दक्षिण में हिंदी विरोधी राजनीति की जमीनी हकीकत अलग! – Lokmat News Hindi


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By उमेश चतुर्वेदी | Updated: April 13, 2026 05:21 IST2026-04-13T05:21:47+5:302026-04-13T05:21:47+5:30
दक्षिण भारत के ताकतवर क्षेत्रीय दलों के लिए हिंदी विरोध राष्ट्रीय दलों को किनारे करने का ताकतवर हथियार रहा है. दक्षिण भारतीय क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दलों को उत्तर भारतीय मानसिकता का नजदीकी जताने-बताने में भी सफल हैं. तमिलनाडु के मौजूदा विधानसभा चुनाव के बीच भी मुख्यमंत्री एमके स्टालिन हिंदी को मुद्दा बना रहे हैं. वे सीधे-सीधे भाजपा पर आरोप लगा रहे हैं कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत वह तीसरी भाषा के नाम पर हिंदी को थोप रही है. कर्नाटक में हिंदी विरोध को लेकर तमिलनाडु जैसा हिंसक आंदोलन तो नहीं हुआ, लेकिन वहां भी विरोधी सुर उठते रहे हैं.
लेकिन इसी कर्नाटक से हिंदी को लेकर आई रिपोर्ट दक्षिण भारतीय राज्यों के हिंदी विरोधी नैरेटिव की पोल खोलती नजर आ रही है. कर्नाटक की बोर्ड परीक्षाओं में नई शिक्षा नीति के तहत तीन भाषाओं की पढ़ाई जरूरी हो चुकी है. नीति के तहत इनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं होनी चाहिए.
आमतौर पर गैरहिंदीभाषी राज्यों के छात्र पहली भाषा के तौर पर अपने राज्य की भाषा को चुनते हैं, दूसरी भाषा के तौर पर अंग्रेजी का ही जोर रहता है. तीसरी भाषा के रूप में कई भारतीय भाषाओं के विकल्प हैं. लेकिन कर्नाटक की बोर्ड परीक्षा में इस साल बैठ रहे जिन आठ लाख दस हजार छात्रों ने तीसरी भाषा का चयन किया है,
उनमें करीब 93 प्रतिशत यानी करीब साढ़े सात लाख छात्रों ने तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को चुना है. कर्नाटक के ठीक बगल के राज्य तमिलनाडु में हिंदी को लेकर छात्रों में ऐसा उत्साह नहीं दिख रहा तो इसकी वजह यह है कि सत्ताधारी द्रमुक राजनीति ने राज्य में त्रिभाषा फॉर्मूला अभी लागू नहीं किया है. वह इसे हिंदी थोपने का बहाना मानती है.
ठीक चुनावों के बीच स्टालिन द्वारा हिंदी थोपने का मुद्दा बनाने का उद्देश्य राज्य में हिंदी को लेकर ध्रुवीकरण करना है. इसके जरिये वे अपने विरोधी गठबंधन की अगुआई कर रही अन्नाद्रमुक के सामने धर्मसंकट की स्थिति बनाने की कोशिश कर रहे हैं. स्टालिन हिंदी थोपने की केंद्रीय राजनीति की आलोचना के लिए अन्नाद्रमुक को मजबूर कर रहे हैं.
अन्नाद्रमुक अगर हिंदी थोपने की बात को स्वीकार नहीं करती तो स्टालिन जनता के बीच संदेश दे सकते हैं कि अन्नाद्रमुक तमिल स्वाभिमान को नहीं मानती और अगर वह स्टालिन की तरह त्रिभाषा फॉर्मूले को हिंदी थोपने से जोड़ती है तो भाजपा के साथ गठबंधन पर असर पड़ सकता है या भाजपा के लिए जवाब देना मुश्किल होगा.
लेकिन इतना तय है कि अगर तमिलनाडु में भी हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ने का मौका मिले तो वहां भी छात्रों की संख्या बढ़ सकती है. इससे हिंदी विरोधी राजनीति की पोल कुछ वैसे ही खुल सकती है, जिस तरह कर्नाटक के छात्रों के चयन से हुआ है. हिंदी विरोधी आंदोलन में हिस्सा ले चुकी तमिल पीढ़ी अब बुजुर्ग हो चुकी है.
वह मानती है कि हिंदी न सीखने की वजह से उसे बहुत नुकसान उठाना पड़ा है. इसलिए राज्य में हिंदी सिखाने वाली संस्थाओं की संख्या बढ़ी है. कई पब्लिक स्कूल अपने विज्ञापन में हिंदी पढ़ाने को अपने यहां की विशेष सहूलियत के रूप में दिखाते हैं.
तमिलनाडु और कर्नाटक के पड़ोसी केरल में मतदान हो चुका है. यहां के लोगों में अपनी मलयालम भाषा को लेकर गहरा प्रेम है. वे हिंदी से शिद्दत से प्यार भले न करें लेकिन तमिलनाडु की तरह विरोध भी नहीं करते. यही स्थिति कर्नाटक की भी है.
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