ईरान और इजरायल के बीच भड़का युद्ध अब चरम पर पहुंच चुका है। दुनिया इसके असर से डरी हुई है, लेकिन इस युद्ध की सबसे गहरी आहट भारत के एक छोटे से कस्बे किशनगंज के मिनी ईरान तक महसूस की जा रही है।
यहां लगभग 500 साल से बसे ईरानी मूल के शिया परिवार इन दिनों बेचैनी, गुस्से और दर्द से भरे हुए हैं। ईरान में हर मिसाइल, हर मौत और हर धमाके की आवाज किशनगंज तक आ रही है, मानो यह हमला उनके अपने घर पर हुआ हो।
शिया परिवार का सवाल भारत चुप क्यों है?
मिनी ईरान की गलियों में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा किसी एक बात की है तो वो इजराइल-ईरान के बीच छिड़ी जंग की। ईरान पर जुल्म हो रहा है, लेकिन भारत खामोश क्यों है? जुल्म देखकर भी शांत रहे तो वो भी जुल्म है।
सय्यद इमाम अली, जो वहां के बुजुर्ग और समुदाय के प्रभावी व्यक्ति हैं, गुस्से में कहते हैं अगर जालिम को आप जालिम नहीं कहते तो आप भी जालिम हैं। भारत बड़ा देश है, आवाज उठा सकता है, लेकिन चुप बैठा है। चुप रहना भी जुल्म देखने की सहमति है।
उनकी यह बात सुनकर आसपास खड़े लोग सिर हिलाते हैं। उनके लिए यह युद्ध भू-राजनीति नहीं, खून और पहचान का सवाल है।
हर धमाके से दिल बैठ जाता है
ईरान में जारी हमले, हवाई हमलों में मारे गए नागरिक, और सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामनेई की मौत की खबरों ने इस समुदाय को गहराई से हिला दिया है। मोतीबाग के मोहसिन रजा कहते हैं, खामनेई सिर्फ ईरान के नेता नहीं थे, वो पूरी शिया दुनिया के बाप जैसे थे। उनकी मौत की खबर से पूरा मोहल्ला रो पड़ा था।
टीवी पर ईरान के अस्पतालों में घायल बच्चों की तस्वीरें देखकर लोग कई घरों में इकट्ठा होकर दुआ करते हैं।
500 साल पुराना रिश्ता दिल ईरान में, जिंदगी भारत में
किशनगंज का मिनी ईरान सिर्फ नाम भर नहीं है। यहां रहने वाले परिवारों की जड़ें ईरान के शिराज से जुड़ी हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि उनके पूर्वज मुगल काल में हुमायूं और शेरशाह की लड़ाई के समय ईरान से भारत पहुंचे थे। इस दौरान वो लोग घोड़े बेच कर अपना गुजारा करते थे। सोनपुर और खागड़ा मेले में व्यापार करते हुए ये सभी यहीं बस गए।
मोतीबाग कर्बला वार्ड नंबर 5 के एहसान अली बताते हैं, 1902 से हमारा परिवार किशनगंज में है। पांच पीढ़ियां यहीं दफन हुई हैं, लेकिन हमारी संस्कृति आज भी ईरान की ही है।
किशनगंज कैसा है मिनी ईरान?
किशनगंज के मोतीबाग कर्बला इलाके में 200 साल के यहां ईरानी बसे हैं। यह इलाका ईरानी संस्कृति का जीवंत केंद्र है। यहां घरों में फारसी बोली जाती है। मुहर्रम ईरानी शैली में मनाया जाता है। महिलाएं आज भी पारंपरिक ईरानी पोशाक पहनती हैं। रसोई में ईरानी व्यंजन बनते हैं। बच्चे ईरानी नज्में सुनते हुए बड़े होते हैं।
करीब 11.49 लाख मुसलमानों में, ईरानी मूल के शिया परिवारों की संख्या यहां खासा प्रभाव रखती है।
समुदाय की मांग- भारत ईरान पर हो रहे हमले के खिलाफ बोले
सय्यद इमाम कहते हैं ईरान पर जुल्म हो रहा है। अगर कल को हिंदुस्तान पर हमला हो जाए तो क्या ईरान वाले खुश होंगे? कभी नहीं। तो भारत जालिम के साथ दोस्ती क्यों कर रहा है?
उनका इशारा प्रधानमंत्री मोदी द्वारा हाल ही में इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू से मुलाकात और बाद में हुई फोन पर बातचीत पर है।
मिनी ईरान में मातम जैसा माहौल
किशनगंज में इस समय हालात त्योहारों जैसे नहीं, बल्कि शोक के जैसे हैं। ईरान में जारी संघर्ष ने यहां के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी बदल दी है। दुकानों में कम भीड़, व्यापारियों का सफर सीमित, ईद की तैयारियों पर असर, मोहल्ले में हर शाम दुआ। टीवी और मोबाइल पर सिर्फ ईरान की खबरें चलती हैं।
एक युवती ने कहा, पहले ईद से पहले घरों में सजावट होती थी। आज घरों में टीवी की आवाज भी कम रखी गई है।
हिंदुस्तान पर हमला होगा तो ईरानियों को अच्छा लगेगा?
सैयद इमाम कहते हैं कि जो भी ईरानियों पर हमला कर रहे हैं, वे कभी बच नहीं सकते। जो जुल्म करते हैं, अल्लाह उन्हें ऊपर से देख रहा है। हमारी भारत सरकार से यही मांग है कि वह ईरान का समर्थन करे। वहां जो हो रहा है, वह गलत है और इस पर भारत को आवाज उठानी चाहिए। आज हमारे इस्लाम पर जुल्म हो रहा है।
कल को हिंदुस्तान पर भी जुल्म हो सकता है। खुदा न खास्ता अगर ऐसा हुआ तो क्या ईरान के लोग खुश होंगे? क्या ईरान की सरकार तब भी जालिमों से दोस्ती का हाथ मिलाएगी? क्या यह भारतवासियों को अच्छा लगेगा?
क्या भारत के लोग जालिम हैं?
सैयद इमाम आगे बताते हैं, जैसे आज ईरान पर जुल्म हो रहा है और जो उन पर हमला कर रहे हैं वे जालिम हैं। उसी तरह भारत की खामोशी भी समझ से परे है। हमारे यहां कहा जाता है यदि आप जालिम को जालिम नहीं कहते, तो फिर आप भी जालिम माने जाते हैं। जो जुल्म को खामोशी से देखते हैं, वे भी जालिम होते हैं। आज भारत भी कुछ ऐसा ही कर रहा है। जो लोग इस अत्याचार का समर्थन कर रहे हैं, वे भी नासमझ हैं। हालांकि, ऐसा नहीं है कि हिंदुस्तान में सब बेअक्ल हैं।
PM मोदी के इजाराइल दौरे के 2 दिन बाद छिड़ी जंग
पीएम मोदी हाल ही में इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मिलने गए थे। उनके लौटने के दो दिन बाद ही हमला हो गया। हालात बिगड़ने के बाद उन्होंने नेतन्याहू से फोन पर बात की, लेकिन इस मसले पर कोई सख्त बात नहीं कही। कम से कम उन्हें इतना कहना चाहिए था कि ‘नेतन्याहू, आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था। आपने आंखें पूरी तरह बंद कर ली हैं। अगर दोस्ती ऐसी हो, जिसमें सच बोलना भी मुश्किल हो जाए, तो ऐसी दोस्ती का क्या मतलब है?
ईरान के लिए दुआ और भारत से उम्मीद
समुदाय के बुजुर्ग और युवाओं का कहना है हम भारत के हैं, लेकिन हमारी नसों में ईरान की मिट्टी है। दोनों देश हमारे लिए घर जैसे हैं। इसलिए युद्ध के हर वार की तकलीफ यहां महसूस की जाती है।
मोतीबाग की एक महिला सिया ने कहा, ईरान में बच्चे मरते हैं तो हमारी मांओं का दिल चीख उठता है। हमारी दुआ है अमन लौट आए।
युद्ध का असर व्यापार पर
मिनी ईरान के कई घरों में लोग चश्मा का कारोबार, फोटो फ्रेम, कीमती पत्थरों का व्यापार, रत्न तराशने का काम करते हैं। लेकिन युद्ध और अस्थिरता के चलते व्यापार में कमी आई है। बाजारों में ग्राहक कम हैं और दूसरे राज्यों में जाना मुश्किल हो गया है।
हैदर अली बताते हैं पहले महीने में 20–25 दिन बाहर रहते थे। अब 8–10 दिन भी मुश्किल है। होटल वाले पूछताछ करते हैं। कहते हैं आप ईरान से तो नहीं हैं? ये सवाल उन्हें अंदर तक चुभ जाते हैं। हम हिंदुस्तानी हैं, लेकिन हमारी रूह ईरान की पुकार सुनती है।
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