Explained: ईरान युद्ध से आम आदमी की थाली महंगी! चूल्हा, गैस और तेल.. कितनी मार झेलना बाकी? – ABP News

31 मार्च 2026 को जब देशभर में लोग रबी फसल की कटाई में जुटे हैं, तब मध्य पूर्व में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध ने किसानों और आम घरों के लिए एक नया सवाल खड़ा कर दिया है- क्या खाने-पीने की चीजें फिर महंगी हो जाएंगी? इसके जवाब ने किसानों और आम जनता को परेशानी में डाल दिया है. अभी तक सिर्फ चूल्हा जलाने और गाड़ी चलाने की फिक्र थी, लेकिन क्या अब महंगाई की मार भी पड़ने वाली है? आइए जानते हैं एक्सप्लेनर में…
सवाल 1: क्या ईरान में छिड़ी जंग भारत में महंगाई बढ़ाएगी?
जवाब: 1 मार्च 2026 को जब युद्ध तेज हुआ, तब फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) और राज्य एजेंसियों के पास 23.6 मिलियन टन गेहूं का स्टॉक था. यह पिछले सालों से 10.2 मिलियन टन ज्यादा था. पिसे हुए चावल का स्टॉक तो और भी मजबूत है- करीब 36.5 मिलियन टन. चीनी की कीमतें भी पिछले साल जैसी ही बनी हुई हैं यानी एक्स-फैक्ट्री पर औसतन 38.5 रुपये और रिटेल पर 45 रुपये प्रति किलोग्राम.
2025 के मानसून में अच्छी बारिश और अनुकूल मौसम ने रबी फसल को फायदा पहुंचाया है. गेहूं, सरसों, मक्का, चना और आलू जैसी फसलों की पैदावार उम्मीद से बेहतर है. सरकार ने 2026-27 रबी सीजन के लिए गेहूं की खरीद का लक्ष्य 30.3 मिलियन टन रखा है, जो दिखाता है कि स्टोरेज की कोई कमी नहीं होने वाली है. यानी भारत अभी तैयार है.
 
सवाल 2: रबी फसल में किसानों को कितनी राहत मिल रही है?    
जवाब: मध्य भारत में गेहूं की कटाई शुरू हो चुकी है और उत्तर भारत में अप्रैल के मध्य तक तेज हो जाएगी. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के वैज्ञानिकों का कहना है कि ठंडी हवाओं और बारिश ने गेहूं के दाने को अच्छी तरह भरने का समय दिया, जिससे पैदावार बढ़ी है.
आगरा के पास आलू उगाने वाले किसान दूंगर सिंह जैसे लोग बताते हैं कि इस बार बुवाई ज्यादा हुई और पैदावार 8-10% तक बढ़ सकती है. बिहार में मक्का की पैदावार भी 4-4.5 टन प्रति एकड़ या उससे ज्यादा रहने की उम्मीद है. कुल मिलाकर रबी फसल का उत्पादन पिछले साल से बेहतर रहने वाला है, जो बाजार में सप्लाई बनाए रखेगा और कीमतों को काबू में रखेगा.
सवाल 3: तो फिर युद्ध का सबसे बड़ा खतरा कहां से आ रहा है?
जवाब: उर्वरक और कीटनाशकों की सप्लाई चेन से. भारत हर साल करीब 40 मिलियन टन यूरिया, 10 मिलियन टन DAP और अन्य खादों का इस्तेमाल करता है. गल्फ देश (GCC) हमारे सबसे बड़े सप्लायर हैं. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज रूट प्रभावित होने से अमोनिया, सल्फर और नेचुरल गैस जैसी जरूरी चीजों की सप्लाई बाधित हुई.
नतीजतन, अमोनिया की कीमत 450-470 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 725-750 डॉलर हो गई. सल्फर 200 डॉलर से 700 डॉलर के पार पहुंच गया. आयातित DAP भी 640-650 से 825 डॉलर तक पहुंच गया. रुपए के कमजोर होने से भारतीय किसानों पर बोझ और बढ़ गया.
19 मार्च 2026 तक यूरिया का स्टॉक 6.1 मिलियन टन था, जो खरीफ के शुरुआती हिस्से के लिए काफी है, लेकिन लंबे युद्ध में समस्या गहरा सकती है.
 
सवाल 4: कीटनाशकों पर क्या असर पड़ा है?
जवाब: कीटनाशक बनाने में नेफ्था, सल्फर और मेथेनॉल जैसे कच्चे माल लगते हैं, जिनका बड़ा स्रोत मिडिल ईस्ट है. युद्ध से इनकी कीमतें बढ़ी हैं. पैकेजिंग मटेरियल (HDPE, PET आदि) की लागत भी 30-40% तक ऊपर चली गई. इससे ग्लाइफोसेट जैसे आम कीटनाशकों की कीमत बढ़ रही है, जो खरीफ फसलों (धान, मक्का, सोयाबीन) के लिए जरूरी हैं.
सवाल 5: क्या भारत के आम आदमी और छोटे किसानों की थाली पर बोझ बढ़ेगा?
जवाब: अभी थाली पर सीधा असर नहीं होगा, लेकिन अगर युद्ध लंबा चला तो खरीफ सीजन (जून से) में खाद महंगी पड़ने से किसानों की लागत बढ़ेगी. देश में ज्यादातर छोटे किसान हैं, जो सबसे ज्यादा परेशान हो सकते हैं.
पंजाब के एक चावल किसान बालदेव सिंह जैसे लोग कह रहे हैं कि अगर सरकार ने सब्सिडी नहीं बढ़ाई तो छोटे किसान मुश्किल में पड़ सकते हैं. बढ़ी लागत आखिरकार सब्जी, अनाज और दालों की कीमतों में दिख सकती है. साथ ही तेल की कीमतें बढ़ने से ट्रांसपोर्ट और बिजली महंगी हो सकती है, जो अप्रत्यक्ष रूप से खाने की चीजों को प्रभावित करेगी.
सवाल 6: केंद्र सरकार इस आफत से निपटने के लिए क्या विकल्प और आगे क्या होगा?
जवाब: सरकार ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने, वैकल्पिक स्रोतों (रूस, चीन, इंडोनेशिया, बेलारूस) से खाद आयात करने और सब्सिडी व्यवस्था को समायोजित करने की तैयारी शुरू कर दी है. उर्वरक मंत्रालय और कृषि मंत्रालय स्थिति पर नजर रखे हुए हैं. MEA ने कहा है कि खरीफ 2026 के लिए पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है, लेकिन सतर्क रहने की जरूरत है.
अगर युद्ध कुछ हफ्तों में थमा तो बड़ा असर नहीं पड़ेगा. लेकिन अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में परेशानी बनी रही तो ग्लोबल उर्वरक कीमतें 15-40% तक बढ़ सकती हैं. भारत जैसे देशों में खरीफ बुवाई प्रभावित हो सकती है, जिससे अगले साल की फसल पर असर पड़ेगा और खाद्य महंगाई बढ़ सकती है.
ईरान युद्ध ने उर्वरक और ऊर्जा की कीमतें बढ़ा दी हैं, लेकिन भारत की मजबूत रबी फसल और अनाज के स्टॉक ने अभी खाद्य महंगाई को काबू में रखा है. असली परीक्षा खरीफ सीजन में होगी. अगर सरकार समय रहते कदम उठाए तो नुकसान सीमित रखा जा सकता है.
ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर (एबीपी लाइव- हिंदी) अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इससे पहले दो अलग-अलग संस्थानों में भी उन्होंने अपनी सेवाएं दी. जहां वे 5 साल से ज्यादा वक्त तक एजुकेशन डेस्क और ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में बतौर सीनियर सब एडिटर काम किया. वे बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को भी लीड कर चुके हैं. ज़ाहिद देश-विदेश, राजनीति, भेदभाव, एंटरटेनमेंट, बिजनेस, एजुकेशन और चुनाव जैसे सभी मुद्दों को हल करने में रूचि रखते हैं.
Source: IOCL
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