राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण की खबरें रोजाना नई सुर्खियां बटोर रही हैं। जिस समय दिल्ली उच्च न्यायालय एक हत्यारोपी को वायु प्रदूषण के आधार पर 15 दिनों के लिए जमानत देने का ऐतिहासिक फैसला कर रहा था, लगभग उसी समय सुप्रीम कोर्ट की हर महीने प्रदूषण पर दो बार सुनवाई करने संबंधी टिप्पणी भी सामने आई। इन दोनों बातों के गहरे निहितार्थ हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय का जमानत देने का निर्णय जहां एक कैदी के जीने के अधिकार का संरक्षण करता है, तो वहीं प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत व न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की आला अदालत की पीठ ने उचित ही कहा है कि वायु प्रदूषण की समस्या को अब सिर्फ सर्दियों की मुसीबत के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह एक गंभीर समस्या बन चुका है और अब फौरी निदान के बजाय इसका दीर्घकालिक समाधान ढूंढ़ना अनिवार्य हो गया है। अदालत की यह टिप्पणी भी अपने आप में काफी महत्वपूर्ण है कि दिल्ली के वायु प्रदूषण के लिए सिर्फ पराली जलाने वाले किसानों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, और भी कई कारक हैं, जिनके कारण दिल्ली की आबोहवा खराब हुई है।
‘सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायर्नमेंट’ (सीईसी) की ताजा रिपोर्ट भी अदालत की टिप्पणी की तस्दीक करती है। रिपोर्ट में साफ-साफ कहा गया है कि इस बार दिल्ली के वायु प्रदूषण में पराली के धुएं का योगदान पांच फीसदी से भी कम रहा है और इसके लिए स्थानीय कारक सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। सीईसी ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि राजधानी के वायु प्रदूषण में लगभग 51.5 प्रतिशत योगदान वाहनों के उत्सर्जन का है। इसके बाद आवासीय उत्सर्जन और दूसरे कारक जिम्मेदार हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने वाजिब सवाल उठाया है कि कोरोना के दौरान भी पराली जलाई जा रही थी, तब राजधानी का आसमान कैसे नीला दिख रहा था? इसका मतलब यह कतई नहीं है कि अदालत ने पराली जलाने के पहलू को नजरअंदाज कर दिया है, बल्कि किसानों के नाम पर जो बहानेबाजी होती रही है या सियासत की जाती है, माननीय न्यायमूर्तियों ने उसे आईना दिखाया है।
यह तंज का नहीं, बल्कि लोक प्रशासन के विद्यार्थियों के लिए गहन अध्ययन का विषय है कि राजधानी समेत तमाम बड़े शहरों को वायु प्रदूषण और गंगा-यमुना को निर्मल बनाने पर वर्षों के प्रयास और करोड़ों-अरबों के निवेश भी कोई उम्मीद क्यों नहीं दे पा रहे? शुद्ध हवा और स्वच्छ जल, दोनों जीवन के लिए अनिवार्य तत्व हैं और अनिवार्यता का कोई विकल्प नहीं होता। निस्संदेह, इसके लिए संकीर्ण राजनीति और तंत्र की शिथिलता के साथ-साथ नागरिकों की उदासीनता भी बराबर की जिम्मेदार है। जब दुनिया के कई शहरों के वायु प्रदूषण से मुक्त होने और नदियों के पुन: कलकल बहने की मिसालें हमारे सामने हैं, तब क्या वजह है कि हमारे सारे प्रयास विफल हो जा रहे? ऐसे में, सुप्रीम कोर्ट की नई पहल एक आस की डोर बंधाती है। बहुत समय नहीं बीते हैं, जब एक सैकड़ों साल पुराने विवाद और दशकों पुराने मुकदमे की सुनवाई करते हुए उसने देश को मुसलसल तनाव के माहौल से मुक्त कराया है। राम जन्मभूमि विवाद का फैसला इसकी मिसाल है। शीर्ष अदालत अब अगर नियमित रूप से प्रदूषण के मामले को सुनती है, तो इस संदर्भ में उसका फैसला राजधानी के लोगों को ही नहीं, देश के हर प्रदूषित शहर के बाशिंदों को एक स्वस्थ व गरिमामय जीवन सुनिश्चित करेगा, जो अभी हांफते-खांसते नाउम्मीदी के शिकार हैं।
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