Isreal vs Iran: इजरायल ने माना कि उसकी मल्टी-लेयर एयर डिफेंस भी ईरान की तेजी से बढ़ती बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को पूरी तरह नहीं रोक सकती. 2025 के टकराव में 550 मिसाइलें दागी गईं. ईरान 2030 तक 10,000 मिसाइलें जुटा सकता है. लागत असंतुलन और लगातार हमलों से क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौती बढ़ रही है.
Isreal vs Iran: इजरायल के रक्षा अधिकारियों ने वॉशिंगटन के साथ गोपनीय बातचीत में माना है कि उनकी एडवांस मल्टी लेयर एयर डिफेंस प्रणाली भी ईरान की तेजी से बढ़ती बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता के खिलाफ पूरी तरह सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकती है. एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने साफ कहा कि इजरायल-ईरान की घातक लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ नहीं रह सकता है. ये केवल सैन्य चुनौती नहीं, बल्कि देश के अस्तित्व के लिए खतरा हैं.”
यह आकलन जून 2025 में हुए इजरायल-ईरान टकराव ऑपरेशन राइजिंग लायन के बाद सामने आया. उस दौरान ईरान ने 550 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं. करीब 86 प्रतिशत मिसाइलों को रोका गया, लेकिन भारी संख्या में हमलों ने इजरायल की रक्षा प्रणाली पर दबाव और कमजोरियां उजागर कर दीं.
10 हजार मिसाइलों का प्लान!
इजरायली आकलन के मुताबिक 2025 के बाद ईरान के पास लगभग 2,000 से 3,000 मिसाइलें हैं. यदि उत्पादन दर (लगभग 100 मिसाइल प्रति माह) जारी रही तो 2027 तक यह संख्या 5,000 और दशक के अंत तक 8,000–10,000 तक पहुंच सकती है. इतनी बड़ी संख्या में मिसाइलें किसी भी उन्नत रक्षा प्रणाली को लगातार हमलों से थका सकती हैं. रणनीतिक चुनौती केवल संख्या नहीं है, बल्कि लागत का अंतर भी है. एक ईरानी बैलिस्टिक मिसाइल की कीमत लगभग 2 से 5 लाख डॉलर आंकी जाती है, जबकि उसे रोकने वाली इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत 10 से 30 लाख डॉलर तक हो सकती है. यानी आर्थिक रूप से यह समीकरण ईरान के पक्ष में जाता है. इजरायली अधिकारियों ने माना है कि “पूरी तरह अभेद्य रक्षा संभव नहीं है.”
अभी तो ईरान दिखाई ही नहीं अपनी ताकत
ईरान का मिसाइल कार्यक्रम उसकी सैन्य रणनीति का मुख्य आधार बन चुका है. 1980–88 के ईरान-इराक युद्ध के अनुभवों के बाद उसने स्वदेशी उत्पादन क्षमता बढ़ाई. भूमिगत उत्पादन केंद्र और सुरक्षित लॉन्च ढांचे इस तरह बनाए गए हैं कि वे हवाई हमलों के बाद भी दोबारा सक्रिय हो सकें. ईरान की मिसाइल सूची में शाहाब-3, इमाद-1, खैबर शेकन और हाइपरसोनिक फतह जैसी प्रणालियां शामिल हैं. इनकी रेंज लगभग 2,000 किलोमीटर तक है, जिससे इजरायल, अमेरिकी ठिकानों और खाड़ी देशों तक निशाना साधा जा सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि 2025 के हमलों में ईरान ने अपनी सबसे भारी मिसाइलें इस्तेमाल भी नहीं कीं.
आयरन डोम व ऐरो-3 भी हो जाएंगे फेल
इजरायल की रक्षा प्रणाली में आयरन डोम, डेविड्स स्लिंग और एरो-2 व एरो-3 शामिल हैं. 2025 के हमलों में इनकी सफलता दर ऊंची रही, लेकिन बड़ी संख्या में मिसाइलों ने यह दिखाया कि लगातार और लंबे समय तक हमले होने पर सिस्टम पर दबाव बढ़ सकता है. इंटरसेप्टर मिसाइलों की सीमित संख्या और ऊंची लागत भी चुनौती है. ईरान का खतरा केवल इजरायल तक सीमित नहीं है. कतर, बहरीन और यूएई में मौजूद अमेरिकी ठिकाने भी इसकी जद में आते हैं. खाड़ी क्षेत्र की तेल सुविधाएं भी संभावित लक्ष्य हैं. 2019 में सऊदी अरब के अबकैक तेल संयंत्र पर हमला दिखा चुका है कि ऊर्जा ढांचे पर हमला वैश्विक बाजार को प्रभावित कर सकता है.
नेतान्याहू ईरान पर थोपना चाहते हैं ये शर्तें
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू चाहते हैं कि अमेरिका-ईरान वार्ता में तीन नहीं सिद्धांत शामिल हो, न परमाणु हथियार, न मिसाइलें, न मिलिशिया. लेकिन ईरान ने मिसाइल कार्यक्रम को गैर-परक्राम्य बताया है. कुल मिलाकर, इजरायल और अमेरिका तकनीकी रूप से मजबूत हैं, लेकिन ईरान की बढ़ती मिसाइल संख्या एक दीर्घकालिक संरचनात्मक चुनौती बनती जा रही है. यह स्थिति मध्य पूर्व में अस्थिरता और संभावित टकराव के जोखिम को बढ़ा रही है.
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सौरभ पाल का नाता उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले से है. इन्होंने अपनी पढ़ाई देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय- इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से की है. सौरभ को लिखने-पढ़ने का शौक है. …और पढ़ें
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