जंग में सैनिकों की जगह नहीं ले सकती तकनीक, चीन के साथ संबंधों पर क्या बोले सेना प्रमुख – Hindustan Hindi News

मदन जैड़ा, नई दिल्ली। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा है कि चीन के साथ संबंधों को लेकर हाल में सकारात्मक प्रगति हुई है। इससे संकेत मिलते हैं कि दोनों देश संवाद और सीमा पर शांति के पक्ष में हैं, लेकिन इसे सिर्फ उम्मीद के आधार पर नहीं बल्कि मजबूत प्रतिरोधक और भरोसेमंद सैन्य क्षमता के आधार पर बनाए रखा जाता है।

सेना प्रमुख ने चीन सीमा पर स्थिरता के बावजूद सैन्य बलों की अब भी भारी तैनाती को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में ये बातें कहीं। हिन्दुस्तान अखबार के साथ विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि सेना उत्तरी सीमा पर पूरी तरह से मुस्तैद है। यदि भविष्य में परिस्थितियां और अनुकूल होती हैं और दोनों पक्षों में विश्वास बढ़ता है तो तैनाती के पैटर्न पर विचार किया जा सकता है। सेना प्रमुख ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर और वैश्विक संघर्षों में यह स्पष्ट दिखा कि तकनीक ने युद्ध का स्वरूप बदल दिया है। इसके बावजूद भारत जैसे विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले देश, जिसे एक साथ कई सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, वहां सैनिकों की भूमिका खत्म कभी नहीं हो सकती।

ऑपरेशन सिंदूर केवल एक सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि भविष्य के युद्धों के लिए एक महत्वपूर्ण सीख था। इसने उन अनेक सुधारों और क्षमताओं को वास्तविक परिस्थितियों में परखने का अवसर दिया, जिन पर भारतीय सेना पिछले कुछ वर्षों से काम कर रही थी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इस ऑपरेशन ने एकीकृत बहु आयामी और तकनीक आधारित अभियानों की प्रभावशीलता को सिद्ध किया। ऑपरेशन सिंदूर ने यह स्पष्ट कर दिया कि भविष्य के युद्ध लंबे समय तक चलने वाले पारंपरिक संघर्ष नहीं होंगे, बल्कि वे कम समय में अत्यधिक तीव्र, तकनीक चालित और बहु आयामी प्रकृति के होंगे। इसलिए युद्ध तैयारी की हमारी अवधारणा भी उसी अनुरूप विकसित हुई है। आज हम केवल सैनिकों और हथियारों की संख्या पर नहीं, बल्कि इंटेलीजेंस फ्यूजन यानी विभिन्न स्रोतों से प्राप्त खुफिया जानकारी एवं डेटा के एकीकरण, त्वरित निर्णय, लक्ष्य पर सटीक प्रहार, सुरक्षित संचार और निर्बाध संयुक्त ऑपरेशन्स पर अधिक ध्यान दे रहे हैं।

इस ऑपरेशन के बाद ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन, ड्रोन प्रतिरोधी सिस्टम, इलेक्ट्रानिक वारफेयर और एआई सक्षम निगरानी क्षमता के महत्व को और अधिक बल मिला है। हमने देखा कि युद्ध के मैदान की पारदर्शिता पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी है। इसलिए हमारी प्राथमिकताओं में मल्टी सेंसर सर्विलांस, वास्तविक समय की परिस्थितिजन्य जागरुकता और कंप्रेस्ड सेंसर टू शूटर साइकिल यानी लक्ष्य की जानकारी मिलने से लेकर हमले तक के समय को कम करना शामिल है। इसी दिशा में अश्नी प्लाटून, शक्तिबाण रेजिमेंट, दिव्यास्त्र बटालियन, भैरव बटालियन तथा रुद्रा आल आर्म ब्रिगेड जैसी नई क्षमताओं को विकसित और सुदृढ़ किया जा रहा।

ऑपरेशन सिंदूर ने एकीकरण की आवश्यकता को प्रमाणित किया। भूमि, वायु, साइबर और इलेक्ट्रानिक वॉरफेयर क्षमताओं के समन्वित उपयोग ने यह दिखाया कि भविष्य की सफलता एकीकृत योजना और समन्वित क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। इसी कारण थियेटर कमान, अंतर संचालनीयता और एकीकृत युद्ध लड़ने की अवधारण की दिशा में हमारे प्रयास और तेज हुए हैं। इस ऑपरेशन के दौरान स्वदेशी ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन और अन्य स्वदेशी प्रणालियों के प्रदर्शन ने हमारे विश्वास को और मजबूत किया है कि भारतीय उद्योग भविष्य की सैन्य आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है। इसलिए आत्मनिर्भरता अब केवल एक औद्योगिक या आर्थिक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक संचालनात्मक आवश्यकता बन चुकी है। कुल मिलाकर ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना की युद्ध तैयारी अधिक तकनीक आधारित, खुफिया सूचनाओं पर केंद्रित, फुर्तीली और भविष्योन्मुखी हुई है। आज तैयारी केवल अगला युद्ध लड़ने की नहीं, बल्कि बदलते स्वरूप को समझते हुए उससे एक कदम आगे रहने की है।

युद्ध का स्वरूप निश्चित रूप से बदल रहा लेकिन युद्ध के मूल सिद्धांत नहीं बदले हैं। तकनीक ने युद्ध लड़ने के तरीके, गति और प्रभाव को बदल दिया है, परंतु युद्ध का अंतिम उद्देश्य आज भी वही है -राष्ट्रीय हितों की रक्षा, क्षेत्रीय अखंडता सुनिश्चित करना और प्रतिद्वंद्वी की इच्छा शक्ति को प्रभावित करना। आज हम देख रहे हैं कि ड्रोन, एआई, साइबर वारफेयर, इलेक्ट्रानिक वारफेयर, अंतरिक्ष के संसाधनों, सटीक हमला करने वाले हथियारों और रियल टाइम निगरानी ने युद्ध के मैदान को पहले की तुलना में कहीं अधिक पारदर्शी और तकनीकी संचालित बना दिया है। ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि एकीकृत योजना, खुफिया सूचनाओं का एकीकरण, ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन और इलेक्ट्रानिक वारफेयर भविष्य के युद्धों में निर्णायक भूमिका निभाएंगे। इसी प्रकार यूक्रेन सहित हाल के कई संघर्षों ने यह सिद्ध किया है कि तकनीक अब युद्ध का एक केंद्रीय तत्व बन चुकी है।

यह निष्कर्ष निकालना कि भविष्य में बड़ी सेनाओं की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी, सही नहीं होगा। भारत जैसे देश के लिए, जिसकी लंबी स्थलीय सीमाएं हैं, विविध भौगोलिक परिस्थितियां हैं और जिसे एक साथ कई प्रकार की सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, सैनिक की भूमिका कभी समाप्त नहीं हो सकती। तकनीक युद्ध को आकार दे सकती है, लेकिन अंततः क्षेत्र पर नियंत्रण और उसकी सुरक्षा सैनिक ही सुनिश्चित करता है। मेरा मानना है कि भविष्य का युद्ध मैन वर्सेज मशीन (आदमी बनाम मशीन) नहीं, मैन विद मशीन होगा बल्कि मशीन के साथ आदमी यानी सैनिक होगा। तकनीक सैनिक का स्थान नहीं लेगी, बल्कि उसकी क्षमता को कई गुना बढ़ाएगी। इसी सोच के साथ हम प्रत्येक सैनिक को तकनीकी रूप से पारंगत और ड्रोन समर्थ योद्धा बनाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। ड्रोन सैनिकों को आसमान में आंखें प्रदान करते हैं। सुरक्षित नेटवर्क उसे बेहतर परिस्थितियों से अवगत कराते हैं और एआई सक्षम यंत्र उसकी निर्णय लेने की प्रक्रिया को तेज करते हैं। लेकिन अंतिम निर्णय, नेतृत्व, साहस और युद्धक्षेत्र में दृढ़ता अभी भी मानव के हाथ में ही रहेगी। इसलिए भारतीय सेना का आधुनिकीकरण परंपरागत क्षमताओं एवं आला तकनीकों के बीच संतुलन पर आधारित है। एक ओर हम टैंक, आर्टलरीज, एयर डिफेंस, इंफ्रेंट्री और लाजिस्टिक को मजबूत कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर ड्रोन, काउंटर ड्रोन सिस्टम और साइबर और इलेक्ट्रानिक वारफेयर की क्षमताओं को मजबूत कर रहे हैं। भविष्य की विजयी सेना वह होगी जो तकनीक और मानव क्षमता का सर्वश्रेष्ठ संयोजन कर सके। भारतीय सेना इसी दिशा में स्वयं को तैयार कर रही है।

● ऑपरेशन सिंदूर का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह था कि भारत आतंकवाद और उसके संरक्षकों के प्रति अपनी नीति को लेकर पूरी तरह स्पष्ट है। इस ऑपरेशन ने यह स्थापित किया कि भारत आवश्यकता पड़ने पर आतंकवाद के स्रोत तक पहुंचकर सटीक, निर्णायक और जिम्मेदार कार्रवाई करने की क्षमता और इच्छाशक्ति दोनों रखता है। इसलिए ऑपरेशन सिंदूर को केवल एक सैन्य अभियान के रूप में नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जाना चाहिए। जहां तक पाकिस्तान के रवैये का प्रश्न है, किसी भी देश की नीतियों का आकलन उसके वक्तव्यों से अधिक उसके व्यवहार और जमीनी गतिविधियों के आधार पर किया जाना चाहिए। यह कहना जल्दबाजी होगा कि स्थायी रूप से कोई मूलभूत परिवर्तन आ गया है। सुरक्षा के क्षेत्र में हमें हमेशा क्षमताओं और मंशा दोनों पर नजर रखनी होती है। मंशा समय के साथ बदल सकती हैं, लेकिन क्षमता बनी रहती हैं। इसलिए भारतीय सेना अपनी सतर्कता और संचालनात्मक तैयारियों में किसी प्रकार की कमी नहीं आने देती। पाक में सक्रिय आतंकी समूहों के संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि आतंकवादी ढांचे और उनके समर्थन तंत्र वर्षों में विकसित होते हैं। किसी एक घटना या ऑपरेशन के तुरंत बाद उनके पूर्णतः समाप्त हो जाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। हालांकि, ऑपरेशन सिंदूर ने निश्चित रूप से ऐसे तत्वों और उनके समर्थकों को यह संदेश दिया है कि भारत अब आतंकवाद को केवल एक कानून एवं व्यवस्था के रूप में नहीं देखता, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के विरुद्ध एक संगठित खतरे के रूप में देखता है और उसके अनुरूप प्रतिक्रिया देने में सक्षम है। हमारी रणनीति केवल आतंकवादियों को निष्क्रिय करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे आतंकी तंत्र को कमजोर करने पर केंद्रित है। इसमें खुफिया सूचनाओं पर आधारित अभियान, निगरानी, सीमा प्रबंधन, घुसपैठ रोकने, तकनीक आधारित निगरानी, वित्तीय नेटवर्क को कमजोर करना और स्थानीय स्तर पर विश्वास निर्माण जैसे अनेक पहलू शामिल हैं। अंततः, भारतीय सेना का दृष्टिकोण स्पष्ट है कि हम बयानबाजी के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों, गतिविधियों और सुरक्षा आकलनों के आधार पर निर्णय लेते हैं। हमारी प्राथमिकता भारत की सुरक्षा, सीमा की अखंडता और नागरिकों की रक्षा है, और इस दिशा में हमारी तैयारी तथा सतर्कता पूरी तरह कायम है।

उत्तरी सीमाओं पर वर्तमान स्थिति स्थिर है, लेकिन संवेदनशील बनी हुई है। पिछले कुछ समय में तनाव घटाने की प्रक्रिया और दोनों पक्षों के बीच निरंतर संवाद के कारण जमीन पर स्थिरता बढ़ी है। वर्ष 2024-25 के दौरान द्विपक्षीय संबंधों में भी कुछ सकारात्मक संकेत देखने को मिले हैं, जिनका प्रभाव सीमा प्रबंधन तंत्र और सैन्य स्तर की बातचीत में दिखाई देता है। भारतीय सेना का प्राथमिक दायित्व राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता सुनिश्चित करना है। इसलिए तैनाती के स्तर का निर्धारण हमेशा संचालनात्मक जरूरत और खतरे के आकलन के आधार पर किया जाता है। भारत और चीन के बीच विभिन्न स्तरों पर संवाद की स्थापित व्यवस्थाएं मौजूद हैं जिनके माध्यम से दोनों पक्ष नियमित रूप से सीमा प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करते हैं।

प्रतिवर्ष दोनों सेनाओं के बीच 1100 से अधिक संपर्क होते हैं, जो स्थानीय स्तर पर स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हाल के समय में कुछ सकारात्मक प्रगति भी हुई है। सीमा के पुनर्निर्धारण के लिए विशेषज्ञ समूह, सीमा प्रबंधन के लिए कार्य समूह, कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली, सीधी उड़ाने, सीमा व्यापार की चर्चाएं, यह संकेत देती हैं कि दोनों देश संवाद और स्थिरता बनाए रखने के महत्व को समझते हैं लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि शांति और स्थिरता को केवल आशा के आधार पर नहीं, बल्कि मजबूत प्रतिरोधकता और भरोसेमंद सैन्य क्षमता के आधार पर बनाए रखा जाए। इसलिए हमारी प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं सीमा क्षेत्रों में शांति एवं स्थिरता बनाए रखना और संवाद के माध्यम से स्थानीय मुद्दों का समाधान करना, लेकिन साथ ही किसी भी संभावित चुनौती का सामना करने के लिए व्यापक तैनाती, ढांचागत विकास और क्षमता विकास बनाए रखना।

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि थियेटर कमान बनाना किसी संगठनात्मक पुनर्गठन भर का विषय नहीं हैं, बल्कि भारतीय सशस्त्र बलों के भविष्य के युद्धक ढांचे में एक बुनियादी परिवर्तन का हिस्सा हैं। इसका उद्देश्य तीनों सेनाओं की क्षमताओं को एकीकृत करते हुए भविष्य के युद्धों के लिए अधिक प्रभावी, तेज और समन्वित युद्धक ढांचा तैयार करना है। जहां तक समय-सीमा या पहले थियेटर कमान के स्वरूप का प्रश्न है, इस पर अंतिम निर्णय राष्ट्रीय स्तर की संस्थागत प्रक्रियाओं के माध्यम से लिया जाएगा। इसलिए किसी विशिष्ट समय-सीमा या संरचना पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।

मेरा मानना है कि हर सैनिक और विशेष रूप से वरिष्ठ सैन्य नेतृत्व के पास अनुभवों का एक अनमोल भंडार होता है, जिससे आने वाली पीढ़ियां बहुत कुछ सीख सकती हैं। सैन्य जीवन केवल युद्धों, अभियानों और रणनीतियों तक सीमित नहीं होता; यह नेतृत्व, निर्णय क्षमता, संकट प्रबंधन, टीमवर्क, धैर्य, राष्ट्रसेवा और मानवीय मूल्यों की भी एक लंबी यात्रा होती है। यदि इन अनुभवों को उचित रूप से दस्तावेजीकृत किया जाए, तो वे समाज, युवाओं और भावी सैन्य नेताओं के लिए अत्यंत उपयोगी हो सकते हैं। जहां तक मेरा प्रश्न है, फिलहाल ऐसी कोई निश्चित योजना नहीं है। मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय सैनिकों, इकाइयों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े दायित्वों में बिताया है। मेरा विश्वास है कि अनुभवों का सबसे अच्छा उपयोग उन्हें अगली पीढ़ी के साथ साझा करने में है। (हिन्दुस्तान प्रिंट के सहयोग से)

विद्यालयी जीवन से ही कलात्मक अभिव्यक्ति, विचारशील स्वभाव और मिलनसार व्यक्तित्व और सामान्य के अंदर डुबकी लगाकर कुछ खास खोज लाने का कौशल पत्रकारिता के लिए अनुकूल साबित हुआ। अंकित ओझा एक दशक से डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहने वाले अंकित ओझा समाचारों की दुनिया में तथ्यों के महत्व के साथ ही संवेदनशीलता के पक्ष को साधने में निपुण हैं। पिछले चार साल से हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप के ‘लाइव हिन्दुस्तान’ के लिए चीफ कॉन्टेंट प्रड्यूसर पद पर कार्य कर रहे हैं। इससे पहले ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ और ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ग्रुप के साथ भी कार्य कर चुके हैं।
राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राज्य और सामाजिक सरोकारों की खबरों के संपादन में लंबा अनुभव होने के साथ ही अपने-आसपास की घटनाओं में समाचार तत्व निकालने की अच्छी समझ है। घटनाओं और समाचारों से संबंधित फैसले लेने और त्वरित समाचार प्रकाशित करने में विशेष योग्यता है। इसके अलावा तकनीक और पाठकों की बदलती आदतों के मुताबिक सामग्री को रूप देने के लिए निरंतर सीखने में विश्वास करते हैं। अंकित ओझा की रुचि राजनीति के साथ ही दर्शन, कविता और संगीत में भी है। लेखन और स्वरों के माध्यम से लंबे समय तक आकाशवाणी से भी जुड़े रहे। इसके अलावा ऑडियन्स से जुड़ने की कला की वजह से मंचीय प्रस्तुतियां भी सराही जाती हैं।
अकादमिक योग्यताः अंकित ओझा ने प्रारंभिक शिक्षा नवोदय विद्यालय से पूरी करने के बाद जामिया मिल्ल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में ही ग्रैजुएशन किया है। इसके बाद भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में एमए किया है। जामिया में अध्ययन के दौरान ही इटैलियन और उर्दू भाषा में भी कोर्स किए हैं। इसके अलावा पंजाबी भाषा की भी अच्छी समझ रखते हैं। विश्वविद्यालय में NCC का ‘C सर्टिफिकेट’ भी प्राप्त किया है। IIMC और ऑक्सफर्ड से स्वास्थ्य पत्रकारिता का सर्टिफिकेट भी प्राप्त किया है।
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