UCC and Muslim Protest: देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनावों के बीच यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) फिर बड़ा मुद्दा बन गया है. हालिया दिनों असम में हिमंता बिस्वा सरमा और राजस्थान में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने यूसीसी लागू करने की मांग की. ऐसे यह जानना जरुरी है कि देश के किन राज्यों में UCC लागू है और मुस्लिम समुदाय इसको लेकर क्यों विरोध करता रहा है.
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Uniform Civil Code: देश के चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में 9 अप्रैल से 29 अप्रैल तक विधानसभा चुनाव है. इन चुनाव में कई मतदाताओं को रिझाने के लिए सियासी दल एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं. चुनावी राज्य असम में बीजेपी के दोबारा सत्ता में लौटने पर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने महज तीन महीने के भीतर यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू करने का ऐलान किया है. इसके अलावा चुनावी मंचों से बीजेपी नेता लगातार UCC लागू करने का जोर-शोर से मुद्दा उठा रहे हैं. बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने भी भजन लाल शर्मा सरकार से राजस्थान में UCC लागू करने की मांग की है. इसके बाद सड़क से लेकर सियासी गलियारों तक में एक बार फिर से UCC का मुद्दा गरमा गया है.
हालांकि. कई सियासी दलों ने यूनिफॉर्म सिविल कोड को एक समुदाय विशेष को टार्गेट करने का आरोप लगाते हुए वोटों के धुव्रीकरण की चाल करार दी है. इस कानून को लेकर अक्सर अल्पसंख्यक समुदाय, विशेष तौर पर मुस्लिम समुदाय के लोग आपत्ति जताते रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अभी तक किसी राज्य में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू नहीं था? या इसमें ऐसा क्या है जिससे अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन होता है?
गोवा में लागू है देश का सबसे पुराना UCC
दरअसल, सबसे पहले बात गोवा की करते हैं, जहां UCC देश की आजादी के पहले से लागू है और यह इस कानून का सबसे पुराना रूप है. यहां 1867 के पुर्तुगीज सिविल कोड को 1 जुलाई 1870 से लागू किया गया था. 1961 में भारत में विलय के बाद भी इसे गोवा, दमन एंड दीव (एडमिनिस्ट्रेशन) एक्ट 1962 के तहत जारी रखा गया. यह कोड सभी धर्मों पर लागू होता है, लेकिन पूरी तरह एक जैसा नहीं है. उदाहरण के लिए- कुछ शर्तों के तहत हिंदू पुरुषों को बहुविवा की इजाजत है. रोमन कैथोलिक समुदाय को चर्च विवाह में कुछ छूट मिलती है, जबकि मुस्लिमों पर शरियत लागू नहीं होती है.
उत्तराखंड और गुजरात में लागू है सबसे सख्त UCC कानून
दूसरा राज्य है उत्तराखंड, जहां आधुनिक UCC लागू हुआ. 7 फरवरी 2024 को विधेयक पास हुआ था. 11 मार्च 2024 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली और 27 जनवरी 2025 से यह लागू हो गया. इसमें कई सामाजिक रीतियों को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया. लेकिन आदिवासी समुदाय को इसमें छूट दी गई है. UCC लागू होने के बाद विवाह का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया गया है. बहुविवाह पूरी तरह प्रतिबंधित है, और पुत्र-पुत्री को संपत्ति में समान अधिकार दिए गए हैं. खास बात यह है कि लिव-इन रिलेशनशिप को भी कानून के दायरे में लाया गया है. हालांकि, अनुसूचित जनजातियों (ST) को इससे छूट दी गई है.
तीसरा राज्य गुजरात है, जहां मार्च 2026 में UCC बिल विधानसभा से पास हो चुका है, लेकिन अभी लागू नहीं हुआ है. इसके लिए गवर्नर की मंजूरी और गजट नोटिफिकेशन का इंतजार है. इस प्रस्तावित कानून में भी विवाह का रजिस्ट्रेशन, बहुविवाह पर रोक, तलाक के समान नियम, संपत्ति में बराबरी और लिव-इन रिलेशनशिप के लिए रजिस्ट्रेशन जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं.
यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने का क्या है मकसद?
UCC का असली मकसद सभी नागरिकों को समान अधिकार देना है. इसके तहत विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना, लिव-इन रिलेशनशिप, मेंटेनेंस और बच्चों की कस्टडी जैसे मामलों में धर्म के आधार पर अलग-अलग कानूनों को खत्म कर एक समान नियम लागू किए जाते हैं. इसका फोकस खास तौर पर महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार देना और लिंग समानता सुनिश्चित करना है.
अगर तीनों राज्यों की तुलना करें, तो गोवा का कानून पुराना होने की वजह से कुछ परंपरागत छूट देता है, जबकि उत्तराखंड और गुजरात के नए कानून ज्यादा सख्त हैं और पूरी तरह एक विवाह व समानता पर जोर देते हैं. हालांकि, उत्तराखंड और गुजरात में लागू यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर कुछ विवाद भी है. इस कानून में मुसलमानों के कथित धार्मिक अधिकारों की अनदेखी का आरोप लाग्या गया है. उत्तराखंड में यूसीसी लागू होने पर कई संस्थानों ने कोर्ट का रुख किया है.
मुस्लिम समुदाय क्यों कर रहा है UCC का विरोध?
यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुस्लिम संगठनों कई वजहों से विरोध करते रहे हैं. उनका कहना है कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकारों और देश की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के खिलाफ है. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समेत कई संगठनों का तर्क है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ यानी शरीयत सीधे कुरान और हदीस से निकला है. इसमें विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों के नियम तय हैं. उनका कहना है कि ये सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि धार्मिक कर्तव्य हैं, जिनमें बदलाव स्वीकार नहीं किया जा सकता.
संगठनों का सबसे बड़ा तर्क संविधान के अनुच्छेद 25 पर आधारित है, जो हर नागरिक को अपने धर्म को मानने, पालन करने और प्रचार करने की आजादी देता है. उनका कहना है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने पर बहुविवाह, विरासत के नियम और निकाह की प्रकृति जैसे मुद्दों में बदलाव होगा, जिससे मुसलमानों को अपनी धार्मिक परंपराओं के खिलाफ चलना पड़ेगा.
इसके साथ ही अनुच्छेद 26 का हवाला देते हुए मुस्लिम समुदाय और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि सभी धर्म के लोगों को अपने धार्मिक मामलों को चलाने का अधिकार है. इसके तहत शरीयत इस्लाम का अहम हिस्सा है और इसे किसी सामान्य कानून से बदला नहीं जा सकता. विरोध करने वाले अनुच्छेद 29 का भी जिक्र करते हैं, जो अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति और परंपराओं की रक्षा का अधिकार देता है. उनका कहना है कि भारत एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश है. जहां अलग-अलग समुदायों के अपने पर्सनल लॉ हैं, इसलिए एक ही कानून सब पर लागू करना “एक जैसा नियम सब पर” थोपने जैसा होगा.
संगठनों का यह भी कहना है कि संविधान का अनुच्छेद 44 सिर्फ सरकार को कोशिश करने की बात कहता है, यह बाध्यकारी नहीं है. जबकि मौलिक अधिकार ज्यादा महत्वपूर्ण हैं और उन्हें किसी भी हालत में कमजोर नहीं किया जा सकता. मुस्लिम संगठनों का तर्क है कि समान नागरिक संहिता लाना देश की विविधता और धर्मनिरपेक्ष ढांचे के खिलाफ है. उनका कहना है कि अगर सुधार की जरूरत है तो वह समुदाय के अंदर भी मुमकिन है, लेकिन पूरे पर्सनल लॉ को खत्म करना सही नहीं होगा.
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रैहान शाहिद का ताल्लुक उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर ज़िले से हैं. वह पिछले पांच सालों से दिल्ली में सक्रिय रूप से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत हैं. Zee न्यूज़ से पहले उन्होंने ABP न्यूज़ और दू…और पढ़ें
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