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अमेरिका-ईरान युद्ध अब 19वें दिन में प्रवेश कर चुका है, जिस कारण पूरे पश्चिम एशिया में तनाव बना हुआ है. इस युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान की नाकेबंदी के कारण सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ रहा है, जिसका असर भारत के कई प्रमुख क्षेत्रों पर दिखने लगा है.
भारत अपनी जरूरत का लगभग एक-तिहाई केमिकल और फर्टिलाइजर पश्चिम एशियाई देशों से आयात करता है. ऐसे में सप्लाई या शिपिंग में किसी भी तरह की बाधा से फर्टिलाइजर की उपलब्धता घट सकती है और आयात लागत बढ़ सकती है. इससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा. फर्टिलाइजर की कीमतें बढ़ने पर किसान इनका कम इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे फसलों के उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ने की आशंका है.
युद्ध से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर बढ़ा दबाव
एल्युमिनियम और कॉपर जैसे मेटल कंस्ट्रक्शन, इलेक्ट्रिसिटी, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के लिए बेहद अहम हैं. अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच भारत ने पश्चिम एशिया से इन धातुओं और उनसे जुड़े उत्पादों का करीब 3.4 अरब डॉलर का आयात किया, जो इस श्रेणी के कुल आयात का लगभग 18 प्रतिशत है. सप्लाई बाधित होने से प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ सकती है और राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं में देरी हो सकती है.
भारत अपनी कच्चे प्लास्टिक की मांग का लगभग 18 प्रतिशत भी इसी क्षेत्र से आयात करता है. वित्त वर्ष 2026 के पहले नौ महीनों में भारत ने करीब 2.4 अरब डॉलर का कच्चा प्लास्टिक आयात किया. इसका उपयोग पैकेजिंग, एफएमसीजी, इलेक्ट्रॉनिक्स, घरेलू सामान और ऑटो पार्ट्स में होता है. आपूर्ति प्रभावित होने पर इन उद्योगों की लागत और उत्पादन दोनों पर असर पड़ेगा.
ट्रेड और जेम्स-एंड-ज्वेलरी सेक्टर भी प्रभावित
हालांकि रत्न और आभूषण क्षेत्र पर तुरंत असर नहीं दिख सकता, लेकिन लंबे समय में स्थिति गंभीर हो सकती है. भारत में सोने और कच्चे हीरों काबड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया के जरिए आता है, जो बाद में सूरत जैसे प्रोसेसिंग सेंटर्स तक पहुंचता है. भारत ने इस क्षेत्र से लगभग 7.8 अरब डॉलर के हीरे, माणिक, मोती और पन्ना आयात किए हैं. सप्लाई में बाधा आने पर निर्यात और रोजगार दोनों प्रभावित हो सकते हैं.
कुल मिलाकर, यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो भारत की अर्थव्यवस्था के कई अहम क्षेत्रों पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है, जिससे महंगाई, उत्पादन और व्यापार पर दबाव बढ़ने की आशंका है.
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