Armenia conflict Zangezur Corridor: रूस और यूक्रेन की जंग के बीच अब दुनिया के एक और हिस्से में युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं. आर्मेनिया, जो कभी रूस का सबसे भरोसेमंद साथी था, आज खुद को अकेला महसूस कर रहा है. हालात ऐसे बन गए हैं कि जानकारों को डर है कि कहीं आर्मेनिया का हश्र भी यूक्रेन जैसा न हो जाए. समंदर से कटा यह छोटा सा देश अब बड़ी शक्तियों के बीच की जंग का नया मैदान बनता जा रहा है.
Armenia conflict Zangezur Corridor: आर्मेनिया एक छोटा सा देश है जिसके पास न तो समंदर का रास्ता है और न ही बड़े संसाधन. ऐसे में, आर्मेनिया आज उस मोड़ पर खड़ा है जहां कभी यूक्रेन खड़ा था. एक तरफ अजरबैजान अपनी ताकत बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ आर्मेनिया का पुराना रक्षक रूस अब यूक्रेन युद्ध में उलझने के कारण पीछे हट गया है. अब आर्मेनिया अपनी सुरक्षा के लिए भारत जैसे नए देशों की तरफ देख रहा है. ऐसे में, इतिहास गवाह है कि जब-जब कोई छोटा देश बड़े रक्षा तंत्र से बाहर निकलता है और दूसरे में शामिल नहीं हो पाता, तो वहां युद्ध का खतरा बढ़ जाता है. आर्मेनिया के साथ भी ठीक यही हो रहा है. ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर आर्मेनिया का भविष्य क्या होने वाला है.
अकेला पड़ा आर्मेनिया?
सालों तक रूस की सुरक्षा छतरी के नीचे रहने वाला आर्मेनिया अब अकेला पड़ गया है. वहीं दूसरी ओर आर्मेनिया का कट्टर दुश्मन देश अजरबैजान पहले से ही तेल और गैस के कारण अमीर है. वहीं, अब उसे तुर्की जैसे देश का खुला समर्थन हासिल है. आपको बता दें, असली लड़ाई सिर्फ जमीन की नहीं, बल्कि ‘कॉरिडोर’ की है. अजरबैजान चाहता है कि ‘जंगेजुर कॉरिडोर’ के जरिए वह तुर्की से सीधे जुड़ जाए, जो रास्ता आर्मेनिया के बीच से होकर जाता है.
अगर ऐसा हुआ, तो आर्मेनिया का वजूद ही खतरे में पड़ जाएगा. धर्म को भी इस जंग में मोहरा बनाया जा रहा है, जहां आर्मेनिया दुनिया का पहला ईसाई देश है और अजरबैजान एक मुस्लिम बहुल देश. हालांकि, यह मजहबी जंग नहीं है, लेकिन समर्थन जुटाने के लिए इसका इस्तेमाल खूब हो रहा है. इस बीच भारत ने रणनीतिक रूप से आर्मेनिया को हथियार देकर इस खेल में एंट्री ली है.
जंगेजुर कॉरिडोर जंग की असली वजह
अजरबैजान की दिलचस्पी सिर्फ सीमा विवाद में नहीं है. अजरबैजान चाहता है कि वह आर्मेनिया को पूरी तरह दरकिनार करके तुर्की तक पहुंच जाए. इसके लिए वह ‘जंगेजुर कॉरिडोर’ पर कब्जा करना चाहता है. जिसके पास इस कॉरिडोर का कंट्रोल होगा, वही दक्षिण काकेशस के इलाके का असली बॉस होगा. वहीं, दूसरी ओर आर्मेनिया के पास समंदर तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है. अगर कॉरिडोर पर दुश्मन का कब्जा हुआ, तो उसकी घेराबंदी और भी सख्त हो जाएगी.
रूस की ढाल का गिरना
दशकों तक आर्मेनिया ने अपनी सुरक्षा के लिए रूस पर भरोसा किया. लेकिन यूक्रेन युद्ध ने सब कुछ बदल दिया. यूक्रेन में फंसने के बाद रूस अब आर्मेनिया की वैसी मदद नहीं कर पा रहा जैसी वह पहले करता था. आर्मेनिया के लिए यह ‘सुरक्षा कवच’ अब टूट चुका है. आर्मेनिया अपने सुरक्षा सिस्टम CSTO (Collective Security Treaty Organization) से बाहर तो निकल रहा है, लेकिन अभी तक वह किसी दूसरे मजबूत गुट जैसे NATO (North Atlantic Treaty Organization) या पश्चिमी देश का हिस्सा नहीं बन पाया है.
ऐसे में, जानकारों का कहना है कि इसी खाली जगह में अक्सर युद्ध शुरू होते हैं. दूसरी तरफ अजरबैजान के पीछे तुर्की खड़ा है. तुर्की उसे आधुनिक ड्रोन और हथियार दे रहा है, जिससे सैन्य संतुलन बिगड़ गया है.
भारत की बड़ी रणनीति
हैरान करने वाली बात यह है कि आर्मेनिया की मदद के लिए भारत आगे आया है. यह कोई दान-पुण्य नहीं, बल्कि भारत की अपनी रणनीति है. भारत अब आर्मेनिया को पिनाका रॉकेट लॉन्चर और अन्य घातक हथियार दे रहा है. दरअसल, तुर्की, पाकिस्तान और अजरबैजान का एक गुट बन गया है जो कश्मीर के मुद्दे पर अक्सर भारत के खिलाफ बयानबाजी करता है. भारत आर्मेनिया को मजबूत करके इस गुट को जवाब दे रहा है. आर्मेनिया अब भारत को अपना सबसे भरोसेमंद रक्षा साझेदार मानने लगा है.
धर्म और राजनीति का कॉकटेल
आपको बता दें, आर्मेनिया दुनिया का पहला आधिकारिक ईसाई राष्ट्र है. वहीं अजरबैजान मुस्लिम बहुल है. हालांकि, यह लड़ाई जमीन और कॉरिडोर की है, लेकिन दोनों पक्ष अपने-अपने धर्म का इस्तेमाल दुनिया भर से सहानुभूति और समर्थन जुटाने के लिए कर रहे हैं. इस धार्मिक रंग की वजह से पड़ोसी देशों के दखल का खतरा और बढ़ जाता है, जिससे मामला और भी पेचीदा हो गया है.
ऐसे में, कहा जा सकता है कि आर्मेनिया इस समय बहुत नाजुक स्थिति में है. अगर उसने जल्द ही अपनी सुरक्षा के लिए कोई ठोस इंतजाम नहीं किया या उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बड़ी मदद नहीं मिली, तो वह अगला यूक्रेन बन सकता है. अजरबैजान की बढ़ती दौलत और तुर्की का साथ आर्मेनिया के लिए बड़ा खतरा है.
हालांकि भारत का साथ देना एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन क्या यह आर्मेनिया को बचाने के लिए काफी होगा? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा. दुनिया की चुप्पी आर्मेनिया के लिए सबसे खतरनाक साबित हो रही है.
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प्रशांत सिंह के लेख रिसर्च-आधारित, फैक्ट-चेक्ड और विश्वसनीय स्रोतों पर आधारित होते हैं. ये जियोपॉलिटिक्स और रक्षा से जुड़ी खबरों को आसान हिंदी में पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं. …और पढ़ें
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