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दुनियाभर की टेक कंपनियों के मालिक और उनके सीईओ आजकल वाइब कोडिंग को लेकर अपनी राय रखते हुए नजर आते हैं. हाल ही के दिनों में वाइब कोडिंग को लेकर फाफी चर्चा भी हो रही है. वाइब कोडिंग, यह असल में AI के द्वारा जनरेट होने वाली कोडिंग है, जिसकी मदद से ऐप और वेबपोर्टल के लिए कोडिंग तैयार की जा सकती है.
वाइब कोडिंग को ही इंडस्ट्री में नो-कोड (No-Code) और लो-कोड (Low-Code) के नाम से भी पहचान मिली है. इसके लिए यूजर्स को Python या JavaScript जैसी मुश्किल लैंग्वेज सीखने की कोई जरूरत नहीं होगी.
वाइब कोडिंग क्या है?
वाइब कोडिंग असल में एकदम नया तरीका है, जिसमें यूजर्स को खुद हर एक लाइन लिखने की जरूरत नहीं होती है. यूजर्स प्रॉम्प्ट देते हैं और AI उस वाइब के मुताबिक कोड तैयार करते हैं.
AI टूल जैसे GitHub Copilot या चैटजीपीटी पर यूजर्स जैसे ही लिखते हैं कि एक लॉगइन पेज बनाओ. इसके बाद पूरा कोड जनरेट होता है. हालांकि इसको थोड़ा बहुत एडिट और टेक्स्ट आदि को शामिल करना होता है. इसके बाद ऐप तैयार हो जाता है.
वाइब कोडिंग शब्द किसने गढ़ा?
मिंट ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि साल 2025 में वाइब कोडिंग शब्द को चैटजीपीटी मेकर ओपनएआई के को-फाउंडर एंड्रेज कारपेथी ने दिया था. उन्होंने X प्लेटफॉर्म (पुराना नाम Twitter) पर पोस्ट करते हुए कहा कि बेहतरीन लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) के लिए वाइब कोडिंग का चलन बढ़ रहा है.
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वाइब कोडिंग पर सुंदर पिचाई ने कहा
गूगल सीईओ सुंदर पिचाई ने हाल में वाइब कोडिंग को लेकर कहा था कि यह कोडिंग को और ज्यादा मजेदार बना रहा है. चीजें ज्यादा सिंपल हो रही हैं और यह आगे की तरफ लेकर जा रहा है.
Zoho के फाउंडर श्रीधर वेम्बू ने कहा वाइब कोडिंग एक गहरे और मुश्किल कॉन्सेप्ट को सिंपल बना रहा है. उन्होंने X पर पोस्ट करते हुए कहा कि हर कोड जादू जैसा होता है, जब तक कि कंपाइलर उसे दूसरे कोड में नहीं बदल देता और वह कोड भी जादू ही लगता है. यह सिलसिला नीचे जारी रहता है.
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