उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है. खबर है कि आज (28 मार्च) कई नेता कांग्रेस का दामन थामने वाले हैं, जिनमें सबसे ज्यादा चर्चा बीजेपी के पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल को लेकर हो रही है. हालांकि, इन नेताओं के कांग्रेस में शामिल होने को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या इससे वास्तव में कांग्रेस को कोई ठोस फायदा मिलेगा या नहीं, या फिर ये नेता खुद अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश में हैं.
राजकुमार ठुकराल का नाम इसलिए सुर्खियों में है क्योंकि वह कभी बीजेपी के मजबूत नेताओं में गिने जाते थे. लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने पार्टी से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया था. इसके बाद बीजेपी ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. यही नहीं, बीजेपी ने पहले ही संकेत दे दिए थे कि ठुकराल अब पार्टी की प्राथमिकताओं में नहीं हैं. 2022 के चुनाव में भी बीजेपी ने रुद्रपुर सीट से ठुकराल का टिकट काटकर शिव अरोड़ा को उम्मीदवार बनाया था, जिससे साफ हो गया था कि पार्टी ने उनसे दूरी बना ली है.
इसी तरह नारायण पाल का राजनीतिक सफर भी कई दलों के बीच घूमता रहा है. वह पहले कांग्रेस में रहे, फिर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में गए और अब एक बार फिर कांग्रेस में वापसी करने जा रहे हैं. वहीं, यशपाल राणा का नाम भी इस सूची में शामिल है, जिन्होंने हाल ही में हुए निकाय चुनाव में कांग्रेस से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ा था. अब उनका भी कांग्रेस में लौटना चर्चा का विषय बना हुआ है.
इनके अलावा भी कई ऐसे नेता हैं जो अलग-अलग दलों में सक्रिय रहे हैं और अब कांग्रेस में शामिल होने की तैयारी में हैं. लेकिन एक अहम तथ्य यह भी सामने आ रहा है कि इन नेताओं में से अधिकांश अपना मजबूत जनाधार पहले ही खो चुके हैं. राजनीतिक जमीन कमजोर होने के चलते अब ये नेता अपनी साख बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और ऐसे में पार्टी बदलना उनके लिए एक विकल्प बन गया है.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी को इन नेताओं के जाने से कोई खास नुकसान नहीं होने वाला है. कारण यह है कि इन नेताओं का प्रभाव पहले ही सीमित हो चुका है या वे पहले से ही पार्टी से बाहर थे. ऐसे में उनका कांग्रेस में जाना बीजेपी के लिए कोई बड़ा झटका नहीं माना जा रहा. वहीं, कांग्रेस के लिए भी यह स्थिति बहुत स्पष्ट नहीं है. केवल नेताओं के शामिल होने से चुनावी मजबूती नहीं मिलती, जब तक कि उनके पास मजबूत जनाधार न हो. ऐसे में यह कहना कि इन नेताओं के आने से कांग्रेस को बड़ा फायदा होगा, फिलहाल ठोस आधार पर नहीं टिका है.
कुल मिलाकर, उत्तराखंड की सियासत में यह घटनाक्रम जरूर चर्चा में है, लेकिन इसका वास्तविक राजनीतिक असर आने वाले समय में ही साफ हो पाएगा. फिलहाल इसे ज्यादा एक ऐसी सियासी कवायद के तौर पर देखा जा रहा है, जहां नेता अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने की जद्दोजहद में नजर आ रहे हैं.
Source: IOCL
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