भास्कर संवाददाता | बीना
क्रोधी व्यक्ति के पास कोई जाने को तैयार नहीं होता और अभिमानी व्यक्ति किसी के पास जाने को राजी नहीं होता। इसलिए अगर जीवन अच्छे से जीना है तो क्रोध, गुस्से के त्याग करना पड़ेगा। क्योंकि रामायण में एक प्रसंग में भगवान राम ने कहा कि क्रोध करने वाला मनुष्य मृत व्यक्ति के समान है। यह बात श्री नाभिनंदन दिगंबर जैन मंदिर में चातुर्मास कर रहे मुनि श्री सुब्रत सागर महाराज ने दशलक्षण पर्व के प्रथम दिवस पर उत्तम क्षमा के धर्म के अवसर पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए कही।
मुनिश्री ने आगे कहा कि चाहे रामायण के साथ जैन परंपरा में परंपरा एक विषय आया है। अंत समय में रामायण का युद्ध चल रहा था, उस समय राम जी के बारे में रावण असभ्य वचनों का उपयोग कर रहा था। इस पर रामचंद्र जी चुप रहे लेकिन पास में खड़े लक्ष्मण, हनुमान, विभीषण ने रामचंद्र जी से कहा कि रावण असभ्य वचनों का उपयोग कर रहा है, आप चुपचाप सुने जा रहे हो ऐसा क्यों। तब रामचंद्र जी ने कहा कि हम मृत व्यक्तियों पर क्षत्रिय तीर नहीं चलाते। इस पर लक्ष्मण जी ने पूछा कि रावण मृत कैसे हो गया, तब रामचंद्र जी ने बताया कि जो व्यक्ति गुस्सा करता है, क्रोध करता है, ताव में असभ्य वचनों का उपयोग करता है, वह व्यक्ति मरे हुए व्यक्ति के समान होता है।
मरे हुए व्यक्तियों पर क्षत्रिय अपना तीर नहीं चलाते। इस प्रसंग से मुनिश्री ने बताया कि गुस्सा करने वाला व्यक्ति मरे हुए व्यक्ति के समान ही होता है। क्योंकि गुस्सा करने वाला अपनी सारी ताकत समाप्त कर देता है। सारा ज्ञान, बुद्धि, संयम और विवेक खो बैठता है। इसलिए अगर अच्छे से जीवन जीना है तो क्रोध का भले ही त्याग हो पाए कम से कम उसका संतुलन तो कर लेना चाहिए।
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