Afghanistan Pakistan conflict: 1893 की डूरंड लाइन ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सदियों पुराना विवाद खड़ा किया. क्या खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान कभी अफगानिस्तान का हिस्सा थे? जानिए पूरी सच्चाई.
Afghanistan Pakistan conflict: अफगानिस्तान में साल 2021 के बाद जबसे सत्ता बदली है. यह पहली बार है, जब अफगानिस्तान ने फुल फ्लेज पाकिस्तान पर हमला बोला है. हमला इतना बड़ा है कि चीन, रूस और ईरान जैसे देशों को सामने आकर शांति की अपील करनी पड़ी. ऐसे में जानना बेहद दिलचस्प हो जाता है कि दोनों देशों के बीच तनाव की असली वजह क्या है, और पाकिस्तान के पास अफगानिस्तान का कितना हिस्सा है.
जब अफगान सेना ने डूरंड लाइन पर पाकिस्तानी चौकियों को निशाना बनाया, तो इसके पीछे केवल ताजा हवाई हमले का गुस्सा नहीं था. इसके पीछे वह टीस थी जो 1893 से चली आ रही है. अफगानिस्तान आज भी मानता है कि पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा (KPK) और बलूचिस्तान का एक बड़ा हिस्सा असल में अफगानिस्तान का है, जिसे अंग्रेजों ने धोखे से अलग कर दिया था.
बंटवारे का वो जख्म
डूरंड रेखा करीब 2,640 किलोमीटर लंबी है. इसे 1893 में ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव सर मोर्टिमर डूरंड और अफगानिस्तान के अमीर अब्दुर रहमान खान के बीच एक समझौते के जरिए खींचा गया था. अफगानिस्तान का दावा है कि यह समझौता केवल 100 साल के लिए था, जो 1993 में खत्म हो चुका है.
पाकिस्तान के पास मौजूद अफगानिस्तान के इस ‘हिस्से’ की कहानी बहुत बड़ी है. पाकिस्तान का पूरा खैबर पख्तूनख्वा प्रांत (KPK) और बलूचिस्तान का उत्तरी हिस्सा ऐतिहासिक रूप से अफगान साम्राज्य का हिस्सा था. तालिबान और उससे पहले की हर अफगान सरकार का कहना है कि अंग्रेजों ने पश्तूनों को दो हिस्सों में बांटने के लिए यह लकीर खींची थी.
आज इसी लकीर पर बाड़ लगाने को लेकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच गोलियां चल रही हैं. अफगानिस्तान का मानना है कि पाकिस्तान ने उसकी करीब 40% से 50% ऐतिहासिक जमीन पर कब्जा कर रखा है.
पश्तूनों का बंटवारा
डूरंड रेखा ने दुनिया की सबसे बड़ी जनजाति ‘पश्तूनों’ को दो देशों में बांट दिया. आज जितने पश्तून अफगानिस्तान में रहते हैं, उससे कहीं ज्यादा पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और कबीलाई इलाकों में रहते हैं. अफगानिस्तान इन सबको अपना नागरिक मानता है और इसी आधार पर उस इलाके पर दावा ठोकता है.
‘ग्रेटर अफगानिस्तान’ का सपना
तालिबान का अंतिम लक्ष्य ‘ग्रेटर अफगानिस्तान’ बनाना है, जिसमें पाकिस्तान के पेशावर से लेकर क्वेटा तक के इलाके शामिल हों. यही वजह है कि तालिबान ने पाकिस्तान द्वारा बॉर्डर पर लगाई गई कंटीली तारों को उखाड़ फेंका है.
पाकिस्तान की मजबूरी
पाकिस्तान के लिए डूरंड रेखा उसकी संप्रभुता का सवाल है. अगर वह इस रेखा को नहीं मानता, तो उसे अपने देश का लगभग आधा हिस्सा खोना पड़ेगा. इसीलिए पाकिस्तान इसे एक ‘अंतरराष्ट्रीय सीमा’ कहता है, जबकि अफगानिस्तान इसे केवल एक ‘काल्पनिक लकीर’ मानता है.
हालिया युद्ध और जमीनी हकीकत
युद्ध में तालिबान का कहना है कि वे केवल अपनी रक्षा नहीं कर रहे, बल्कि उन ‘अफगान भाइयों’ को आजाद कराने की कोशिश कर रहे हैं जो पाकिस्तान के दमन में हैं. F-16 गिराने का दावा इसी बड़े लक्ष्य का एक हिस्सा है.
कभी न खत्म होने वाला विवाद
सच तो यह है कि डूरंड रेखा दक्षिण एशिया का वो टाइम बम है जो समय-समय पर फटता रहता है. पाकिस्तान ने डूरंड लाइन के जरिए अफगानिस्तान के एक बहुत बड़े और संसाधन संपन्न हिस्से पर कब्जा जमा रखा है, जिसे अफगानिस्तान कभी स्वीकार नहीं करेगा.
आज जो आग डूरंड लाइन पर लगी है, वह केवल दो सेनाओं की लड़ाई नहीं है, बल्कि एक सदी पुराने ‘हक’ की लड़ाई है. जब तक यह जमीनी विवाद नहीं सुलझेगा, तब तक अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच शांति की उम्मीद करना बेमानी होगा.
ये भी पढ़ें- अफगानिस्तान के हमले से थर्राया पाकिस्तान! ‘Open War’ का किया ऐलान; ईरान, रूस और चीन ने की शांति की अपील
Zee Hindustan News App: देश-दुनिया, जियो-पॉलिटिक्स, इंडियन आर्मी, इंडियन एयरफोर्स, इंडियन नेवी, हथियारों और डिफेंस की दुनिया की सभी खबरें अपने मोबाइल पर पढ़ने के लिए डाउनलोड करें ज़ी हिंदुस्तान न्यूज़ ऐप
प्रशांत सिंह के लेख रिसर्च-आधारित, फैक्ट-चेक्ड और विश्वसनीय स्रोतों पर आधारित होते हैं. ये जियोपॉलिटिक्स और रक्षा से जुड़ी खबरों को आसान हिंदी में पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं. …और पढ़ें
By accepting cookies, you agree to the storing of cookies on your device to enhance site navigation, analyze site usage, and assist in our marketing efforts.