ई-बसों की फ्लीट के मामले में देश का नंबर-एक राज्य बन चुकी दिल्ली को जल्द ही 2800 इलेक्ट्रिक बसें और मिलेंगी। पीएम ई-ड्राइव स्कीम के तहत ये बसें इसी साल अलग-अलग चरणों में मिल जाएंगी।
इसके बाद दिल्ली के बेड़े में बसों की संख्या बढ़कर करीब नौ हजार हो जाएगी। इन बसों के रूटों पर उतर जाने के बाद दिल्ली में बसों का वेटिंग टाइम भी कम हो जाएगा। दिल्ली में बीते दिनों 300 इलेक्ट्रिक बसों को बेड़े में शामिल किया गया है, जिसके बाद राजधानी में कुल बसों की संख्या 6100 हो गई है। इनमें 4338 बसें इलेक्ट्रिक हैं।
दिल्ली परिवहन विभाग के मुताबिक पीएम ई-ड्राइव योजना के तहत 2800 बसों की डिमांड काफी पहले भेज दी गई थी। इस स्कीम के तहत जल्द ही बसें मिलनी शुरू हो जाएंगी। अलग-अलग चरणों में इनमें से 1380 बसें डीटीसी को और 1420 बसें दिल्ली परिवहन विभाग को मिलेंगी। इन सभी बसों को दिल्ली की सड़कों पर उतारा जाएगा, ताकि यात्रियों का सफर और आसान बन सके। इन 2800 बसों में 12 मीटर लंबी बसें मुख्य मार्गों के लिए, नौ मीटर और सात मीटर लंबी बसें संकरे मार्गों पर संचालन के लिए मिलेंगी।
परिवहन विभाग ने 3330 और बसों की डिमांड भेजी
इन 2800 बसों के अलावा परिवहन विभाग की ओर से 3330 अन्य बसों की डिमांड भी केंद्र सरकार को भेजी गई है। पीएम ई-ड्राइव स्कीम के तहत ये बसें अगले साल मिलने की उम्मीद है। आगामी दो साल में दिल्ली को कुल 6130 इलेक्ट्रिक बसें मिल सकती हैं। वहीं दिल्ली सरकार का कहना है कि साल 2029 तक दिल्ली में इलेक्ट्रिक बसों के बेड़े को बढ़ाकर 12 हजार तक ले जाने का लक्ष्य तय किया गया है। दिल्ली में बसों की फ्लीट को पूरी तरह इलेक्ट्रिक में परिवर्तित कर दिया जाएगा।
वेटिंग टाइम कम होगा
दिल्ली में फिलहाल सार्वजनिक परिवहन के लिए करीब 6100 बसें हैं। इनमें से करीब 95 फीसदी बसों की आउट शेडिंग होती है। यानी करीब 5800 बसें रोजाना संचालन में रहती हैं, जबकि यात्रियों की संख्या के अनुपात में करीब 11 हजार बसों की आवश्यकता है। इसके चलते बसों की कमी है और बस स्टॉप पर यात्रियों को औसतन आधे घंटे बस का इंतजार करना पड़ रहा है। डीटीसी का कहना है कि वेटिंग समय कम करके औसतन 10 मिनट से भी कम करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए रूटों का पुनर्निर्धारण भी किया जाएगा।
सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह ‘लाइव हिन्दुस्तान’ में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के ‘डीडी न्यूज’ से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।
ज्यादातर नेशनल और स्टेट डेस्क पर काम करने का अवसर मिलने के कारण राजनीतिक और सामाजिक विषयों से जुड़ी खबरों में दिलचस्पी बढ़ती गई। कई लोकसभा और विधानसभा चुनावों की खबरों की पैकेजिंग टीम का हिस्सा रहने के कारण भारतीय राजनीति के गुणा-भाग को समझने का मौका मिला।
शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो सुबोध ने बीएससी (ऑनर्स) तक की अकादमिक शिक्षा हासिल की है। साइंस स्ट्रीम से पढ़ने के कारण उनके पास चीजों को मिथ्यों से परे वैज्ञानिक तरीके से देखने की समझ है। समाज से जुड़ी खबरों को वैज्ञानिक कसौटियों पर जांचने-परखने की क्षमता है। उन्होंने मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। इससे उन्हें खबरों के महत्व, खबरों के एथिक्स, खबरों की विश्वसनीयता और पठनीयता आदि को और करीब से सीखने और लिखने की कला में निखार आया। सुबोध का मानना है कि खबरें हमेशा प्रमाणिकता की कसौटी पर कसा होना चाहिए। सुनी सुनाई और कल्पना पर आधारित खबरें काफी घातक साबित हो सकती हैं, इसलिए खबरें तथ्यात्मक रूप से सही होनी चाहिए। खबरों के चयन में क्रॉस चेकिंग को सबसे महत्वपूर्ण कारक मानने वाले सुबोध का काम न सिर्फ पाठकों को केवल सूचना देने भर का है बल्कि उन्हें सही, सुरक्षित और ठोस जानकारी उपलब्ध कराना भी है।
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