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स्वच्छता रैंकिंग में देश के शीर्ष शहरों में शुमार सूरत अब कूड़े के कथित घोटाले को लेकर सवालों के घेरे में है. दावा है कि 213 करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद खजोद डंपिंग साइट से कचरे का पहाड़ नहीं हटाया जा सका. जिस कंपनी को यह ठेका दिया गया था, उसकी समय-सीमा खत्म हो चुकी है, फिर भी न तो ठेकेदार पर ठोस कार्रवाई हुई और न ही जिम्मेदार अफसरों पर.
29 अक्टूबर 2022 को सूरत नगर निगम ने सीडी ट्रांसपोर्ट नामक कंपनी को तीन साल में 790 रुपये प्रति टन की दर से 30 लाख टन कचरा हटाने का ठेका दिया था. आरोप है कि अनुबंध अवधि पूरी होने के बाद भी साइट पर कूड़े का विशाल ढेर मौजूद है, जबकि 213 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया गया. सवाल उठ रहा है जब काम पूरा नहीं हुआ तो भुगतान क्यों?
आजतक की पड़ताल में खजोद डंपिंग साइट पर कूड़े के बड़े-बड़े ढेर दिखाई दिए. टीम के पहुंचते ही साइट पर मौजूद लोगों ने अंदर जाने से रोकने की कोशिश की. अंदर धुआं उठता मिला और आरोप लगे कि कचरे में आग लगाकर गड़बड़ियों को छिपाने की कोशिश की जा रही है.
सूरत कांग्रेस के पूर्व पार्षद विजय पानसेरिया ने आरोप लगाया कि “नियमों का पालन नहीं हुआ, 213 करोड़ दे दिए गए, ठेका खत्म होने के बाद भी नवीनीकरण की तैयारी है. ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट कर एफआईआर दर्ज होनी चाहिए और अफसरों पर कार्रवाई हो.”
वहीं, महानगरपालिका के डिप्टी कमिश्नर दिनेश कुमार गुरव ने कहा कि 213 करोड़ में से 107 करोड़ का भुगतान हुआ है और आरोपों की जांच के लिए समिति गठित की गई है. उन्होंने डंपिंग साइट पर आग लगने की वजह गर्मी और ऊपर से गुजर रहे हाईटेंशन वायर को बताया. हालांकि तीन साल में काम पूरा क्यों नहीं हुआ, इस पर स्पष्ट जवाब नहीं मिला.
अब बड़ा सवाल यह है कि ‘स्वच्छता नी मूरत’ का दावा करने वाले शहर में यदि कूड़े का पहाड़ अब भी खड़ा है, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी? जांच समिति की रिपोर्ट और संभावित कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं.
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