ईरान संकट के बाद अब रूस और अमेरिका से तेल खरीदेगा भारत, कंट्रोल रूम स्थापित – Jagran

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भारत पश्चिम एशिया संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा अनिश्चितता के बीच कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय है। देश रूस और अमेरिका से तेल खरीद बढ़ान …और पढ़ें
भारत की मुख्य चिंता ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति से जुड़ी हुई है
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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारत ने कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए वैकल्पिक रणनीति पर काम तेज कर दिया है। सरकार रूस के साथ-साथ अमेरिका से भी अधिक तेल खरीदने के विकल्पों पर सक्रिय बातचीत कर रही है ताकि खाड़ी क्षेत्र में संभावित व्यवधान का असर घरेलू बाजार पर न्यूनतम रहे।
पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने आश्वस्त किया है कि देश के पास पेट्रोलियम उत्पादों का पर्याप्त भंडार है। मंत्रालय ने देशभर में पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति और भंडार की स्थिति की निगरानी के लिए 24×7 कंट्रोल रूम स्थापित किया है। युद्ध के लंबा खींचने की स्थिति में किसी आपातकालीन स्थिति से निबटने के लिए भी चरणबद्ध उपायों पर काम हो रहा है।
पुरी ने यहां बताया कि, “भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक, चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर और पांचवां सबसे बड़ा पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातक है। हमने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा आपूर्ति के स्त्रोतों में विविधता लाकर उपलब्धता और इसकी कीमतों को किफायती रखने को सुनिश्चित किया है। देश के पास पर्याप्त कच्चे तेल और पेट्रोल, डीजल व एटीएफ जैसे प्रमुख उत्पादों का भंडार है, जिससे अल्पकालिक व्यवधानों से निपटा जा सकता है।”
भारत के पास कुल आठ हफ्तों का भंडार है। इसमें चार हफ्तों का पेट्रोल व डीजल का भंडार है जबकि चार हफ्तों के कच्चे तेल का भंडार है। ऊर्जा विश्लेषण संस्था केपलर का भी कहना है कि भारत के पास लगभग 10 करोड़ बैरल का कच्चे तेल का स्टॉक है, यदि होरमुज जलडमरूमध्य से आपूर्ति बाधित होती है, तो यह भंडार देश की जरूरतों को लगभग 40-45 दिनों तक पूरा कर सकता है।
भारत की मुख्य चिंता ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति से जुड़ी हुई है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि भारत अपनी जरूरत का 88 फीसदी कच्चा तेल बाहर से आयात करता है और इसका 40 फीसद हिस्सा होर्मुज से हो कर आता है। शेष जल मार्ग से बाकी 60 फीसद हिस्सा आता है। 40 फीसद हिस्सा बहुत बड़ा है। इस मार्ग को तेल कारोबारी पसंद करते हैं क्योंकि इससे ढुलाई की लागत काफी कम हो जाती है और जल्द भारत जैसे विशाल बाजार को आपूर्ति सुनिश्चित होता है।
ईरान संकट के कारण इस मार्ग से प्रवाह प्रभावित हुआ है, जिससे वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ी है। अधिकारियों का कहना है कि क्रूड खरीद के लिए भारतीय तेल कंपनियां लगातार रूस और अमेरिका के संपर्क में हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रूस से रियायती दरों पर बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदा है। अब नई परिस्थिति में भले ही रूस भारत को पहले जैसा डिस्काउंट नहीं दे लेकिन तेल आपूर्ति वह निश्चित तौर पर बढ़ाने की स्थिति में है।
सनद रहे कि ट्रंप प्रशासन का पहले ही भारत पर दबाव है कि वह रूस से कम तेल खरीदे और अमेरिका से बढ़ाए। भारत ने अमेरिका से तेल की भारी खरीद शुरू भी कर दी है। यह खरीद और बढ़ाये जाने की पूरी संभावना है। लेकिन अमेरिकी दबाव में रूस से तेल खरीदने में जो कटौती की गई थी वह फैसला फिर से पलटा जा सकता है।
सनद रहे कि हालिया संकट के बाद वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया है, जो ईरान संकट शुरू होने के बाद लगभग 15 फीसद की वृद्धि दर्शाता है। ऊंची कीमतें भारत के आयात बिल पर सीधा असर डालती हैं। भारत ने 31 मार्च 2025 को समाप्त वित्त वर्ष में कच्चे तेल के आयात पर 137 अरब डॉलर खर्च किए थे। चालू वित्त वर्ष 2025-26 के पहले दस महीनों (अप्रैल 2025-जनवरी 2026) में ही 206.3 मिलियन टन कच्चे तेल के आयात पर 100.4 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं।

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