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बिहार में आंतरिक खींचतान के बीच कांग्रेस ने अब संगठन के सहारे सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है. लंबे इंतजार के बाद पार्टी ने 53 संगठनात्मक जिलों में नए जिलाध्यक्षों की नियुक्ति कर दी है. सोमवार शाम जारी इस सूची में 43 नए चेहरे शामिल किए गए हैं, जबकि 10 नेताओं को दोबारा मौका मिला है.
कांग्रेस का ये बदलाव 2026 चुनाव से पहले रणनीतिक संकेत है. यह फैसला ऐसे वक्त में लिया गया है, जब 2025 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को महज 6 सीटों पर सिमटना पड़ा था. इसके बाद राज्यसभा चुनाव में भी पार्टी को झटका लगा, जब उसके 6 में से 3 विधायक अनुपस्थित रहे. इसने पार्टी का आंतरिक संकट सामने ला दिया.
बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा. प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम और विधानमंडल दल के नेता शकील अहमद खान तक चुनाव हार गए. इसके अलावा फरवरी 2024 के फ्लोर टेस्ट में क्रॉस-वोटिंग और राज्यसभा चुनाव के दौरान विधायकों की अनुपस्थिति ने पार्टी के भीतर अनुशासनहीनता उजागर कर दिया.
कांग्रेस के बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरू और प्रदेश नेतृत्व पर भी सवाल उठे. इससे संगठन को लेकर असंतोष बढ़ गया. ऐसे माहौल में यह पुनर्गठन कांग्रेस के लिए एक जरूरी कदम माना जा रहा है. कांग्रेस ने ‘संगठन सृजन अभियान’ के तहत यह बदलाव किया है. AICC के पर्यवेक्षकों ने जिलों का दौरा कर रिपोर्ट तैयार की है.
इसके बाद राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल की मंजूरी और मल्लिकार्जुन खरगे के नेतृत्व में यह सूची तैयार हुई. इस लिस्ट में सबसे खास बात जातीय संतुलन को लेकर की गई कवायद है. पार्टी ने दलित, सवर्ण और मुस्लिम समुदायों को संतुलित प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है. ब्राह्मण और यादव समुदाय को सबसे ज्यादा तवज्जो दी गई है.
वोट बैंक को जोड़ने की कोशिश
दोनों जातियों से 10-10 जिलाध्यक्ष बनाए गए हैं. इसके अलावा 7-7 मुस्लिम, दलित और भूमिहार नेताओं को भी संगठन में अहम भूमिका दी गई है. वहीं 5 जिलाध्यक्ष राजपूत समुदाय से बनाए गए हैं. कुल मिलाकर 38 जिलों में सवर्ण, दलित और मुस्लिम नेताओं को कमान सौंपी गई है. इस तरह कांग्रेस पुराने वोट बैंक को जोड़ने की कोशिश कर रही है.
RJD से अलग राह का संकेत?
यादव समुदाय को 10 जिलाध्यक्ष देने को राजनीतिक नजरिए से अहम माना जा रहा है. इसे आरजेडी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने और कांग्रेस के स्वतंत्र राजनीतिक विस्तार के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है. वहीं ब्राह्मण समुदाय को बराबर प्रतिनिधित्व देकर पार्टी सवर्ण वोटर्स को भी साधने की कोशिश में है.
किस जिले में किसे जिम्मेदारी
यह रुख प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के दलित-केंद्रित नेतृत्व से अलग नजर आता है. कई अहम जिलों में दिलचस्प नियुक्तियां की गई हैं. पटना ग्रामीण-1 में चंदन कुमार (भूमिहार), पटना ग्रामीण-2 में गुरजीत सिंह (सिख) और पटना शहरी में कुमार आशीष (कायस्थ) को जिम्मेदारी दी गई है. अररिया में मोहम्मद मासूम रजा और अरवल में मोहम्मद कैफ को जिलाध्यक्ष बनाया गया है.
शहरी क्षेत्र में सवर्ण समुदाय
औरंगाबाद में आनंद शंकर सिंह, भागलपुर में प्रवीण सिंह कुशवाह और भोजपुर में डॉ. श्रीधर तिवारी को जिम्मेदारी मिली है. वैशाली शहरी में संजय मिश्रा को कमान सौंपी गई है. इसके अलावा बेतिया में राकेश कुमार यादव और मुंगेर में राजेश मिश्रा को जिलाध्यक्ष बनाया गया है. पटना जैसे महत्वपूर्ण शहरी क्षेत्र में सवर्ण समुदाय को प्राथमिकता दी गई है.
… लेकिन चुनौती अभी बाकी
इसे कांग्रेस के शहरी वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. हालांकि, यह नई सूची कांग्रेस के संगठन को नई दिशा देने की कोशिश जरूर है, लेकिन असली चुनौती अभी बाकी है. पार्टी को न सिर्फ आंतरिक अनुशासन को मजबूत करना होगा, बल्कि जातीय समीकरणों को वोट में बदलने की भी बड़ी चुनौती है.
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