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वो हमला, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत हुई, आधी रात में नहीं बल्कि दिन के उजाले में किया गया.
ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि अमेरिका और इसराइल ने कुछ घंटे पहले मिली एक अहम ख़ुफ़िया जानकारी का फ़ायदा उठाने का फ़ैसला किया.
महीनों से, वे ऐसे ही मौक़े की तलाश में थे, जब ईरान के बड़े नेता और अधिकारी जुटें.
उन्हें पता चला कि ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई शनिवार सुबह सेंट्रल तेहरान के एक कंपाउंड में मौजूद रहने वाले हैं.
उन्हें उसी समय मिल रहे दूसरे बड़े सैन्य और इंटेलिजेंस अधिकारियों की लोकेशन का भी पता था.
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अमेरिका और इसराइल महीनों से ख़ामेनेई की मूवमेंट को ट्रैक कर रहे थे.
उन्होंने जो तरीके इस्तेमाल किए, वो एक राज़ है, हालांकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में उन तरीकों की ओर इशारा किया था.
ट्रंप ने कहा था, "वह हमारे इंटेलिजेंस और बहुत एडवांस्ड ट्रैकिंग सिस्टम से बच नहीं पाए."
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ख़ुफ़िया जानकारी का सोर्स कोई इंसान हो सकता है जो रिपोर्ट कर रहा हो, हालांकि इसमें ईरानी लोगों की टेक्निकल ट्रैकिंग होने की ज़्यादा संभावना लगती है.
पिछले साल जून में 12 दिन की लड़ाई में, इसराइल ने ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम से जुड़े साइंटिस्ट और अधिकारियों को निशाना बनाया था.
तब लोगों की मूवमेंट को समझने के लिए टेलीकॉम और मोबाइल फ़ोन सिस्टम में सेंध लगाने की बात कही गई थी.
इसमें कभी-कभी ख़ास अधिकारियों से जुड़े बॉडीगार्ड की मूवमेंट को ट्रैक करना भी शामिल था.
लंबे समय तक ऐसा करते रहने से लोगों की गतिविधियों का अंदाज़ा लगाने और समझने के साथ-साथ कमज़ोर पलों को खोजने के लिए एक "पैटर्न ऑफ़ लाइफ़" बनाने में मदद मिल सकती है.
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ईरान जानता था कि ख़ामेनेई उसके दुश्मनों की नज़र में हैं. ऐसे में अपने दुश्मनों के तरीकों की पहचान न कर पाना ईरानी सुरक्षा और इंटेलिजेंस की गहरी नाक़ामी दिखाती है.
या फिर ये इसराइल और अमेरिका की ट्रैकिंग के नए तरीके खोजने के लिए अपने मेथड को बदलते रहने की काबिलियत को दिखाती है.
ईरानियों ने यह भी अंदाज़ा लगाया होगा कि दिन में हमला होने की संभावना कम है.
इस मामले में, न्यूयॉर्क टाइम्स का कहना है कि ख़ुफ़िया जानकारी सीआईए (सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी) से आई थी. ये ख़ुफ़िया जानकारी असल हमला करने के लिए इसराइल को बढ़ाई गई.
ऐसे संकेत हैं कि ईरान पर हमले में इसराइल ने शीर्ष नेतृत्व के ठिकानों और अमेरिका ने सैन्य ठिकानों पर फ़ोकस किया.
ख़ास बात यह थी कि इंटेलिजेंस से ख़ामेनेई और दूसरे ईरानी अधिकारियों की मूवमेंट के बारे में पहले से ही काफ़ी जानकारी मिल गई थी, ताकि लंबी दूरी की मिसाइलें दागने वाले जेट का इस्तेमाल करके हमले का प्लान बनाया जा सके.
इस हमले का प्लान एक बड़े अभियान की शुरुआत का संकेत देना था और मौक़े का फ़ायदा उठाने के लिए इसे आगे बढ़ाया गया.
इसराइली जेट को तेहरान पहुंचने में करीब दो घंटे लग सकते हैं, लेकिन यह साफ़ नहीं है कि इसराइल ने अपने हथियार कितनी दूर से दागे.
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ख़बर है कि इसराइली जेट विमानों ने स्थानीय समय के अनुसार सुबह करीब 9:40 बजे कंपाउंड पर हमला करने के लिए 30 बमों का इस्तेमाल किया.
ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि ख़ामेनेई अपनी सुरक्षा के लिए कंपाउंड के नीचे एक अंडरग्राउंड बंकर का इस्तेमाल कर रहे थे (हालांकि, खबर है कि ईरानी सरकार के पास इससे भी ज़्यादा गहरे बंकर हैं)
टारगेट पर पक्का हमला करने के लिए यानी काफ़ी गहराई तक जाने के लिए कई हथियारों की ज़रूरत पड़ी होगी.
ईरान में दूसरी जगहों पर भी हमला हुआ, जिसमें राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान का ऑफ़िस भी शामिल है, जिन्होंने बाद में एक बयान जारी कर कहा कि वह सुरक्षित हैं.
इसराइल ने मारे गए लोगों में ईरान के सात सीनियर रक्षा अधिकारियों का नाम बताया है, जिनमें ईरान के डिफ़ेंस काउंसिल सेक्रेटरी अली शमखानी, रक्षा मंत्री ब्रिगेडियर जनरल अज़ीज नसिरज़ादेह और ईरान की इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) कमांडर जनरल मोहम्मद पाकपोर शामिल हैं.
फ़्लोरिडा के मार-ए-लागो में आधी रात का समय था, जब राष्ट्रपति ट्रंप हमले पर नज़र रखने के लिए अपने कुछ बड़े अधिकारियों के साथ थे.
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के मारे जाने की पुष्टि होने में घंटों लग गए.
हालांकि, ईरान इसके लिए तैयार था, ऐसी खबरें हैं कि न केवल ख़ामेनेई बल्कि कई सीनियर अधिकारियों के उत्तराधिकार की योजना भी तैयार कर ली गई थी.
अभी तक यह साफ़ नहीं है कि इस हत्या का पूरे संघर्ष पर क्या असर होगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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