मोटी सैलरी, लग्जरी ऑफ‍िस… लेकिन खुशी नहीं थी! Apple का ये पूर्व कर्मचारी नौकरी छोड़ चला रहा ऑटो – AajTak

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कॉर्पोरेट की ऊंची इमारतें, मोटा पैकेज और एप्पल (Apple) जैसी दिग्गज कंपनी में काम करना… ये वो सपने हैं जिनके लिए लाखों युवा दिन-रात एक कर देते हैं. लेकिन क्या यह चकाचौंध हमेशा सुकून देती है? बेंगलुरु के रहने वाले राकेश बी. पाल की कहानी हमें एक अलग ही आईने से रूबरू कराती है. राकेश आज एक इलेक्ट्रिक ऑटो चलाते हैं, लेकिन यह उनकी मजबूरी नहीं, बल्कि उनकी ‘जीत’ है.
एप्पल से शुरुआत और फिर कॉर्पोरेट का ‘अंधेरा’
राकेश ने अपने करियर की शानदार शुरुआत टेक दिग्गज एप्पल के साथ की थी. इसके बाद उन्होंने कई बड़े बैंकों और कंप्यूटर निर्माता कंपनियों के साथ काम किया. लेकिन जल्द ही उन्हें कॉर्पोरेट जगत के भीतर छिपे ‘मैनिपुलेशन’ के पैटर्न समझ आने लगे. राकेश बताते हैं कि शुरुआत में सब अच्छा था, लेकिन धीरे-धीरे मुझे अहसास हुआ कि वहां सिर्फ लोगों का इस्तेमाल किया जाता है. मैं एक ‘पीपल प्लीजर’ बन गया था, जो दूसरों को खुश करने में खुद को भूल चुका था. ऐसा लगने लगा था कि मेरे पास सभी सुव‍िधाएं हैं लेकिन मन की खुशी क्यों नहीं है. 
बचपन का ट्रॉमा और मानसिक संघर्ष
राकेश की चुनौतियां सिर्फ ऑफिस तक सीमित नहीं थीं. उनके निजी जीवन में भी ‘नार्सिसिज्म’ का साया था. उनके पिता और फिर वैवाहिक जीवन में मिले कड़वे अनुभवों ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया था. हालात इतने खराब हुए कि उन्हें NIMHANS और विक्टोरिया अस्पताल में इलाज कराना पड़ा, लंबे समय तक एंटी-डिप्रेसेंट्स का सहारा लेना पड़ा. वो कहते हैं, ‘मैं घंटों एक ही जगह बैठा रहता था, एक ही ख्याल दिमाग में 6-7 घंटे चलता रहता. मैंने खुद को घर में कैद कर लिया था.’ 
खुद की तलाश: इंटरमिटेंट फास्टिंग से मार्शल आर्ट्स तक
राकेश ने तय किया कि वो दवाइयों के गुलाम नहीं बनेंगे. उन्होंने मनोविज्ञान पर रिसर्च शुरू की और ‘डार्क ट्रायड’ (नार्सिसिज्म, मैकियावेलियनवाद और साइकोपैथी) को समझा. यहीं से उन्होंने खुद पर काम करना शुरू किया. 
सबसे पहले इंटरमिटेंट फास्टिंग के जरिए 15 किलो वजन घटाया. उन्होंने अपने बचपन के शौक को जिंदा किया और मुवा थाई और जू-जित्सू सीखा. फिर इसी में उन्होंने स्टेट लेवल चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल तक जीता और ये यात्रा अभी जारी है. 
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सफाई कर्मचारी से ‘आजाद’ ऑटो ड्राइवर तक
कॉर्पोरेट की नौकरी छोड़ने के बाद राकेश ने हर छोटा-बड़ा काम किया. उन्होंने फूड डिलीवरी की, बाइक टैक्सी चलाई और एक जिम में सहायक कोच के तौर पर फर्श और टॉयलेट तक साफ किए. राकेश के लिए कोई काम छोटा नहीं था, क्योंकि हर काम उन्हें ‘खुद’ के करीब ला रहा था.
पिछले 4 सालों के संघर्ष के बाद, अब राकेश बेंगलुरु की सड़कों पर अपना इलेक्ट्रिक ऑटो चलाते हैं. इसके साथ ही वो डांस क्लासेस लेते हैं और पेंटिंग का अपना शौक भी पूरा करते हैं.
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