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होली नज़दीक है और बिहार विधानमंडल के बजट सत्र में जिन विषयों पर सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है, उसमें से एक शराबबंदी है.
विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के कई विधायक और मंत्री भी शराबबंदी पर सवाल उठा रहे हैं और इस कानून की समीक्षा की मांग कर रहे हैं.
यह ऐसे वक़्त में है जब नीतीश कुमार को बतौर मुख्यमंत्री 'सबसे ज़्यादा कमज़ोर' दौर में माना जा रहा है और उनकी 'ज़िद' पर आए इस कानून की समीक्षा की मांग ज़ोर पकड़ रही है.
इस बीच विकासशील इंसान पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी ने कहा है, "बीजेपी चाहती है कि शराबबंदी ख़त्म हो. वह अलग तरीकों से यह परसेप्शन तैयार कर रही है कि शराबबंदी पर सवाल उठे और यह ख़त्म हो. नीतीश कुमार अस्वस्थ हैं और बीजेपी हावी हो रही है."
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दिलचस्प है कि यह नीतीश कुमार ही थे जिन्होंने नवंबर 2005 में सत्ता संभालने के बाद बिहार की शराब नीति को उदार किया था. जिससे राजस्व में बेतहाशा वृद्धि हुई, गांव के स्तर पर शराब की दुकानों का एक बड़ा नेटवर्क तैयार हुआ था.
ऐसे में यह सवाल अहम है कि क्या साल 2016 में बिहार में लागू हुआ पूर्ण शराबबंदी कानून ख़त्म हो जाएगा?
राज्य को एक्साइज़ ड्यूटी (उत्पाद शुल्क) के तौर पर साल 2015-16 तक 3142 करोड़ रुपये मिलते थे वो अब शून्य हो गया है. साथ ही तेजस्वी यादव यह कहते रहे हैं कि "राज्य में शराबबंदी के नाम पर 40,000 करोड़ से ज़्यादा की अवैध समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही है."
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मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.
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बिहार में ज़हरीली शराब से होने वाली मौतों पर कभी नीतीश कुमार ने कहा था, 'जो पिएगा, वो मरेगा'. लेकिन नई सरकार के पहले बजट सत्र में नीतीश कुमार ने शराबबंदी के मसले पर दोनों ही सदनों यानी विधानसभा और विधान परिषद में चुप्पी साध ली है.
यह तब है कि जब उनके गठबंधन के साथी ही सरकार की शराबबंदी नीति पर सवाल उठा रहे हैं.
विधानसभा में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के विधायक माधव आनंद ने शराबबंदी की नीति की समीक्षा की मांग की.
वहीं बीजेपी कोटे से मंत्री लखेन्द्र पासवान ने विधानसभा के बाहर पत्रकारों से कहा, "किसी को अगर लगता है कि शराबबंदी कानून लागू करने में चूक हो रही है तो समीक्षा की मांग सही है. राज्य में सूखा नशा बढ़ा है यह भी चिंता का विषय है."
हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के राष्ट्रीय संरक्षक और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी भी शराबबंदी कानून पर सवाल उठाते रहे हैं.
विधानमंडल में कानून की समीक्षा की मांग उठने पर उन्होंने कहा, " शराबबंदी लागू है लेकिन शराब की होम डिलीवरी हो रही है. शराबबंदी के चलते गरीब लोग बहकावे में आकर सिर्फ़ दो घंटे में यूरिया आदि का इस्तेमाल करके ज़हरीली शराब बना देते हैं. गरीब लोग भी यह विषैली शराब पीते हैं. इसके चलते दलित ख़ासतौर पर भुइया-मुसहर की उम्र कम हो रही है. हमारे साथ काम करने वाले भीसू मांझी जो मेरी ही उम्र के थे, शराब के चलते पांच साल पहले ही मर गए."
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इस बहस के बीच में कांग्रेस के विधायक अभिषेक रंजन ने सभी विधायकों और अधिकारियों के ब्लड टेस्ट की मांग कर दी है.
क्या सदन में विधायक शराब पीकर आते हैं, इस सवाल पर अभिषेक रंजन ने बीबीसी से कहा, "एक बार ब्लड टेस्ट हो जाए तो शराबबंदी की पोल खुल जाएगी."
दरअसल विधानमंडल में शराब पीने के मसले पर वार-पलटवार में कई नेताओं का नाम उछल रहा है.
सत्ताधारी गठबंधन के साथ-साथ विपक्षी गठबंधन भी एक दूसरे पर नशा करने का आरोप लगा रहा है.
राजद के एमएलसी सुनील सिंह ने विधान परिषद के बाहर पत्रकारों से कहा, "एक नेता, जो सत्तारूढ़ दल के बेहद करीब हैं, उनके यहां रोजाना सामूहिक रूप से शराब पी जाती है."
इस नेता का नाम पूछने पर सुनील सिंह ने नाम बताने से इनकार कर दिया.
वहीं बीजेपी नेता जीवेश मिश्रा ने विपक्ष के एक नेता का मेडिकल बुलेटिन जारी करने की मांग की है और पूछा है, "वह अपना भाषण पढ़ते वक्त लड़खड़ा क्यों रहे थे?"
नेताओं के इस वाक् युद्ध के बीच संसदीय कार्य मंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा, "शराबबंदी सभी की सहमति से लागू हुई थी. यह बिहार में लागू है और लागू रहेगी. बिहार में कोई शराब पीने की कल्पना भी नहीं कर सकता."
इससे पहले मद्य निषेध मंत्री बिजेन्द्र यादव ने भी नवंबर 2025 में अपना पदभार संभालते हुए कहा था कि शराबबंदी लागू रहेगी.
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हाल ही में पटना यूनिवर्सिटी के हॉस्टलों में सिटी एसपी भानुप्रताप सिंह के नेतृत्व में छापेमारी हुई थी जिसमें आठ छात्र नशे की हालत में पकड़े गए थे.
राज्य सरकार की मशीनरी के लिए सिर्फ़ शराब ही नहीं बल्कि 'सूखा नशा' भी बड़ी चुनौती बन रहा है. बिहार विधान परिषद में ध्यानाकर्षण सूचना में यह मामला उठा था.
इस पर बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी ने कहा, "सरकार इस मामले में संवेदनशील है. साल 2016 से दिसंबर 2025 तक 4.50 करोड़ लीटर शराब ज़ब्त हुई, 10 लाख केस दर्ज हुए, 16 लाख लोगों की गिरफ़्तारी और 1.60 लाख वाहन ज़ब्त हुए. वहीं मादक पदार्थों में 15 हज़ार 800 किलोग्राम गांजा, 240 किलोग्राम अफ़ीम, 3.50 किलोग्राम चरस और 40,000 लीटर कफ़ सिरप ज़ब्त किया गया है. सरकार ने 67 चेकपोस्ट सीमावर्ती राज्यों एवं नेपाल की सीमा पर खोली है."
लेकिन सरकार की संवेदनशीलता के दावों के बीच राज्य में मीडिया रिपोर्ट्स में गांव-गांव तक नशे का कारोबार फैल जाने की ख़बरें लगातार आती रहती हैं.
भाकपा माले की एमएलसी शशि यादव बीबीसी से कहती हैं, "सरकार स्वीकार नहीं कर रही, लेकिन उड़ता पंजाब की तरह ही उड़ता बिहार बनता जा रहा है. हर वर्ग के अभिभावक इस सूखे नशे की सप्लाई से परेशान हैं. सूखा नशा करने के लिए बच्चे अपराध कर रहे हैं. पटना जंक्शन पर बच्चे खुलेआम नशा करते दिख जाते हैं. आने वाली पूरी पीढ़ी को बर्बाद कर दिया है. जो पुनर्वास के केन्द्र खोले गए हैं वे भी बेकार साबित हो रहे हैं."
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अविभाजित बिहार से जब झारखंड अलग हुआ था तो मज़ाक में कहा गया था कि बिहार में सिर्फ़ 'लालू , बालू और आलू' बच गया है.
लेकिन समय बीतने के साथ इनमें से बालू बहुत प्रासंगिक हो गई और बालू माफ़ियाओं का उभार हुआ और शराबबंदी के बाद शराब माफ़ियाओं की संख्या बढ़ी.
वरिष्ठ पत्रकार अरुण श्रीवास्तव कहते हैं, "राज्य में तीन कैटेगरी में अपराध बढ़े हैं. बालू माफ़िया, भू माफ़िया और शराबबंदी के बाद शराब माफ़िया. नीतीश कुमार यह कहते रहे हैं कि बिहार में 60 फ़ीसदी अपराध की वजह ज़मीन है. लेकिन उनकी शराबबंदी की ज़िद के चलते शराब और नशे से जुड़े अपराध बढ़े हैं. औरतें- बच्चे इसके कैरियर बन गए हैं और पूरे राज्य में एक सप्लाई चेन तैयार हो गई है जिसके बारे में सबको पता है."
नई सरकार बनने के बाद गृह विभाग संभालते हुए सम्राट चौधरी ने कहा था, "हमारी सरकार ने 400 माफ़ियाओं की लिस्ट तैयार कर ली है. बालू, भू और शराब माफ़िया कोई भी बिहार में बच नहीं पाएगा."
कई मौकों पर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव दोहराते रहे हैं कि शराबबंदी लागू होने से राज्य को आर्थिक नुकसान हो रहा है और उनके मुताबिक शराब के अवैध कारोबार की 40,000 करोड़ रुपये की समानांतर इकोनॉमी राज्य में चल रही है. केन्द्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने भी कहा है कि शराबबंदी से बिहार को आर्थिक नुकसान हो रहा है.
राज्य को हो रहे आर्थिक नुकसान की गवाही वार्षिक बजट भी देता है.
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साल 2010-11 में एक्साइज़ ड्यूटी से 1 हज़ार 523 करोड़ रुपये राज्य को मिलता था जो साल 2014-15 में बढ़कर 3217 करोड़ हो गया था. शराबबंदी कानून लागू होने के बाद ये एक्साइज़ ड्यूटी शून्य हो गई. राज्य सरकार के कर राजस्व में भी गिरावट दिखी.
साल 2014-15 में ये आय के स्रोतों का 21.99 फ़ीसदी था, जो वित्तीय वर्ष 2024-25 में घटकर 18.81 फ़ीसदी रह गया. वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में राज्य सरकार का कर राजस्व 65 हज़ार 800 करोड़ रुपये यानी आय के स्रोत का 18.92 फ़ीसदी रहने का अनुमान है.
बिहार को राजस्व घाटे का तर्क देकर ही जनसुराज प्रमुख प्रशांत किशोर ने भी चुनाव से पहले वादा किया था कि अगर वह सत्ता में आए तो एक घंटे के अंदर शराबबंदी कानून ख़त्म कर देंगें.
नीतीश सरकार ने शराबबंदी कानून लागू करने के बाद साल 2017-18 में एक सर्वे करवाया था. जिसके मुताबिक शराबबंदी के बाद दूध की खपत बढ़ी, घरेलू हिंसा में कमी आई, बलात्कार, हत्या, डकैती घटी थी.
लेकिन शराबबंदी को लेकर विधानमंडल में उठ रहे सवाल और नेताओं के एक दूसरे पर वार-पलटवार इस बात का संकेत है कि बिहार में शराबबंदी के बाद भी यहां के लोगों की शराब तक पहुंच है.
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