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इंडिया टुडे राउंडटेबल तमिलनाडु 2026 में ‘तुगलक’ पत्रिका के संपादक और लंबे समय से आरएसएस विचारक रहे एस. गुरुमूर्ति ने द्रविड़ मॉडल पर तीखा हमला बोला. इस दौरान उन्होंने द्रविड़ राजनीति की वैचारिक बुनियाद पर सवाल उठाए और दावा किया कि तमिलनाडु में धार्मिक भावनाओं का उभार दिखाई दे रहा है, जिसे बीजेपी चुनावी समर्थन में बदलने की कोशिश कर रही है.
एस गुरुमूर्ति ने अपने बात रखते हुए डीएमके मंत्री पी. थियागा राजन के बयान का पलटवार किया. असल में पी. थियागा राजन ने द्रविड़ मॉडल को सामाजिक न्याय, समानता और समावेशी विकास पर बेस्ड बताया था. इस पर गुरुमूर्ति ने पलटवार करते हुए पूछा, ‘जिसे आप द्रविड़ मॉडल कहते हैं, उसका असल वैचारिक कंटेंट क्या है?’ उन्होंने कहा कि सिर्फ राजनीतिक विचार है, ठोस सिद्धांत नहीं.
क्या बोले एस गुरुमूर्ति?
गुरुमूर्ति ने तर्क दिया कि भारत की बहुलता की जड़ें हिंदू सभ्यतागत परंपरा में हैं. उन्होंने 1995 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा, ‘भारत में अन्य धर्मों को स्थान इसलिए मिला क्योंकि यहां हिंदू सभ्यता की बुनियाद है.’ हालांकि उन्होंने इस तथ्य को माना को तमिलनाडु ने अब तक चुनावों में हिंदुत्व की राजनीति को स्वीकार नहीं किया है और राज्य में दशकों से डीएमके व एआईएडीएमके का वर्चस्व रहा है. इस पर गुरुमूर्ति ने माना कि चुनावी गणित फिलहाल बीजेपी के पक्ष में नहीं है, लेकिन सामाजिक बदलाव की ओर इशारा किया. उन्होंने कहा कि 1970 के दशक से राज्य की राजनीति कई चरणों से गुजरी है और समाज में बदलाव स्पष्ट है.
मंदिरों में बढ़ रही है द्रविड़ नेताओं की भागीदारी
गुरुमूर्ति ने मंदिरों में बढ़ती सार्वजनिक भागीदारी और धार्मिक आयोजनों में नेताओं की मौजूदगी को इसका प्रमाण बताया. उनका दावा था कि जो द्रविड़ नेता कभी मंदिरों का विरोध करते थे, वे अब धार्मिक आयोजनों में शामिल हो रहे हैं. उन्होंने नटराज मंदिर और श्रीरंगम जैसे ऐतिहासिक स्थलों से जुड़े विवादों का भी उल्लेख किया. जब सरदेसाई ने पूछा कि क्या यह धार्मिक भावना वोटों में बदलेगी, तो गुरुमूर्ति ने स्पष्ट कहा, ‘बीजेपी तमिलनाडु में हिंदू भावना को चुनावी हिंदू राजनीति में बदलने की कोशिश कर रही है.’ उन्होंने स्वीकार किया कि पार्टी अभी प्रमुख शक्ति नहीं है, लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में बढ़े वोट प्रतिशत का हवाला देते हुए कहा कि राजनीतिक विस्तार धीरे-धीरे होता है.
जाति के मुद्दे पर एस गुरुमूर्ति ने माना कि जाति राजनीतिक वास्तविकता है, लेकिन उनका तर्क था कि व्यापक हिंदू पहचान इन विभाजनों से ऊपर उठ सकती है. द्रविड़वाद की वर्तमान परिभाषा पर गुरुमूर्ति ने कहा, ‘आज का द्रविड़वाद करुणानिधि परिवार और ब्राह्मण-विरोध तक सिमट गया है.’ उनके अनुसार, द्रविड़ विचारधारा अपनी बौद्धिक धार खो चुकी है और अब राजनीतिक विरासत भर रह गई है.
हालांकि डीएमके और एआईएडीएमके अभी भी राज्य की मुख्य ताकतें हैं, गुरुमूर्ति का मानना है कि सांस्कृतिक माहौल में बदलाव राजनीति को भी प्रभावित करेगा. तमिलनाडु 2026 विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है और बड़ा सवाल यही है, क्या धार्मिक भावना का यह उभार केवल सांस्कृतिक है या राजनीतिक बदलाव की शुरुआत?
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