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अमेरिका-इसराइल और ईरान के बीच की जंग एक व्यापक क्षेत्रीय टकराव में तब्दील हो गई है.
ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमले खाड़ी के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंच रहे हैं. वो अमेरिकी ठिकानों से आगे बढ़कर कई खाड़ी देशों में हवाई अड्डों, ऊर्जा ठिकानों, बंदरगाहों और नागरिक स्थलों को निशाना बना रहे हैं.
ईरानी हमलों की अरब और पश्चिमी नेताओं ने व्यापक रूप से निंदा की है. साथ ही क्षेत्र के प्रमुख देशों ने बढ़ते संकट को नियंत्रित करने के उपायों पर विचार-विमर्श तेज कर दिया है.
खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के विदेश मंत्रियों ने भी एक आपातकालीन बैठक बुलाई.
उन्होंने चेतावनी जारी की कि आगे के हमले 'सामूहिक आत्मरक्षा उपायों' को जन्म दे सकते हैं. उन्होंने क्षेत्र को एक व्यापक युद्ध में धकेलने से रोकने के लिए तनाव कम करने की अपील की.
बहरीन स्थित डेरासैट सेंटर ने इस बात पर जोर दिया कि खाड़ी देशों ने ईरान के ख़िलाफ़ कोई शत्रुतापूर्ण कार्रवाई नहीं की है, फिर भी ईरानी हमलों में नागरिकों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने के कारण वे संघर्ष में उलझ गए हैं.
इसके चलते संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत कड़ी अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही की मांग उठ रही है.
क्षेत्रीय संकट के बढ़ने की वजह से खाड़ी देशों को अमेरिका के साथ अपने सुरक्षा संबंधों पर दोबारा विचार करना पड़ रहा है.
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इसके साथ ही उन्हें भविष्य की रणनीतिक साझेदारियों के स्वरूप का पता लगाने और अपनी रक्षा रणनीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.
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मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.
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अरब के क्षेत्रीय और घरेलू मीडिया ने जीसीसी देशों के अमेरिका के प्रति दृष्टिकोण को अलग-अलग तरह से पेश किया है.
कुछ मीडिया आउटलेट्स ने रॉयटर्स की एक रिपोर्ट का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि खाड़ी देशों ने अमेरिका पर 'होर्मुज़ संकट के गहराने के साथ ही ईरान को पूरी तरह से निष्क्रिय करने' का दबाव डाला था.
वहीं दूसरी ओर अन्य मीडिया आउटलेट्स ने ईरान पर हमला करने के अमेरिकी फ़ैसले की आलोचना की. साथ ही अमेरिका पर 'खाड़ी देशों को निशाना बनाए जाने की आशंका को नज़रअंदाज करने' का आरोप लगाया.
इस बीच एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस युद्ध ने खाड़ी देशों की अमेरिकी सुरक्षा के प्रति धारणा को बुनियादी रूप से बदल दिया है. और यह खाड़ी देशों और अमेरिका के संबंधों के साथ उनके रणनीतिक गठबंधन के भविष्य में बदलाव ला सकता है.
16 मार्च को अरबी पॉडकास्ट 'एहाता' ने खाड़ी देशों के मौजूदा संघर्ष से सीखे जा पाने वाले सबकों पर चर्चा की.
पॉडकास्ट में एक्सपर्ट्स ने कहा कि खाड़ी देशों की सुरक्षा की अवधारणा 'कमजोर' हो गई है और क्षेत्र में अमेरिकी मौजूदगी 'आर्थिक और सैन्य दोनों रूप से लगातार बोझ बनती जा रही है' क्योंकि ईरान अब क्षेत्र में अमेरिकी संपत्तियों को वैध निशाना मानता है.
एक्सपर्ट्स ने बताया कि हालांकि ईरान ने जवाबी कार्रवाई में अमेरिका से जुड़े आर्थिक हितों को निशाना बनाने की चेतावनी दी थी, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने तनाव बढ़ाना जारी रखा, जिससे 'खाड़ी देशों की यह धारणा और मजबूत हो गई कि अमेरिका उनकी सुरक्षा चिंताओं पर ध्यान नहीं दे रहा है.'
एक एक्सपर्ट ने कहा कि इससे खाड़ी देशों में 'धोखाधड़ी या विश्वासघात' की गहरी भावना पैदा हुई है.
उन्होंने कहा, "यह धारणा है कि अमेरिका एकतरफ़ा कार्रवाई कर रहा है और खाड़ी देशों को ईरानी प्रतिशोध के ख़तरे में डाल रहा है.
हालांकि, इस नाराज़गी के बावजूद खाड़ी देशों की सरकारें मानती हैं कि वे अमेरिकी सुरक्षा साझेदारी को ख़त्म नहीं कर सकतीं. लेकिन अब इसकी 'राजनीतिक क़ीमत अधिक' होगी."
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कुछ एक्सपर्ट्स के अमेरिका के साथ साझेदारी में खाड़ी देशों की 'निराशा' की बात कहने के बावजूद, फ़िलहाल रूस या चीन के साथ नई साझेदारी बनाने के संबंध में उनकी ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.
एहाता पॉडकास्ट पर बोलते हुए एक्सपर्ट्स ने कहा कि अमेरिका की जगह पूरी तरह से चीन या रूस के साथ साझेदारी करना 'अव्यावहारिक' है.
हालांकि, खाड़ी देशों से उम्मीद की जा रही है है कि वे नई साझेदारियां तलाशेंगे ताकि अमेरिका के साथ उनके संबंध अब 'ख़ास या रणनीतिक' ना रह जाएं.
खाड़ी देश अमेरिका के साथ साझेदारी को बनाए रखते हुए क्षेत्रीय राजनयिक स्वायत्तता का विस्तार करने की कोशिश कर सकते हैं. साथ ही वो गैर-पश्चिमी देशों के साथ चुनिंदा सुरक्षा सहयोग करने के लिए बहुस्तरीय रणनीति अपना सकते हैं.
उदाहरण के लिए क़तर और ओमान ने अमेरिका-ईरान वार्ता में मध्यस्थता की भूमिका निभाई है. ये क्षेत्र में अपने राजनयिक प्रभाव को मजबूत करने की उनकी इच्छा को दर्शाता है.
क़तर के अल जज़ीरा मुबाशेर टीवी ने भी खाड़ी देशों की युद्ध के बाद की वास्तविकताओं पर चर्चा की. जिसमें एक एक्सपर्ट ने कहा कि खाड़ी देश "अमेरिका के साथ साझेदारी को पूरी तरह से छोड़ने के लिए तैयार नहीं दिखते."
लेकिन इसके बजाए इस अनुभव ने युद्ध के बाद की योजना और इस बात की अधिक गंभीरता से समझ विकसित करने की दिशा में एक क़दम आगे बढ़ाया है कि बाहरी साझेदारियां, चाहे अमेरिका के साथ हों या अन्य देशों के साथ, खाड़ी देशों की आत्मनिर्भरता का विकल्प नहीं बन सकतीं.
एक्सपर्ट्स ने कहा, "हालांकि खाड़ी देशों ने अमेरिकी ठिकानों पर अरबों डॉलर खर्च किए, जिनके बारे में उन्हें कभी भरोसा था कि वे उनके छोटे और असुरक्षित राज्यों की रक्षा करेंगे, लेकिन जंग ने यह साबित कर दिया कि जब सभी खाड़ी देशों की राजधानियों को बिना किसी अपवाद के निशाना बनाया गया, तो इन ठिकानों का कोई वास्तविक उपयोग नहीं था."
उन्होंने कहा, "इससे न केवल अमेरिकी संरक्षण का बल्कि छह जीसीसी राज्यों को ब्रिटेन, फ़्रांस और अन्य शक्तियों से जोड़ने वाले समझौतों के व्यापक नेटवर्क का भी व्यापक पुनर्मूल्यांकन हुआ है. ऐसी व्यवस्थाएं जो क्षेत्र पर हमले के समय फ़ायदेमंद साबित नहीं हुईं."
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कई प्रेस रिपोर्ट्स में इस बात पर चर्चा हुई कि खाड़ी देशों के लिए संयुक्त रक्षा को मजबूत करना वर्तमान में सर्वोच्च प्राथमिकता बन गया है.
लेखक अब्दुल्ला अहमद अली ने क्षेत्रीय ख़तरों का सामना करने के लिए खाड़ी शक्तियों के एकीकरण का आह्वान किया.
अमीराती अखबार अल-ख़लीज में प्रकाशित एक लेख में उन्होंने कहा, "वर्तमान संकट से यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक युद्ध का आकलन अब केवल सेनाओं या विमानों की संख्या से नहीं होता, बल्कि किसी राष्ट्र की बैलिस्टिक मिसाइलों, ड्रोन और साइबर हमलों जैसे जटिल ख़तरों का मुकाबला करने में सक्षम रक्षा प्रणालियों के निर्माण की क्षमता से होता है."
लेखक ने यह सवाल उठाया कि क्या खाड़ी देश "अस्थायी खाड़ी समन्वय से वास्तविक और स्थायी एकीकरण की ओर बढ़ पाएंगे."
इसी बात को दोहराते हुए लेखक जासिम अल-मलिकी ने खाड़ी देशों की सैन्य शक्तियों को एकजुट करने की अपील की.
क़तर के अल-शार्क अख़बार में प्रकाशित एक लेख में उन्होंने कहा कि संयुक्त खाड़ी सैन्य बल स्थापित करने का मतलब हर देश की राष्ट्रीय सेनाओं से एक एकीकृत सेना बनाना नहीं है, बल्कि एक एकीकृत रक्षा प्रणाली का निर्माण करना है.
उन्होंने कहा, "आधुनिक सुरक्षा चुनौतियां अब पहले जैसी पारंपरिक नहीं रहीं. इनमें अब बैलिस्टिक मिसाइलें, ड्रोन, साइबर हमले और समुद्री खतरे शामिल हैं. ये ऐसी चुनौतियां हैं जिनके लिए किसी एक राष्ट्र की क्षमताओं से कहीं अधिक सामूहिक प्रतिक्रिया की जरूरत है."
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जैसे-जैसे संघर्ष बढ़ता जा रहा है, खाड़ी देश खुद को एक ऐसे युद्ध में घसीटे जाने के डर और आत्मरक्षा के अपने अधिकार को सुरक्षित रखने की ज़रूरत के बीच फंसा हुआ पा रहे हैं, जिसे उन्होंने शुरू नहीं किया है.
खाड़ी देशों की प्रमुख प्राथमिकताओं में से एक 'ईरान के साथ सीधे युद्ध में घसीटे जाने से बचना' रहा है.
पिछले कुछ हफ़्तों से, कई एक्सपर्ट्स और गल्फ़ ऑफ़िशियल इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि खाड़ी देश "जंग का हिस्सा नहीं हैं."
हालांकि, जैसे ही ईरान ने ऊर्जा ठिकानों को भी अपने टार्गेट में शामिल किया, खाड़ी देशों ने आधिकारिक बयानों में दोहराया कि वे ईरानी हमलों का सैन्य कार्रवाई के ज़रिए जवाब देने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं.
19 मार्च को सऊदी अरब के विदेश मंत्री फ़ैसल बिन फरहान ने ईरान को चेतावनी दी कि उनके देश और अन्य खाड़ी देशों पर हमलों को बर्दाश्त करने की एक सीमा है.
उन्होंने चेतावनी दी कि सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों के पास 'अत्यंत महत्वपूर्ण क्षमताएं और सामर्थ्य' हैं जिनका इस्तेमाल वे 'इच्छा अनुसार' कर सकते हैं.
अल जज़ीरा ने ईरान के ख़िलाफ़ आक्रमण में खाड़ी देशों की संभावित भागीदारी के समर्थन में कई कारण बताए हैं. जिनमें अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत खाड़ी देशों का आत्मरक्षा का अधिकार, अमेरिका के साथ एक मजबूत सुरक्षा साझेदारी की संभावना और खाड़ी हितों के अनुरूप एक नई ईरानी सरकार के गठन में मदद करने की क्षमता शामिल है.
हालांकि चैनल ने कहा कि खाड़ी देशों के ईरान पर हमले के ख़िलाफ़ अन्य तर्क भी हैं.
इनमें यह चिंता शामिल है कि आक्रमण में शामिल होने से, ख़ासकर इसराइल के साथ खड़ा होना, खाड़ी देशों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाएगा. इससे यह दावा मजबूत होगा कि वे 'इसराइल के हितों के साथ खड़े हैं.'
साथ ही, यह भी साफ़ है कि जंग में शामिल होने से क्षेत्र की आर्थिक प्राथमिकताओं को कोई फ़ायदा नहीं होगा.
चैनल ने खाड़ी अधिकारियों के इस डर को भी उजागर किया कि खाड़ी देशों के आक्रमण में शामिल होने पर अमेरिका-इसराइल, ईरान के साथ संघर्ष से पीछे हट सकते हैं. जिससे दोनों पक्ष एक-दूसरे को कमज़ोर करते रहेंगे और फिर 'खाड़ी देशों की रक्षा' के लिए 'सेवियर्स' बनकर युद्ध समाप्त करने का आह्वान करेंगे, और बदले में बड़ी रियायतें मांगेंगे.
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