Gig Economy: फ्रीलांसर से डिलीवरी पार्टनर तक, कैसे बदल रही है भारत की गिग इकोनॉमी, जानिए चुनौतियां – News18 Hindi

नई दिल्ली. भारत में रोजगार का स्ट्रक्चर तेजी से बदल रहा है. पहले जहां लोग स्थायी नौकरियों (Permanent Jobs) को ही सुरक्षित मानते थे, गिग इकॉनमी का चलन बढ़ रहा है. गिग इकोनॉमी (Gig Economy) यानी ऐसा काम जो प्रोजेक्ट या टास्क के हिसाब से किया जाता है और इसमें लंबे समय तक किसी एक कंपनी से बंधकर काम करने की जरूरत नहीं होती. आज के समय में लाखों लोग फ्रीलांसिंग, कैब ड्राइविंग, फूड डिलीवरी, ग्राफिक डिजाइनिंग, कंटेंट राइटिंग, ऐप डेवलपमेंट और कई दूसरे सेक्टर्स में गिग वर्कर के तौर पर काम कर रहे हैं.

नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में वर्तमान में लगभग 77 लाख गिग वर्कर हैं और 2030 तक यह संख्या 2.3 करोड़ से ज्यादा हो सकती है. ये वर्कर देश की कुल वर्किंग आबादी का एक बड़ा हिस्सा बनने जा रहे हैं. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसे स्विगी, जोमैटो, उबर, ओला, अर्बन कंपनी, फ्रीलांसर, अपवर्क और फाइवर गिग वर्क के बड़े सेंटर बन चुके हैं. यहां लोग या तो फुल-टाइम काम कर रहे हैं या अपनी फुर्सत के समय में एक्स्ट्रा इनकम कमा रहे हैं.
क्यों बढ़ रही है गिग इकोनॉमी?
गिग वर्क के फायदे
गिग इकॉनमी की चुनौतियां
लेकिन हर सिक्के के 2 पहलू होते हैं. गिग वर्कर्स को कई बड़ी दिक्कतों का भी सामना करना पड़ता है.
सरकार और कंपनियों की भूमिका
केंद्र सरकार ने 2020 में कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी कानून लाया, जिसमें गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को भी कुछ हद तक सोशल सिक्योरिटी देने की बात कही गई है. हालांकि, इसे लागू करने की प्रक्रिया अभी शुरुआती दौर में है. कंपनियों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने गिग वर्कर्स को मिनिमम लाभ और सुरक्षा दें जैसे- इंश्योरेंस कवरेज, ट्रेनिंग और उचित भुगतान.
भविष्य का काम: गिग इकॉनमी या स्थायी नौकरी?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि भविष्य में गिग वर्क और ट्रेडिशनल नौकरियां दोनों साथ-साथ चलेंगी. गिग इकॉनमी का भविष्य उज्ज्वल है, लेकिन इसे लंबे समय तक टिकाऊ बनाने के लिए सोशल सिक्योरिटी, स्टेबल इनकम और काम के मानकों पर ध्यान देना जरूरी है. आने वाले समय में यह ट्रेडिशनल नौकरियों के साथ-साथ एक बड़ा रोजगार का साधन बनेगी. वहीं, कंपनियों के लिए भी यह एक बेहतर मॉडल है क्योंकि उन्हें स्थायी कर्मचारियों पर एक्सट्रा खर्च नहीं करना पड़ता.

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