प्रसव के बाद जच्चा की देखभाल में कौन बेहतर, मां या सासू मां? हैरान कर देगा स्टडी का जवाब – AajTak

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बच्चे के जन्म के तुरंत बाद नई मां की देखभाल सिर्फ दवाइयों और अस्पताल तक सीमित नहीं है. ये वो वक्त होता है जब उन्हें शारीर‍िक और मानस‍िक रूप से बेस्ट सपोर्ट चाह‍िए होता है. उनकी इस वक्त हुई देखभाल ही उनके आगे की हेल्थ पर असर डालती है. घर में उनकी देखभाल कौन-कैसे कर रहा है, इसका असर उनकी हील‍िंग में पड़ता है. एक ताज़ा अंतरराष्ट्रीय शोध में सामने आया है कि जब प्रसूता अपनी मां की देखभाल में रहती है तो उसका स्वास्थ्य जल्दी सुधरता है, लेकिन अगर देखभाल की जिम्मेदारी सास पर होती है तो रिकवरी की संभावना औसतन 16% तक कम हो जाती है.
18 हजार से ज्यादा महिलाओं से पूछा गया ये सवाल
ये अध्ययन कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, नोओरा हेल्थ और यूसएड इनोवेशन फाउंडेशन ने मिलकर किया. सितंबर 2018 से मई 2020 के बीच 18,436 महिलाओं से बातचीत की गई. इनमें से 551 नई मां और उनके प्रमुख देखभालकर्ता (caregiver) जोड़े का गहराई से डाटा एनालिसिस किया गया.
फैसले किसके हाथों में?
शोध के मुताबिक लगभग एक तिहाई (33%) महिलाओं ने कहा कि बच्चे और अपनी देखभाल के फैसले में उनकी राय ली गई जबकि दो-तिहाई (67%) मामलों में फैसले थोपे गए, यानी प्रसूता को बिना पूछे निर्णय कर दिया गया.
मां बनाम सास, क्यों है ये बड़ा फर्क
रिसर्च में मां (बच्चे की नानी) के देखभाल करने पर नई मांओं की सेहत और आत्मविश्वास बेहतर पाया गया. वहीं सास (बच्चे की दादी) के देखभाल करने पर रिकवरी औसतन 16% कम हो गई. अब इसके पीछे की वजह पर बात करें तो शायद ये कम्यून‍िकेशन गैप की वजह से भी हो सकता है. ऐसा पाया गया कि कई मामलों में सास बहुओं पर परंपरागत फैसले थोप देती हैं, वहीं मां अक्सर बेटी की भावनाओं और जरूरतों को समझकर उनके हिसाब से ही मदद करती है.
इकतरफा फैसला लेना क्यों खतरनाक?
स्टडी में ये भी सामने आया कि हर पांच में से एक नई मां ने प्रसव के बाद की स्थ‍ितियों में किसी एक व्यक्ति (अक्सर पति या दादी/नानी) को ही मेन डिसिजन मेकर मान लिया. इससे मां की राय और भी कम हो गई. इसका असर ये हुआ कि उनकी आत्मनिर्भरता और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ा.
परिवार के पावर बैलेंस का भी असर
रिसर्च टीम ने साफ कहा है कि भारत में प्रसव के बाद महिलाओं की देखभाल सिर्फ मेडिकल इश्यू नहीं है, बल्कि यह घर के power balance से भी जुड़ा मुद्दा है. अगर नई मां को निर्णय लेने के प्रोसेस से बाहर रखा जाता है तो वह ज्यादा असुरक्षित, थकी हुई और मानसिक रूप से परेशान महसूस करती है.
इससे सबक लेना होगा
रिसर्चर्स ने सुझाव दिया है कि अस्पताल और हेल्थ वर्कर्स को सिर्फ दवाइयां देने पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि परिवार को यह भी समझाना होगा कि नई मां की राय सबसे अहम है. इससे न सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर होगा, बल्कि मानसिक रूप से भी मां मजबूत रहेगी. इससे वो न स‍िर्फ अपने बच्चें की परवर‍िश अच्छे से कर पाएंगी, बल्क‍ि पोस्ट पार्टम एंजाइटी की स्थ‍ितियां भी कम होने की संभावना बढ़ेगी.

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