ईरान में ख़ामनेई की आखिर कैसे मिली लोकेशन? US-Israel की टेक्नोलॉजी ने ऐसे किया ट्रैक – AajTak

Feedback
मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने के बीच यह सवाल चर्चा में है कि किसी भी बड़े नेता की लोकेशन आखिर पता कैसे लगाई जाती है. क्या सैटेलाइट से. क्या फोन से. क्या अंदरूनी सूत्रों से.
आधुनिक युद्ध अब सिर्फ मिसाइल और टैंक का नहीं रहा. असली ताकत अब इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी की है. दुनिया की बड़ी एजेंसियां जैसे CIA, Mossad और NSA कई लेयर में काम करती हैं.
सैटेलाइट सर्विलांस 
सबसे पहला हथियार होता है सैटेलाइट निगरानी. हाई-रिजोल्यूशन इमेजिंग सैटेलाइट आज इतनी ताकतवर हैं कि जमीन पर गाड़ियों की मूवमेंट तक ट्रैक कर सकती हैं. लगातार निगरानी से यह समझ आता है कि कौन-सी गाड़ी कहां जा रही है, किस बिल्डिंग में असामान्य गतिविधि है.
सिग्नल इंटेलिजेंस 
दूसरा बड़ा टूल होता है सिग्नल इंटेलिजेंस. यानी फोन कॉल, रेडियो सिग्नल, इंटरनेट ट्रैफिक, एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन की निगरानी. आधुनिक सिस्टम मेटाडेटा के जरिए यह पता लगा सकते हैं कि कौन किससे बात कर रहा है, किस इलाके में एक्टिव डिवाइस अचानक ऑन या ऑफ हुआ.
सर्विलांस स्टेल्थ एयरक्राफ्ट 
तीसरा तरीका होता है ड्रोन और सर्विलांस स्टेल्थ एयरक्राफ्ट. कई बार लंबी दूरी से निगरानी करने वाले ड्रोन लगातार इलाके के ऊपर चक्कर लगाते रहते हैं. थर्मल कैमरा, नाइट विजन और रडार सिस्टम से मूवमेंट पकड़ी जाती है.
ह्यूमन इंटेलिजेंस 
चौथा और सबसे पुराना तरीका है ह्यूमन इंटेलिजेंस. यानी जमीन पर मौजूद स्रोत. अंदरूनी जानकारी, सुरक्षा चेन में कमजोरी, या किसी करीबी नेटवर्क से लीक. अक्सर टेक्नोलॉजी और मानव स्रोत मिलकर ही सटीक जानकारी देते हैं.
कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि महीनों की निगरानी के बाद मूवमेंट पैटर्न समझे जाते हैं. बड़े नेता अक्सर सुरक्षा कारणों से लोकेशन बदलते रहते हैं. लेकिन हर मूवमेंट एक पैटर्न बनाता है. डेटा एनालिसिस और AI सिस्टम इन पैटर्न को पकड़ सकते हैं.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से किया जाता है एनालिसीसी 
आधुनिक युद्ध में AI की भूमिका भी बढ़ रही है. बड़ी मात्रा में सैटेलाइट इमेज, कॉल रिकॉर्ड, डिजिटल डेटा को इंसान नहीं, बल्कि एल्गोरिद्म पहले स्कैन करते हैं. संदिग्ध पैटर्न मिलने पर उसे एजेंसियों के विश्लेषकों तक भेजा जाता है.
लेकिन यह भी सच है कि इस तरह की जानकारी कभी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं होती. आधिकारिक एजेंसियां ऑपरेशन की बारीकियां साझा नहीं करतीं. जो भी जानकारी सामने आती है, वह अधिकतर मीडिया रिपोर्ट्स और विश्लेषण पर आधारित होती है.
स्पाइवेयर और मैलवेयर का यूज 
एक और अहम पहलू है साइबर निगरानी. स्मार्टफोन, इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल डिवाइस आज सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा जोखिम भी बन सकते हैं. कई देशों की एजेंसियां कथित तौर पर स्पायवेयर, मैलवेयर या नेटवर्क ट्रैकिंग टूल का इस्तेमाल करती रही हैं.
कुल मिलाकर, किसी भी हाई-प्रोफाइल टारगेट को ट्रैक करना एक दिन का काम नहीं होता. यह कई महीनों की निगरानी, टेक्नोलॉजी, डेटा एनालिसिस और मानव स्रोतों का मिश्रण होता है.
आज का युद्ध मैदान डिजिटल भी है. मिसाइल चलने से पहले डेटा चलता है. और जो डेटा को बेहतर समझ ले, वही बढ़त बना लेता है.
Copyright © 2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today
होम
वीडियो
लाइव टीवी
न्यूज़ रील
मेन्यू
मेन्यू

source.freeslots dinogame telegram营销

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Toofani-News