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भारत की 'मेक इन इंडिया' और पीएलआई योजना पर अमेरिका और चीन ने आपत्ति जताई है, इसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों का उल्लंघन बताया है। …और पढ़ें
मेक इन इंडिया पर अमेरिका-चीन की आपत्ति (फाइल फोटो)
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत सरकार का ‘मेक इन इंडिया’ अभियान, जिसका मकसद देश को बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना है, अब अमेरिका और चीन जैसे दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के विरोध का सामना कर रहा है।
भारत इस समय दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और आने वाले वर्षों में तीसरे स्थान पर पहुंचने का लक्ष्य रखता है। लेकिन अमेरिका और चीन का कहना है कि भारत की सब्सिडी नीतियां अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों का उल्लंघन करती हैं।
इस विवाद के केंद्र में भारत की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना है, जिसे 2020 में मोदी सरकार ने शुरू किया था। इस योजना का मकसद घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना है। यह योजना इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, सोलर उपकरण और मेडिकल डिवाइस सहित 14 क्षेत्रों में लागू है और इसके लिए कुल ₹1.91 लाख करोड़ (करीब 21 अरब डॉलर) का प्रावधान है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और चीन जैसे व्यापारिक साझेदारों का कहना है कि इन प्रोत्साहनों से भारतीय कंपनियों को विदेशी कंपनियों पर अनुचित बढ़त मिलती है। सोलर सेक्टर में वॉरी एनर्जीज लिमिटेड, अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड और रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड जैसी कंपनियों को पीएलआई और अन्य सरकारी उपायों का लाभ मिला है।
बुधवार को अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले सोलर उपकरणों पर 126% तक का प्रारंभिक टैरिफ लगाने की घोषणा की। अमेरिका का निष्कर्ष है कि भारतीय सोलर उद्योग को सरकार से अनुचित समर्थन मिला है। विश्लेषकों का मानना है कि इतने ऊंचे टैरिफ के बाद भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाएगा।
इसी बीच, विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के विवाद निपटान निकाय ने चीन की शिकायत पर एक पैनल बनाने का फैसला किया है। चीन का आरोप है कि भारत की ऑटोमोबाइल और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र की प्रोत्साहन योजनाएं घरेलू उत्पादों को बढ़ावा देती हैं और आयातित सामान को नुकसान पहुंचाती हैं।
डब्ल्यूटीओ की प्रक्रिया के तहत पहले दोनों देशों के बीच बातचीत हुई थी, लेकिन समाधान नहीं निकल सका। इसके बाद पैनल गठित किया गया। भारतीय अधिकारियों ने कहा है कि सरकार अपनी योजनाओं का मजबूती से बचाव करेगी और उनका मानना है कि ये योजनाएं डब्ल्यूटीओ नियमों के अनुरूप हैं।
ये प्रोत्साहन योजनाएं भारत की उस रणनीति का हिस्सा हैं, जिसके तहत देश में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 25% तक बढ़ाना है। फिलहाल मैन्युफैक्चरिंग का योगदान करीब 17% है।
नई दिल्ली के स्वतंत्र व्यापार विशेषज्ञ और पूर्व जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बिस्वजीत धर का कहना है कि पीएलआई जैसी योजनाओं के बिना मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को फिर से मजबूत करना मुश्किल होगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भारत को तकनीक और नवाचार में ज्यादा निवेश जैसे वैकल्पिक तरीकों पर भी ध्यान देना चाहिए।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब भारत अमेरिका और चीन दोनों के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है। हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार तनाव कम हुआ है, जबकि चीन के साथ भी रिश्ते सुधारने की कोशिशें जारी हैं।
दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका और चीन खुद भी अपनी सब्सिडी नीतियों को लेकर सवालों के घेरे में रहे हैं। 2024 में चीन ने अमेरिका के मुद्रास्फीति कमी अधिनियम 2022 को डब्ल्यूटीओ में चुनौती दी थी। वहीं, यूरोपीय देशों ने भी चीन पर इलेक्ट्रिक वाहन और सोलर उद्योग को भारी सब्सिडी देने के आरोप लगाए हैं।
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