एसबीडी कॉलेज में दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन: हिंदी की वैश्विक स्थिति और चुनौतियों पर हुई चर… – Dainik Bhaskar

एसबीडी महाविद्यालय में भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) दिल्ली द्वारा अनुदानित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। देश-विदेश से आए विद्वानों ने हिंदी की वैश्विक स्थिति, चुनौतियों और संभावनाओं पर गहन विचार-विमर्श किया।
दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ शुभारंभ
कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि सूर्यमणि रघुवंशी, श्रीलंका से आए डॉ. ब्रेसिल नौगाड वितान, प्रो. देवेंद्र नाथ सिंह, नॉर्वे से पधारे सुरेश चंद्र शुक्ल, हरिद्वार से आए प्रो. सुशील उपाध्याय, महाविद्यालय की प्रबंधक श्रीमती रेनू गोयल, प्राचार्या प्रो. पूनम चौहान और संयोजिका डॉ. अल्पना सिंह ने दीप प्रज्ज्वलन व मां सरस्वती के समक्ष पुष्पार्चन कर किया। अतिथियों का स्वागत गुलदस्ते, अंगवस्त्र और स्मृति चिन्ह भेंट कर किया गया।
हिंदी की वैश्विक स्थिति पर विमर्श
हरिद्वार से आए प्रो. सुशील उपाध्याय ने अपने वक्तव्य में हिंदी की अंतरराष्ट्रीय स्थिति और भाषाओं के विविध स्वरूपों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिंदी केवल भारत की भाषा नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बना रही है।
भारतीय संस्कृति से बढ़ रहा हिंदी का प्रभाव
श्रीलंका से आए मुख्य वक्ता डॉ. ब्रेसिल नौगाड वितान ने बताया कि विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार का प्रमुख कारण भारतीय संस्कृति, योग, भारतीय फिल्में और संगीत हैं। उन्होंने कहा कि श्रीलंका जैसे देशों में हिंदी संगीत और फिल्मों के संवाद के माध्यम से हिंदी शिक्षण तेजी से आगे बढ़ रहा है।
भाषा ज्ञान को निरंतर बढ़ाने पर जोर
नॉर्वे से पधारे सुरेश चंद्र शुक्ल, जो ‘स्पाइल दर्पण’ के संपादक भी हैं, ने कहा कि जहां भी अवसर मिले, वहां से सीखने की प्रवृत्ति विकसित करनी चाहिए। उन्होंने भाषा ज्ञान को निरंतर समृद्ध करने और विभिन्न सांस्कृतिक परिवेशों को समझने की आवश्यकता पर बल दिया।
हिंदी के समक्ष चुनौतियां
बीज वक्ता प्रो. देवेंद्र सिंह ने कहा कि हिंदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती विभिन्न विषयों का अंग्रेजी माध्यम में अध्ययन-अध्यापन है। उन्होंने उच्च शिक्षा में हिंदी के अधिक प्रयोग की आवश्यकता बताई।
मुख्य अतिथि एवं बिजनौर के वरिष्ठ पत्रकार सूर्यमणि रघुवंशी ने कहा कि हिंदी के समक्ष जितनी चुनौतियां हैं, उतनी ही संभावनाएं भी मौजूद हैं। उन्होंने हिंदी भाषियों से आह्वान किया कि वे भाषा को वैश्विक शिखर पर पहुंचाने का संकल्प लें।
घटते उपयोग पर चिंता
कार्यक्रम की संयोजिका डॉ. अल्पना सिंह ने कहा कि महाविद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर पर हिंदी के घटते उपयोग पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते प्रयास नहीं किए गए तो हिंदी की अकादमिक स्थिति प्रभावित हो सकती है। दो दिवसीय इस संगोष्ठी में विभिन्न सत्रों के माध्यम से हिंदी की अंतरराष्ट्रीय भूमिका और भविष्य की दिशा पर सार्थक चर्चा की गई।
Copyright © 2024-25 DB Corp ltd., All Rights Reserved
This website follows the DNPA Code of Ethics.

source.freeslots dinogame telegram营销

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Toofani-News