नास्तिक भी हिंदू हो सकता है…', सबरीमला पर बहस, कोर्ट में 'खुल गए' सारे ग्रंथ – AajTak

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सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सबरीमाला विवाद को लेकर सुनवाई शुरू हुई है.  CJI सूर्यकांत  ने महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश और आस्था के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद को सुलझाने के लिए 9 जजों की बेंच गठित करने का ऐतिहासिक कदम उठाया है. सुनवाई में केंद्र सरकार की ओर से भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता अपने तर्क रखे. 
सुनवाई के दौरान सीधे सबरीमाला मामले पर चर्चा शुरू नहीं हुई, बल्कि भारत में हर वर्ग की आस्था, संप्रदाय के पंथ और उनकी परंपराओं व पहचान पर बात हुई. केंद्र सरकार के समर्थन वाली पुनर्विचार याचिकाओं में कहा गया है कि महिलाओं के प्रवेश पर रोक किसी भी तरह के भेदभाव या महिलाओं की हीनता की सोच पर आधारित नहीं है. याचिकाओं में दलील दी गई है कि सबरीमावा में प्रतिबंध भगवान अयप्पा के ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ स्वरूप से जुड़ा हुआ है, जो इस धार्मिक परंपरा का एक जरूरी हिस्सा है.
इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि किसी धर्म की ‘जरूरी धार्मिक प्रथा’ में न्यायिक समीक्षा के जरिए हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह उस संप्रदाय की मूल पहचान और आस्था से जुड़ा विषय है. यह मामला सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2018 के फैसले से जुड़ा है. तब सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने बहुमत से फैसला सुनाते हुए 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर लगी पाबंदी को असंवैधानिक घोषित कर दिया था. 
शीर्ष अदालत ने कहा था कि यह परंपरा महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) की मूल भावना के खिलाफ है.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी दलीलों में जब अपनी बात रखनी शुरू की, तो उन्होंने सनातन परंपरा की विरासत को समझाया. उन्होंने कहा- हिंदू धर्म में बहुलता (plurality) है. यह केवल ईसाई या यहूदी की तरह एक धर्म नहीं है, बल्कि यह एक जीवन जीने का तरीका (way of life) है.
हिंदू धर्म, ईसाई, इस्लाम, यहूदी, इन सभी में अलग-अलग संप्रदाय (denominations) हैं.
उन्होंने कहा कि ‘धर्म’ (Religion) और ‘धार्मिक मामलों’ (Religious Affairs) के बीच अंतर होता है. संविधान सभा ने भी माना था कि हिंदू धर्म में अलग-अलग संप्रदाय हैं. उन्होंने गणपति विसर्जन का उदाहरण दिया, यह दिखाने के लिए कि गणपत्य समुदाय की कुछ विशेष प्रथाएं होती हैं, जिन्हें पूरा धर्म नहीं अपनाता. इसमें सीमाएं हैं, हर संप्रदाय की प्रथाओं को समझने के लिए विषय-विशेष ज्ञान (subject-specific expertise) की जरूरत होती है.
उन्होंने कहा कि, सनातन धर्म में 4 वेद हैं, जो अलग-अलग बातें बताते हैं. इसके बाद 4 उपवेद हैं. फिर 6 वेदांग हैं. 4 उपांग हैं, जिनमें धर्मशास्त्र, पुराण शामिल हैं, 18 महापुराण और 18 उपपुराण आते हैं. इसके बाद न्यायशास्त्र और मीमांसा ग्रंथ हैं. इनके भी 6 मान्यता प्राप्त अंग हैं. यह सब आस्तिक दर्शन का हिस्सा है. हिंदू धर्म की खासियत यह भी है कि यह नास्तिकों को भी मान्यता देता है. यानी आप ईश्वर में विश्वास न रखते हुए भी हिंदू हो सकते हैं.
इसके बाद 6 आगम शास्त्र हैं.
शाक्त,
शैव,
वैष्णव,
गणपत्य,
कुमार (भगवान मुरुगन),
सौर्य (सूर्य नारायण की उपासना करने वाले).
नास्तिक दर्शन यानी वे जो ईश्वर में विश्वास नहीं करते. मुझे यह जानकर आश्चर्य और गर्व हुआ कि चार्वाक दर्शन हजारों साल पुराना है और चार्वाक ईश्वर को नहीं मानते. उनका कहना है कि कोई सर्वोच्च शक्ति नहीं है जो आपके भाग्य को नियंत्रित करती हो. जैसे एक पेड़ मरता है, वैसे ही इंसान भी मर जाता है.
जैन और बौद्ध दर्शन भी ‘ईश्वर या परलोक’ में विश्वास नहीं करते.
इस पर पीठ की ओर से प्रश्न किया गया कि आप कैसे कह सकते हैं कि जैन और बौद्ध ईश्वर में विश्वास नहीं करते? अगर परलोक नहीं है, तो तीर्थंकरों का पुनर्जन्म कैसे होता है? वहीं जस्टिस बागची ने कहा कि, हम ‘pursuit of happiness’ के विचार को John Locke और अमेरिकी दर्शन से जोड़ते हैं, लेकिन यह वास्तव में चार्वाक संहिता से आता है, जो कहती है कि आप जीवित हैं, इसलिए भौतिक सुखों को प्राप्त करें. यह जीवन का एक अस्तित्ववादी सिद्धांत है.
इस पर तुषार मेहता ने कहा कि,  ‘वे परलोक में विश्वास नहीं करते, लेकिन पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं. बौद्ध धर्म में महानिर्वाण की अवधारणा है, जहां मुक्ति मिलती है और फिर पुनर्जन्म नहीं होता. वे भगवान की मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करते.’ इसके बाद संत आदि शंकराचार्य, जिन्होंने हिंदू धर्म के विविध दर्शन को 10 पहलुओं में व्यवस्थित किया, जिसे दशानाम कहा जाता है. जैसे गिरी, तीर्थ आदि. हर संप्रदाय के अलग तिलक और अभिवादन होते हैं,  जैसे ‘अलख निरंजन’.
कुछ लोग ग्रंथों में विश्वास करते हैं उदाहरण के तौर पर सिख धर्म. मैं मूर्तियों या भगवान में विश्वास न रखते हुए भी हिंदू हो सकता हूं. यही हिंदू धर्म का बहुलतावाद है. 
इस्लाम में भी 5 मुख्य तत्व हैं. इसका पवित्र ग्रंथ कुरान है. लेकिन सिद्धांतों में भिन्नता के आधार पर इसमें भी कई संप्रदाय हैं. सुन्नी, शिया, खवारिज, ये इस्लाम के संप्रदाय हैं. हिंदू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म को एक व्यापक श्रेणी के रूप में लेकर ‘धर्म’ की परिभाषा तय न करें, इनके भीतर कई संप्रदाय और उप-संप्रदाय हैं.
इसीलिए अनुच्छेद 25 और 26 सिर्फ “धर्म” नहीं कहते, बल्कि “वर्गों” (sections) को भी मान्यता देते हैं.
गुरु आधारित संप्रदाय भी हैं, जैसे शिरडी, यह किसी एक संप्रदाय तक सीमित नहीं है. हिंदू, मुसलमान सभी वहां जाते हैं. तिरुपति बालाजी एक वैष्णव तीर्थ है, लेकिन सभी हिंदू वहां जाते हैं. सबरीमाला में भी अलग-अलग प्रथाएं हैं. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और निजामुद्दीन औलिया की दरगाह में सभी लोग जाते हैं. इसे एक संप्रदाय के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए.
भारतीय धार्मिक संरचना स्वभाव से ही बहुलतावादी (plural) है. हमारा समाज धर्म और धर्मनिरपेक्षता को पश्चिम की तरह परिभाषित नहीं करता. हमने अनुच्छेद 25 और 26 के संवैधानिक सिद्धांतों को अमेरिकी संविधान से नहीं लिया है, यह भारतीय परिस्थितियों के अनुसार तैयार किया गया है.
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, अनुच्छेद 25/26 आयरलैंड के संविधान से लिए गए हैं, जहां एक प्रोटेस्टेंट राजा के अधीन कैथोलिक धर्म को विशेष दर्जा प्राप्त था. इस पर एसजी तुषार मेहता ने कहा कि, पहले के सभी फैसलों में हमने आंतरिक बहुलता (internal plurality) की ओर ध्यान नहीं दिलाया है. बौद्ध धर्म को देखें, गौतम बुद्ध की शिक्षाएं और फिर 18 ग्रंथ और उपदेश. महायान और वज्रयान बौद्ध धर्म अलग-अलग हैं.
महायान बौद्ध धर्म में शैव तांत्रिक और बौद्ध धर्म के तत्व भी शामिल हैं, जो भूटान, सिक्किम और कुछ अन्य क्षेत्रों में प्रचलित है. वज्रयान बौद्ध धर्म में भी कुछ प्रभाव देखे जाते हैं. ईसाई में भी संप्रदाय और उप-संप्रदाय हैं.
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