नफरतों के इस दौर में मुल्क में क्या है शंकर–शाद मुशायरा की अहमियत ? – Zee News

 “शंकर–शाद मुशायरा” भारत की एक सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत है, जिसमें उर्दू शायरी की खूबसूरती, ग़ज़ल, नज़्म और अदबी संगम देखने को मिलता है. गुरुवार को दिल्ली के मॉडर्न स्कूल में इसका 57वां आयोजन किया गया. इसके महत्त्व पर चर्चा कर रहे हैं, लेखक और मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलाधिपति फिरोज बख्त अहमद. 
 
Trending Photos
हमारी यह दुनिया नफरतों के आखरी स्टेज में है,
अब इसका इलाज, मुहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं!”

मशहूर शायर, चरण सिंह बशर के इस शेर पर लोग खड़े हो कर तालियां बजाने लगे, क्योंकि यह शेर और बहुत से और शेर व ग़ज़लें, इस वक़्त दुनिया में चल रही जंग और बर्बादी पर थे.

Add Zee News as a Preferred Source

इस मौके पर साहिर लुधियानवी की युद्ध के विरुद्ध बुद्ध की बात करती कविता भी प्रसिद्ध उर्दू कवि इकबाल अशहर ने 1944 से चल रहे विश्व विख्यात ‘शंकर-शाद मुशायरे’ में पढ़ी जो आज के जंग के परिदृश्य में पूर्ण रूप से फिट बैठती है.
 
साहिर लुधियानवी की जंग के खिलाफ बुद्ध की बात करती कविता भी मशहूर उर्दू कवि इकबाल अशहर ने सुनाई जो आज के जंग के परिदृश्य में पूर्ण रूप से फिट बैठती है.  
मुल्क का सबसे पुराना मुशायरा, यानी “शंकर–शाद मुशायरा” एक सांस्कृतिक और साहित्यिक प्रोगराम के तौर पर जाना जाता है, जिसमें उर्दू शायरी की खूबसूरती, ग़ज़ल, नज़्म और अदबी माहौल का संगम देखने को मिलता है. “शंकर–शाद”: आम तौर पर यह नाम दो शख्सियतों या परंपराओं के मेल को दर्शाता है-‘शंकर’ (हिंदू सांस्कृतिक प्रतीक) और ‘शाद’ (उर्दू/मुस्लिम अदबी रंग).
 इस मुशायरे की एक विशेषता यह भी है कि इसने शायरी से इश्क रखने वाले सभी हिन्दुस्तानियों और पाकिस्तानियों के दिल जोड़े हैं. दरअसल, इस मुशायरे की शुरूआत पाकिस्तान के लायलपुर (अब फैसलाबाद) में डीसीएम श्रीराम दौराला के मालिक लाल श्रीराम ने पहला मुशायरा ‘इंडो-पाक मुशायरा’ के नाम से कराया था, जो हिंद-पाक जंग की वजह से बंद रहा मगर आज भी दिल्ली के मॉडर्न स्कूल के अंदर उसकी 57वीं नशिस्त लगी, जिसमें हर उम्र और विशेष रूप से इतने ज्यादा युवा वर्ग के लोग थे कि हॉल में जगह न मिलने की वजह से उर्दू शायरी के उतने ही चाहने वाले बाहर बास्केटबॉल कोर्ट्स पर बैठे बड़े स्क्रीनों पर देख रहे थे.
इस मुशायरे में प्रो. वसीम बरेलवी, जावेद अख्तर, शीन काफ निज़ाम, राजेश रेड्डी, इक़बाल अशहर, चरण सिंह बशर, शबीना अदीब, शकील आज़मी, अज़हर इक़बाल, हिलाल फरीद, सुनील कुमार टैंग, हिना हैदर रिज़वी, सैफ़ निजामी और ज़ुबैर अली ताबिश ने ऐसा सामान बांधा कि लोग लगातार ‘मुकर्रर’, ‘जबरदस्त’, ‘बेहतरीन’, ‘लाजवाब’, ‘बेमिसाल’ वगैरह की सदाएं लगते रहे और शायरों की हौसला अफजाई की. 
ये मुशायरे और कवि सम्मेलन हमारी साझा विरासत और गंगा जमुनी परंपरा का पता देते हैं. शेर-ओ-शायरी वास्तव में जीवन के सभी भावों को बड़ी सूक्ष्मता से छूती है. हरदिल अज़ीज़ शायर, प्रो. वसीम बरेलवी का शेर मन, मस्तिष्क और आत्मा को छू गया!
“उसूलों पर जब आंच आए तो टकराना जरूरी है,
जो जिंदा हो तो ज़िंदा नजर आना ज़रूरी है!”

ऐसे ही एक और विश्व विख्यात शायर और मुंबई फिल्म जगत के बड़े नाम, राजेश रेड्डी ने क्या ख़ूब कहा:
“मेरी जिंदगी के कितने हिस्सेदार हैं लेकिन, 
किसी की ज़िन्दगी में मेरा हिस्सा क्यों नहीं होता!”

लाल श्रीराम की खासियत थी कि वेव बड़े ही संस्कारी और मेहमाननवाज थे. कर्ज़न रोड (कस्तूरबा गांधी मार्ग) पर अपनी कोठी पर वे आए दिन शायरी की बैठकें रखते, जिनके बाद चाय, भोजन आदि की दावतें होतीं. संस्कारी इतने थे कि जब तक दस्तरख्वान पर खाने नहीं नहीं आते की जब तक एक, एक व्यक्ति अपना स्थान ग्रहण नहीं कर लेता.  
ये संस्कार अभी इस परिवार से लुप्त नहीं हुए हैं, क्योंकि आज भी इनकी पासदरी और रखवाली, इस पीढ़ी के मौजूदा सर्वेसर्वा, माधव 
बंसीधर श्रीराम कर रहे हैं, जिन्हें उर्दू से उतना ही प्यार है, जितना इनके पुरखों को! मुशायरे बड़े महंगे पड़ते हैं, मगर माधव किसी से भी कोई स्पॉन्सरशिप नहीं करवाते, जैसे और मुशायरों में होता है.
जरा शबीना अदीब की करारी आवाज में यह शेर देखें:
“वोह जो घर आते हैं मेहनत की कमाई लेकर,
उनके बच्चों को हमने बिगाड़ते नहीं देखा!”

क्या ख़ूब कहा है, इकबाल अशहर ने:
“किसी को कांटों से चोट पहुंची, किसी को फूल ने मार डाला, 
जो बच गए, उन्हें उसूलों ने मार डाला!” 

अशहर का ही यह शेर भी है:
“मैं नीचा हो गया अपनी नजर में, 
मेरी आवाज़ जब ऊंची हो गई थी!”

हैरानी की बात है कि इन मुशायरों में मुस्लिमों से ज्यादा ग़ैर मुस्लिम पहुंचते हैं. जावेद अख्तर ने बताया कि ‘शंकर–शाद मुशायरा’ सिर्फ शायरी का मंच नहीं, बल्कि यह बताता है कि अदब और कला किसी एक धर्म या वर्ग की नहीं होती, बल्कि सबको जोड़ने का माध्यम होती है, जैसा माधव श्रीराम द्वारा इसका संरक्षण किया जा रहा है.  
लेखक: 
फिरोज बख्त अहमद पूर्व कुलाधिपति और भारत रत्न मौलाना आज़ाद के वंशज हैं. 
 
.
Thank you
By clicking “Accept All Cookies”, you agree to the storing of cookies on your device to enhance site navigation, analyze site usage, and assist in our marketing efforts.

source.freeslots dinogame telegram营销

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Toofani-News