विश्व हिंदी दिवस: भाषा नहीं, संस्कृति की पहचान: हिंदी बोलना केवल संवाद नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को जीना है। – Dainik Bhaskar

विश्व हिंदी दिवस कोई आम दिन नहीं ,एक अवसर है हिंदी को वैश्विक मंच पर बढ़ावा देने का, लोगों को हिंदी भाषा के लिए जागरूक करने और हिंदी का महत्व समझाने का | इसी कड़ी में विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर रघुनाथ गर्ल्स पीजी कॉलेज मेरठ की सेवानिवृत्त हिंदी विभागा
प्रो. पुरी ने कहा कि हिंदी आज भी भारत की सांस्कृतिक पहचान, संवाद और जन-अभिव्यक्ति का मजबूत माध्यम है। यह भाषा साहित्य, कला, लोकजीवन और भावनाओं की धारा को जोड़ती है। उनके अनुसार, “हिंदी केवल भाषा नहीं, बल्कि संवेदना, मूल्य और संस्कृति की वाहक है।
अंग्रेज़ी के प्रभाव पर कहा — मानसिकता की चुनौती
अंग्रेज़ी के बढ़ते प्रभाव के बीच हिंदी की स्थिति पर उन्होंने कहा कि असली चुनौती अंग्रेज़ी नहीं, बल्कि यह सोच है कि हिंदी कमतर है। हिंदी संघर्ष में नहीं, बल्कि परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। उन्होंने हिंग्लिश और मिलीजुली भाषा को भी आज के समय की स्वाभाविक भाषिक प्रक्रिया बताया।
डिजिटल दुनिया ने बढ़ाया हिंदी का दायरा
डिजिटल और सोशल मीडिया के प्रभाव पर प्रो. पुरी ने कहा कि इससे हिंदी को व्यापक मंच मिला है। लाखों लोग हिंदी में पढ़ रहे हैं, लिख रहे हैं और संवाद कर रहे हैं। हालांकि शुद्ध भाषा और व्याकरण के सामने नई चुनौतियाँ भी उभर रही हैं। डिजिटल स्पेस ने हिंदी को नई ऊर्जा दी है, लेकिन उसकी मानक रूपरेखा के लिए सतर्क प्रयास की जरूरत है।
करियर के अवसर लगातार बढ़ रहे हैं
हिंदी के भविष्य और रोजगार पर प्रो. पुरी ने कहा कि आज हिंदी साहित्य या शिक्षा तक सीमित नहीं रही है। पत्रकारिता, अनुवाद, डिजिटल कंटेंट राइटिंग, विज्ञापन, फिल्म, कॉर्पोरेट और सरकारी क्षेत्रों में हिंदी की मांग बढ़ी है। उनके अनुसार, हिंदी के साथ अंग्रेज़ी और डिजिटल स्किल जुड़ जाए तो करियर के बड़े अवसर खुलते हैं।
हिंदी और संस्कृति का रिश्ता अटूट हैं
उन्होंने कहा कि हिंदी हमारी संस्कृति, जीवन-मूल्य, लोकगीत, कथाएँ, मुहावरे और अनुभवों की भाषा है। कबीर, तुलसी, प्रेमचंद, निराला और महादेवी जैसे रचनाकारों ने हिंदी को समाज की आईना और दिशा दोनों बनाया। हिंदी बोलना केवल संवाद नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को जीना है।
हिंदी को बढ़ावा देना सामूहिक जिम्मेदारी अंत में उन्होंने कहा कि हिंदी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज और व्यक्तियों की भी है। जब हम गर्व से हिंदी बोलेंगे और लिखेंगे, तभी हिंदी सच्चे अर्थों में आगे बढ़ेगी।
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