लगभग 50,000 सैनिक तैनात रहते हैं. कहा जाता है कि इससे खाड़ी देशों को सुरक्षा मिलती थी और इसके बदले अमेरिका को तेल और मिडिल ईस्ट में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करने में मदद मिलती थी.
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लेकिन अब यह समीकरण टूटता दिख रहा है. रिपोर्ट में एक एक्सपर्ट ने बताया, “जब इस तरह के समझौते में एक पक्ष को फायदा कम और नुकसान ज्यादा होने लगे, तो वह रिश्ता कमजोर पड़ने लगता है.” जंग के दौरान खाड़ी देशों को अपनी एयर डिफेंस क्षमता पर भारी दबाव झेलना पड़ा, एयरपोर्ट और स्कूल बंद करने पड़े और यहां तक कि उनके ऊर्जा ढांचे पर भी हमले हुए.
एक विशेषज्ञ ने बताया कि अब ये सैन्य ठिकाने सुरक्षा देने के बजाय हमलों का निशाना बन गए हैं. उन्होंने कहा, “ये बेस ईरानी हमलों को रोकने के बजाय खुद उन्हें आकर्षित करने लगे हैं. इससे अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर भरोसा टूटता दिख रहा है.” इस पूरी घटना का एक बड़ा असर यह हो सकता है कि खाड़ी देश अब अपनी सुरक्षा के लिए नए विकल्प तलाशें.
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