प्रिलिम्स के लिये: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, अनुच्छेद 341, अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 15, अनुच्छेद 25
मेन्स के लिये: अनुसूचित जाति दर्जे से संबंधित संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 341 और आदेश, 1950), भारत में धर्म और जाति का अंतर्संबंध, सकारात्मक कार्रवाई और आरक्षण नीतियाँ
स्रोत: द हिंदू
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने चिंथाडा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2026) में निर्णय दिया कि हिंदू, बौद्ध या सिख धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति (SC) समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता।
वैधानिक आयोगों की सिफारिशें: न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा आयोग (2007) ने दलित परिवर्तितों में गंभीर सामाजिक पिछड़ेपन को प्रमाणित किया और अनुसूचित जाति (SC) की स्थिति को धर्म से अलग करने की सिफारिश की।
अद्वितीय ऐतिहासिक आधार: अनुसूचित जाति (SC) वर्ग का निर्माण विशेष रूप से ‘अस्पृश्यता’ की समस्या के समाधान के लिये किया गया था, जिसकी जड़ें मुख्यतः हिंदू वर्ण व्यवस्था में समाहित हैं। इस कारण, कुछ विरोधी मतों का तर्क है कि विदेशी मूल के धर्मों के लिये यह विशिष्ट ऐतिहासिक संदर्भ प्रासंगिक नहीं है।
सकारात्मक भेदभाव में असंगति: अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की पहचान धर्म से स्वतंत्र होती है। केवल SC श्रेणी में धर्म-आधारित प्रतिबंध को मनमाना माना जाता है। आलोचकों के अनुसार SC दर्जे को धर्म से जोड़ना अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (धर्म के आधार पर भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है।
SC कोटा पर अतिरिक्त भार: लाखों दलित ईसाइयों और मुसलमानों को SC सूची में जोड़ने से निर्धारित कोटा पर अत्यधिक दबाव पड़ेगा, जिससे मौजूदा लाभार्थियों का हिस्सा कम हो सकता है।
वंचना की अंतर्विभाजकता: धर्म परिवर्तन के बाद भी जातिगत भेदभाव जारी रहता है, साथ ही उन्हें अपने हिंदू समकक्षों की तरह सरकारी संरक्षण और आरक्षण का लाभ भी नहीं मिलता, जिससे दोहरी वंचना उत्पन्न होती है।
पहचान में कठिनाई: इस्लाम और ईसाई धर्म आधिकारिक रूप से जाति को नहीं मानते, इसलिये इन धर्मों में अस्पृश्यता के ऐतिहासिक प्रमाण स्थापित करना प्रशासनिक रूप से कठिन होता है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि 1950 के राष्ट्रपति आदेश के तहत अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा कानूनी रूप से केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों तक ही सीमित है। हालाँकि विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा आरक्षण और सुरक्षा को कम किये बिना समावेशी सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिये एक संतुलित तथा डेटा-संचालित विधायी दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
दृष्टि मेन्स प्रश्न :
प्रश्न. ‘भारत में अनुसूचित जाति के दर्जे का निर्धारण संवैधानिक प्रावधानों और सामाजिक वास्तविकताओं के बीच के तनाव को दर्शाता है।’ चर्चा कीजिये।
1. संविधान (अनुसूचित जातियाँ) आदेश, 1950 का भाग 3 क्या कहता है?
यह अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानने वाले व्यक्तियों तक सीमित करता है, जबकि अन्य धर्मों के लोगों को इससे बाहर रखता है।
2. धार्मिक धर्मांतरण के बाद अनुसूचित जाति दर्जे का क्या होता है?
यह ईसाई धर्म या इस्लाम जैसे धर्मों में धर्म संपरिवर्तन के तुरंत बाद समाप्त हो जाता है, चाहे व्यक्ति का जन्म किसी भी स्थिति में हुआ हो।
3. क्या कोई व्यक्ति पुन: धर्म संपरिवर्तन के बाद SC का दर्जा वापस पा सकता है?
हाँ, लेकिन केवल मूल जाति के ठोस प्रमाण, वास्तविक पुनः धर्म संपरिवर्तन और समुदाय की स्वीकृति के सख्त प्रमाण के आधार पर ही।
4. धर्म के संदर्भ में ST दर्जा SC दर्जे से किस प्रकार भिन्न है?
अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा धर्मनिरपेक्ष होता है और यह जनजातीय पहचान तथा परंपराओं की निरंतरता पर आधारित होता है।
5. किस आयोग ने SC दर्जे को धर्म से अलग करने की सिफारिश की थी?
न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र आयोग ने SC दर्जे को धर्मनिरपेक्ष बनाने की सिफारिश की।
प्रश्न. मौलिक अधिकारों की निम्नलिखित श्रेणियों में से कौन-सी एक भेदभाव के रूप में अस्पृश्यता के विरुद्ध सुरक्षा को शामिल करती है? (2020)
(a) शोषण के विरुद्ध अधिकार
(b) स्वतंत्रता का अधिकार
(c) संवैधानिक उपचार का अधिकार
(d) समानता का अधिकार
उत्तर: (d)
प्रश्न. यदि किसी विशिष्ट क्षेत्र को भारत के संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अधीन लाया जाए, तो निम्नलिखित कथनों में कौन-सा एक, इसके परिणाम को सर्वोत्तम रूप से प्रतिबिंबित करता है? (2022)
(a) इससे जनजातीय लोगों की ज़मीनें गैर-जनजातीय लोगों को अंतरित करने पर रोक लगेगी।
(b) इससे उस क्षेत्र में एक स्थानीय स्वशासी निकाय का सृजन होगा।
(c) इससे वह क्षेत्र संघ राज्यक्षेत्र में बदल जाएगा।
(d) जिस राज्य के पास ऐसे क्षेत्र होंगे, उसे विशेष कोटि का राज्य घोषित किया जाएगा।
उत्तर: (a)
प्रश्न. क्या राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थानों में अनुसूचित जातियों के लिये संवैधानिक आरक्षण के क्रियान्वयन का प्रवर्तन करा सकता है? परीक्षण कीजिये। (2018)
प्रश्न: स्वतंत्रता के बाद अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के प्रति भेदभाव को दूर करने के लिये, राज्य द्वारा की गई दो मुख्य विधिक पहलें क्या हैं? (2017)
प्रिलिम्स के लिये: अंतर्राष्ट्रीय जल विवाद, सिंचाई, जलविद्युत, सतलुज नदी, सिंधु जल संधि, 1960, सर्वोच्च न्यायालय, धान, गन्ना, अंतर्राष्ट्रीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, अनुच्छेद 262, अनुच्छेद 21, अधिकरण, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग।
मेन्स के लिये: पंजाब-राजस्थान जल बँटवारा विवाद से संबंधित प्रमुख तथ्य, अंतर्राष्ट्रीय जल विवादों में वृद्धि के कारण, अंतर-राज्यीय जल विवादों से संबंधित समाधान एवं प्रावधान और आगे की राह।
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस
पंजाब के मुख्यमंत्री ने एक औपनिवेशिक काल के राजकोषीय समझौते और राज्य के गंभीर भूजल संकट का हवाला देते हुए राजस्थान से 1.44 लाख करोड़ रुपये की मांग की है। यह मांग वर्ष 1960 से राज्य द्वारा उपयोग किये गए 18,000 क्यूसेक जल के लिये की गई है, जिसने एक पुराने अंतर-राज्यीय जल विवाद को फिर से चर्चा में ला दिया है।
पंजाब-राजस्थान विवाद यह संकेत करता है कि जल-संकट से प्रभावित भारत में संघर्ष अब केवल ‘जल-साझाकरण’ तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह “जीवन-साझाकरण” का रूप ले चुका है। ऐसे विवादों का समाधान केवल ऐतिहासिक तटीय दावों पर आधारित होकर संभव नहीं है, इसके लिये बेसिन-स्तरीय प्रबंधन की आवश्यकता है, जिसमें सहकारी संघवाद और डिजिटल ट्विन जैसे तकनीकी साधनों का उपयोग करके पारिस्थितिक संतुलन और राष्ट्रीय जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
दृष्टि मेन्स प्रश्न:
प्रश्न: अंतर-राज्यीय जल विवादों के निदान हेतु संवैधानिक और कानूनी तंत्र पर चर्चा कीजिये। उनकी प्रभावशीलता का मूल्यांकन कीजिये।
1. पंजाब का राजस्थान के विरुद्ध जल विवाद में मूल कानूनी आधार क्या है?
पंजाब ने रिपेरियन (संगम) सिद्धांत और औपनिवेशिक युग के एक वाणिज्यिक समझौते का उल्लेख करते हुए यह तर्क प्रस्तुत किया है कि राजस्थान एक गैर-रिपेरियन राज्य होने के नाते, सतलज जल (Sutleut waters) से सबसे बड़ा आवंटन प्राप्त करने का स्वाभाविक अधिकार नहीं रखता।
2. जल विवादों से संबंधित कौन-सा संवैधानिक प्रावधान है?
अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय जल विवादों का निपटारा करने का अधिकार प्रदान करता है और इस प्रकार उच्च न्यायालय की क्षेत्राधिकारता को समाप्त कर देता है।
3. रिपेरियन सिद्धांत क्या है?
यह उन राज्यों को नदी के जल पर प्राथमिक अधिकार देता है जिनके माध्यम से नदी प्राकृतिक रूप से प्रवाहित होती है।
4. अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 की भूमिका क्या है?
उत्तर: यह विवादों के निपटारे के लिये अधिकरण-आधारित न्याय सुनिश्चित करता है, जिनके पुरस्कारों का कानूनी रूप से बाध्यकारी प्रभाव होता है।
प्रश्न. अंतर-राज्यीय जल विवादों का समाधान करने से संबंधित सांविधिक प्रक्रियाएँ समस्याओं को संबोधित करने व हल करने असफल रही हैं। क्या यह असफलता संरचनात्मक अथवा प्रक्रियात्मक अपर्याप्तता अथवा दोनों के कारण हुई है? चर्चा कीजिये। (2013)
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