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सोनिया गांधी ने ईरान के मुद्दे पर केंद्र सरकार के रुख की तीखी आलोचना की है. पहले की कांग्रेस सरकारों, और यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति पर हमला बोला है – और अपनी दलील के सपोर्ट में याद दिलाया है कि कैसे जरूरत के वक्त ईरान पूरी तरह भारत के साथ खड़ा रहा है.
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने लेख में सोनिया गांधी का कहना है, भारत लंबे वक्त से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ यानी ‘दुनिया एक परिवार है’ जैसे आदर्श का हिमायती रहा है… यह सभ्य सोच कोई कूटनीति का नारा भर नहीं है… यह न्याय, संयम और संवाद के प्रति प्रतिबद्धता है, भले ही ऐसा करना थोड़ा मुश्किल हो… दबाव की हालत में चुप रहना जिम्मेदारी से पीछे हटना होता है… किसी क्षेत्रीय ताकत से बढ़कर भारत अपनी भूमिका चाहता है, और ऐसा लंबे समय से है… भारत ने खुद को दुनिया को नैतिकता की नसीहत देने वाले के रूप में पेश किया है.
और फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टार्गेट करते हुए सोनिया गांधी कहती हैं, भारत सरकार ने हत्या या ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन की निंदा करने से परहेज किया है… शुरू में, बड़े पैमाने पर हुए अमेरिका-इजराइल हमले को नजरअंदाज करते हुए, प्रधानमंत्री ने खुद को सिर्फ यूएई पर ईरान की जवाबी कार्रवाई की निंदा तक सीमित रखा, और उससे पहले के घटनाक्रम पर कोई बात नहीं की… बाद में भी सिर्फ गहरी चिंता जताई, संवाद और कूटनीति की बात कही – जबकि, इजराइल-अमेरिका की तरफ से शुरू किए गए बड़े हमलों के पहले से ही यह सब चल रहा था.
ईरान पर सरकार के रुख से कांग्रेस खफा क्यों?
कांग्रेस संसदीय बोर्ड की चेयरपर्सन सोनिया गांधी का एक लेख इंडियन एक्सप्रेस ने प्रकाशित किया है. ईरान के सबसे बड़े नेता अयातुल्ला खामनेई की हत्या का जिक्र करते हुए सोनिया गांधी ने कहा है, हत्या से महज 48 घंटे पहले, प्रधानमंत्री इजराइल की यात्रा से लौटे थे, जहां उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के प्रति अपना स्पष्ट समर्थन दोहराया, जबकि गाजा संघर्ष में बड़ी संख्या में नागरिकों की मौत पर, जिनमें कई महिलाएं और बच्चे शामिल हैं, दुनिया भर में आक्रोश कायम है.
पहले की ही तरह केंद्र की बीजेपी सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए सोनिया गांधी ने लिखा है, ऐसे वक्त जब ग्लोबल साउथ के कई मुल्क, साथ ही बड़ी ताकतें, ब्रिक्स में भारत के साझेदार जैसे रूस और चीन, दूरी बनाए हुए हैं. नैतिक स्पष्टता के बगैर भारत का खुला राजनीतिक समर्थन एक स्पष्ट और चिंताजनक बदलाव दिखाता है.
सोनिया गांधी ने अपने लेख में ईरान मसले से जुड़ी कई बातों की ओर ध्यान खींचने की कोशिश की है –
1. जब दुनिया के किसी नेता को टार्गेट कर की गई हत्या पर हमारे देश की ओर से संप्रभुता या अंतरराष्ट्रीय कानून की स्पष्ट रक्षा नहीं की जाती, और निष्पक्षता छोड़ दी जाती है, तो यह हमारी विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
2. किसी राष्ट्र प्रमुख को निशाना बनाकर हत्या कर देना, ऐसे सिद्धांतों के मूल भावना पर चोट करती है. अगर ऐसे कृत्य पर भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की ओर से सिद्धांत आधारित आपत्ति न जताई जाए, तो अंतरराष्ट्रीय मानकों का खात्मा भी सामान्य होता जाता है.
3. 1994 में, जब इस्लामिक सहयोग संगठन के कुछ हिस्सों ने कश्मीर के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी, तब ईरान ने ऐसी कोशिशों को रोकने में अहम भूमिका निभाई थी.
4. ईरान ने पाकिस्तान सीमा के पास जाहेदान में भारत की राजनयिक मौजूदगी को भी संभव बनाया है, जो ग्वादर बंदरगाह और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के विकास के संतुलन के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है.
5. यह कोई नैतिक मुद्दा भर नहीं है, बल्कि रणनीतिक जरूरत भी है. करीब एक करोड़ भारतीय खाड़ी देशों में रहते हैं, और काम करते हैं. खाड़ी युद्ध से लेकर यमन, इराक और सीरिया वार तक – अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भारत की क्षमता, अपनी स्वतंत्र पहचान पर टिकी रही है, न कि किसी के प्रतिनिधि के रूप में.
मौजूदा सरकार को याद होना चाहिए कि अप्रैल 2001 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तेहरान यात्रा के दौरान ईरान के साथ भारत के गहरे संबंधों को गर्मजोशी से दोहराया था. लेकिन, लंबे समय से चले आ रहे संबंधों की उनकी स्वीकारोक्ति का हमारी मौजूदा सरकार के लिए कोई मायने रखता हो, नजर नहीं आता.
ईरान पर कांग्रेस का रुख क्या है?
सोनिया गांधी ने ईरान के मसले पर कांग्रेस का स्टैंड भी बताया है. सोनिया गांधी का कहना है, कांग्रेस ने ईरान की जमीन पर हुए बमबारी और टार्गेटेड किलिंग की साफ शब्दों में निंदा की है, और उन्हें क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर खतरनाक बताया है जिसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं. हमने ईरान की जनता और दुनिया भर के शिया समुदायों के प्रति संवेदना व्यक्त की है और दोहराया है कि भारत की विदेश नीति विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर आधारित है, जिसका भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में उल्लेख है… ये सिद्धांत – संप्रभु समानता, हस्तक्षेप न करना और शांति को बढ़ावा देना – ऐतिहासिक रूप से भारत की कूटनीतिक पहचान का हिस्सा रहे हैं… इसलिए मौजूदा चुप्पी केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि हमारे सिद्धांतों से अलग नजर आती है.
ईरान पर संसद में बहस की मांग
कांग्रेस की सबसे सीनियर नेता ने ईरान पर भी ऑपरेशन सिंदूर की तरह संसद में बहस कराए जाने की मांग की है. और, संसद को इस मुद्दे पर भी बहस के लिए सबसे सही जगह बताया है. सोनिया गांधी ने लिखा है, जब संसद फिर से बैठे, तो खुलकर और बिना टालमटोल के इस मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए.
सोनिया गांधी लिखती हैं, दुनिया के किसी राष्ट्र प्रमुख की टार्गेट करके हत्या, अंतरराष्ट्रीय मानकों में गिरावट और पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता जैसे मामूली मसले नहीं हैं, ये सीधे भारत के रणनीतिक हितों और नैतिक प्रतिबद्धताओं से जुड़े हैं. भारत की स्थिति अभी तक साफ नहीं की गई है. यह लोकतांत्रिक जवाबदेही की डिमांड है और रणनीतिक साफगोई भी यही कहती है.
फिक्र सिर्फ विदेश नीति की, या कांग्रेस के वोट बैंक की?
ईरान के मुद्दे पर अखबार में लेख के जरिए सामने आए सोनिया गांधी के राजनीतिक बयान पर सवाल भी खड़े किए जा रहे हैं. सवाल ये है कि वास्तव में सोनिया गांधी को दुनिया में भारत की छवि की ही फिक्र है, या देश की चुनावी राजनीति में कांग्रेस के वोट बैंक की?
सोशल साइट X पॉलिटिकल कीड़ा हैंडल से सवाल उठाया गया है, हर दूसरे महीने सोनिया गांधी गाजा, हमास, ईरान जैसे मसलों पर लिखती रहती हैं. लेकिन, क्या आपने कभी उन्हें बांग्लादेशी हिंदुओं के लिए एक शब्द भी लिखते देखा है? नहीं, क्योंकि इससे उनके वोट बैंक को खुश करने में मदद नहीं मिलती.
बीजेपी और केंद्र में सत्ताधारी एनडीए में उसके सहयोगी दलों ने भी सोनिया गांधी के लेख पर सवाल उठाया है. रांची में बीजेपी नेता प्रतुल शाह देव कहते हैं, सोनिया गांधी को याद रखना चाहिए कि दुनिया के लिए गुटनिरपेक्षता की नीति भारत में उनकी सास (इंदिरा गांधी) और उनकी सास के पिता (जवाहरलाल नेहरू) के समय से चली आ रही है… लंबे समय से भारत की परंपरा रही है कि जब भी दो देशों के बीच तनाव बढ़ता है, भारत हमेशा मध्यस्थ की भूमिका निभाता है.
तेलंगाना में बीजेपी प्रवक्ता प्रकाश रेड्डी ने भी सोनिया गांधी के लेख पर सवाल खड़ा किया है. उनका कहना है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार पूरी तरह स्पष्ट है, और उसकी विदेश नीति भी बिल्कुल साफ है. हम सबके साथ दोस्ती रखते हैं. जो भी भारत के हित में है, हम उसी देश का समर्थन कर रहे हैं. जहां तक ईरान का सवाल है, जब ईरान हमास, आतंकी गतिविधियों और आतंकी संगठनों का समर्थन कर रहा था, तब हमने उसकी निंदा की थी. जहां भी जरूरत पड़ी, हमने समर्थन किया
#WATCH | Hyderabad, Telangana: On Congress Parliamentary Party Chairperson Sonia Gandhi’s article on the Iran-Israel conflict and the Central Govt’s stance, BJP Spokesperson Prakash Reddy says,
“Sonia Gandhi’s letter in connection with the Iran-America-Israel war is ridiculous.… pic.twitter.com/vpkzeQgp2s
बीजेपी प्रवक्ता ने कांग्रेस से पूछा है, प्रधानमंत्री जंग को लेकर सभी अरब देशों से बात कर रहे हैं. युद्ध का जारी रहना किसी के लिए भी अच्छा नहीं है. लेकिन, कांग्रेस को समझना चाहिए कि जब हमास ने इजराइली लोगों पर हमला किया, उन्हें मारा और बेरहमी से अगवा किया, तब कांग्रेस का क्या रुख था? क्या वे हमास के पक्ष में थे? कांग्रेस पार्टी परोक्ष रूप से आतंकी गतिविधियों का समर्थन कर रही है.
बीजेपी के सहयोगी और यूपी सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने सोनिया गांधी को काउंटर करते हुए कहा है, वो गलत बात कर रही हैं. प्रधानमंत्री ने दोनों देशों से बातचीत की है, और शांति के लिए पहल की है. उनकी सोच और प्रधानमंत्री की सोच में बहुत बड़ा फर्क है.
Lucknow, Uttar Pradesh: Minister O.P. Rajbhar on Congress leader Sonia Gandhi questioning the central government over the death of Iran’s Supreme Leader Khamenei, says, “She is speaking incorrectly. The Prime Minister has held talks with both countries and has taken initiatives… pic.twitter.com/ry8TdNh0is
सोनिया गांधी के बयान का सकारात्मक पक्ष
कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के राजनीतिक बयान के कई कारण हो सकते हैं. विदेश नीति की चिंता भी हो सकती है, और जैसा सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं, चुनावी राजनीति में कांग्रेस के वोट बैंक की चिंता भी – लेकिन, तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि भारत में ईरान के साथ भी लोग हैं. जगह जगह विरोध प्रदर्शन के साथ साथ देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भी ईरान की बात कर रही है, उसके प्रति अपनी चिंता जाहिर कर रही है.
यह दुनिया की लोकतांत्रिक व्यवस्था का बेहद खूबसूरत पहलू है. सरकार का एक पक्ष है, और विपक्ष का भी एक पक्ष है – मतलब, ईरान हो या ऐसा दुनिया का ऐसा कोई भी मसला. भारत में एक साथ और एक ही वक्त दो पक्ष मौजूद मिलते हैं. पक्ष में भी, और विपक्ष में भी.
चाहे वो ईरान की बात हो, या गाजा पट्टी की. दुनिया को एक साथ भारत का दोनों रुख देखने को मिलता है – जो दुनिया भर में लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है. सत्ता पक्ष का स्टैंड डिप्लोमैटिक परिस्थितियों के हिसाब से है, लेकिन विपक्ष की भी अपनी आवाज है. भले ही वो देश की अंदरूनी राजनीति के कारण हो, लेकिन एक अलग आवाज तो है ही.
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