Katihar News: कटिहार जिले के महेशपुर दियारा के 200 परिवार गंगा कटाव के बाद वर्षों से काड़ी कोसी बांध किनारे झोपड़ी में रहते थे. अब बांध की मरम्मत के लिए प्रशासन बुलडोजर चला रहा है, जिससे परिवारों का बचा-खुचा आशियाना भी उजड़ गया है. विस्थापित परिवार वैकल्पिक जमीन और पक्का आवास की मांग कर रहे हैं.
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Katihar News: कटिहार जिले के मनिहारी प्रखंड अंतर्गत बाघमारा पंचायत के वार्ड संख्या 02 स्थित महेशपुर दियारा की कहानी विकास और व्यवस्था के बीच पिसती उन जिंदगियों की दास्तान बन गई है, जिनका कसूर सिर्फ इतना है कि वे गंगा किनारे रहते थे. वर्ष 2014 में गंगा के भीषण कटाव ने इस पूरे गांव को अपनी आगोश में ले लिया था. हंसता-खेलता गांव देखते ही देखते नदी में समा गया और सैकड़ों परिवार बेघर हो गए. घर, आंगन, खेत-खलिहान और वर्षों की मेहनत से बुने सपने सब कुछ पानी में बह गया. इसके बाद विस्थापित परिवार मनिहारी के काड़ी कोसी बांध के किनारे आकर किसी तरह झोपड़ी बनाकर रहने लगे और पिछले 12 वर्षों से वहीं जिंदगी गुजार रहे थे. लेकिन अब बांध की मरम्मत के नाम पर प्रशासन द्वारा उनके आशियानों को हटाया जा रहा है, जिससे इन परिवारों के सामने फिर से सड़क पर आ जाने का संकट खड़ा हो गया है.
12 साल बाद फिर उजड़ने का दर्द
करीब 200 परिवारों का कहना है कि गंगा कटाव के बाद वे बड़ी मुश्किल से यहां बसे थे. मेहनत-मजदूरी कर झोपड़ी खड़ी की और बच्चों का पालन-पोषण शुरू किया, लेकिन अब बुलडोजर चलने से उनका बचा-खुचा आशियाना भी मलबे में तब्दील हो रहा है. महिलाओं की सिसकियां, बच्चों की चीखें और बुजुर्गों की बेबसी पूरे इलाके को गमगीन कर रही है.
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विस्थापितों की प्रशासन से गुहार
रंजीत सहनी, योगेंद्र चौधरी, अमरलाल सहनी, मंटू सहनी, राजू सहनी, सुधीर सहनी, विजय रजक, शंकर सहनी समेत दो दर्जन से अधिक परिवारों ने बताया कि महंगाई के इस दौर में जमीन खरीदना उनके बस की बात नहीं है. खाने के लिए पैसे नहीं हैं, ऐसे में घर बनाना कैसे संभव होगा. सभी ने सरकार और जिला प्रशासन से वैकल्पिक जमीन और पक्का आवास देने की मांग की है.
सबसे बड़ा सवाल – अब कहां जाएं ये लोग?
विस्थापित परिवारों का कहना है कि यदि उन्हें बसने के लिए जमीन नहीं मिली तो वे आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठाने को मजबूर होंगे. गंगा ने एक बार उजाड़ा और अब बुलडोजर ने बची हुई उम्मीद भी तोड़ दी है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन 200 परिवारों को नया आशियाना मिलेगा या फिर ये लोग एक बार फिर दर-दर भटकने को मजबूर होंगे.
रिपोर्ट: रंजन कुमार
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