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भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने शनिवार को युवा वकीलों से कानून को समाज के लिए अधिक समावेशी और सुलभ बनाने का आह्वान किया. नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के 18वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि कानून केवल एक ऐसा किला बनकर नहीं रह सकता जिसे मनमानी से समाज की रक्षा के लिए खड़ा किया गया हो.
सीजेआई ने कहा कि कानून कोई अंतिम उत्पाद नहीं है. समाज बदलता है, इसलिए कानून भी बदलता है और उसकी वैधता इसी में है कि वह समय के साथ संवाद करता रहे. उन्होंने ‘मैग्ना कार्टा’ का उल्लेख करते हुए बताया कि किस प्रकार इतिहास में सत्ता को कानून के दायरे में लाने की शुरुआत हुई.
उन्होंने चेतावनी दी कि कानून को जटिल भाषा और तकनीकी शब्दों के जरिए केवल चुनिंदा लोगों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि उत्कृष्टता बहिष्कार का कारण न बने. मुख्य न्यायाधीश ने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे कानून को अधिक सुलभ, समझने योग्य और समावेशी बनाएं, ताकि भारत जैसे ‘अपूर्ण गणराज्य’ में यह एक खुला मंच बना रहे.
CJI ने इस बात पर चिंता जताई कि कभी-कभी कानून जटिल शब्दों और भारी भरकम भाषा (Jargon) में लिपटकर केवल कुछ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों तक सीमित हो जाता है. उन्होंने ग्रेजुएट होने वाले छात्रों से आग्रह किया कि वे कानून को रहस्यमयी बनाने के बजाय उसे ‘बोधगम्य’ (Intelligible) बनाएं.
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