सरकारी कामकाज में हिंदी जरूरी, बरती लापरावाही तो हो सकती है कार्यवाई – ETV Bharat

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By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : April 1, 2026 at 8:26 PM IST
Updated : April 1, 2026 at 9:07 PM IST
मेरठ: आमतौर पर जब भी कोई व्यक्ति या शिकायतकर्ता किसी अधिकारी की चौखट पर अपनी समस्या या पीढा लेकर पहुंचता है, तो अधिकारी को बेहद ही सजग होकर निर्णय लेना होता है. जरा सी चूक पर, नौकरी और प्रमोशन पर संकट के बादल मंडरा सकते हैं. विशेष रूप से शायद यह जानकारी हर किसी को हो, लेकिन ये बिल्कुल सत्य है, कोई भी प्रशासनिक सेवाओं में कार्यरत अधिकारी चाहे वह छोटा हो या बड़ा, अगर उसने कोई निर्देश या आदेश हिन्दी में नहीं दिया तो उस पर एक्शन हो सकती है. आईए जानते हैं क्या है पूरा माजरा और नियम कायदे कानून.

उत्तरप्रदेश में अधिकारियों को जब नियुक्त किया जाता है, तो उनसे शासन ये अपेक्षा करती है कि पद की शपथ के बाद, आप हिंदी को प्राथमिकता देंगे. विशेष रूप से किसी भी आवेदन, या दस्तावेज पर काम के दौरान हिन्दी का प्रयोग करना होगा. ऐसा न करने पर अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है.

रिटायर्ड डिप्टी एसपी जगदीश सिंह ने बताया कि 35 साल तक पुलिस महकमें में रहे हैं, वह विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सेवा दे चुके हैं. मेरठ में पुलिस अधिकारी और पूर्व सीओ सिटी के तौर पर भी वह तैनात रहे हैं, उन्होंने प्रदेश सरकार में बतौर अधिकारी रहते हुए अंग्रेजी में (Endorsement) अनुमोदन करने पर, प्रदेश सरकार के द्वारा उन पर कार्रवाई की गई थी. उन्हें राज्य सरकार की हिन्दी भाषा प्रोत्साहन नीति का उलंघन करने का दोषी मानकर ये कार्रवाई तब हुई थी.
उन्होंने कहा कि अगर कोई अधिकारी हिंदी भाषा प्रोत्साहन नीति का उल्लंघन करता है तो ऐसे अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ शासन कार्रवाई कर सकता है. इसीलिए प्रदेश में हमें हिन्दी में ही काम करना चाहिए और इसे प्रोत्साहन देना चाहिए.

वह कहते हैं कि जरूरी है कि अधिकारी को अपने सेवा काल के समय, कार्य करते हुए हिन्दी का उपयोग करना चाहिए. रिटायर्ड डिप्टी एसपी जगदीश सिंह के आनुसार, भाषा का भी एक एहम रोल है. वह चीन में गए थे तो वहां अंग्रेजी अनिवार्य नहीं है, बल्कि विकल्प optional की तरह है, वे अपनी भाषा को ही चीन में प्राथमिकता देते हैं.

ऐसे में बेशक हमें भी हिन्दी को प्रोत्साहन देना चाहिए. वह कहते हैं कि कोई भी लोकसेवक हों या मंत्री, उन्हें भी जरूरत पड़ने पर अपने कार्य को हिन्दी में ही करना चाहिए.

ईटीवी भारत ने कई ऐसे अधिकारियों से भी बात की जिन्होंने इस विषय पर गहनता से एक एक तथ्य की जानकारी दी. यूपी सरकार अधिकारी शशि भूषण उपाध्याय बताते हैं कि उत्तर प्रदेश राजभाषा अधिनियम 1951 जो कि 1989 में संशोधित हुआ, उसके अंतर्गत देवनागरी लिपि में हिंदी को राज्य की आधिकारिक राजभाषा का दर्जा प्राप्त है.

शशि भूषण उपाध्याय बताते हैं कि यही कारण है कि हिंदी राजभाषा के रूप में राज्य के सभी कार्यालयों में, प्रशासनिक अधिसूचनाओं , नियमों में कार्यालयी आदेशों के रूप में यह अधिनियम हिंदी को कानूनी मान्यता देता है. अधीनियम के अंतर्गत यदि कोई भी आदेश कोई भी अधिसूचना, कोई भी नियम या कोई भी कार्यालय का आदेश अगर केवल अंग्रेजी में जारी होता है, तो वह अमान्य होगा. हालांकी हिन्दी के साथ साथ किसी भी भाषा मे कोई भी आदेश, जारी की जा सकती है, परन्तु केवल अंग्रेजी में या अन्य किसी भाषा में जारी होती है तो वह अमान्य है.

यूपी सरकार में बतौर अधिकारी सेवा दे रहे शशिभूषण उपाध्याय बताते हैं कि उनका अपना जो अनुभव रहा है उसमें हिन्दी सर्वमान्य भाषा होने के साथ साथ जनभाषा के तौर पर भी और मातृभाषा के तौर पर भी स्वीकार्य है. हिन्दी सिर्फ हमारी भाषा ही नहीं बल्कि हमारी आत्मा की भी उदगार है. जब हम कोई बात हिन्दी में कहते हैं तो कहने में भी हमें उतनी ही गर्व की अनुभूति होती है, जितना सुनने समझने वालों के लिए आसान होता है.

वरिष्ठ अधिवक्ता गजेंद्र धामा बताते हैं कि उत्तर प्रदेश राज्य भाषा अधिनियम 1951 में कहा गया है कि हिन्दी भाषा में ही संवाद और कामकाज करना है, उसके बाद फिर 1979 में एक्ट में एक संसोधन कर निर्णय लिया गया कि यूपी में जितने भी राज्य के अधिकारी हैं और कर्मचारी हैं, वे सभी कार्य में हिन्दी भाषा का ही प्रयोग करेंगे. हर प्रार्थना पत्र का निस्तारण भी वह हिन्दी भाषा में ही करें.

वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद जफर अली कहते हैं कि भारतीय संविधान के article 343 से लेकर आर्टिकल 351 तक, उसमें लैंग्वेज के बारे में कहा गया कि कौन सी भाषा कहां इस्तेमाल होगी, क्योंकि देश में कई अलग अलग राज्य हैं, जहां अलग अलग भाषा भी बोली जाती है.
आर्टिकल 348(1) के अनुसार लिखा है कि यहां अंग्रेजी चलेगी और बाकी जो लैंग्वेज होंगी वो इस्तेमाल होंगी. बाद में आर्टिकल 348(2) में ये हुआ कि हिन्दी होगी. जिसके बाद, यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान आदि राज्य के लिए हिन्दी रहेगी, बाकी राज्यों को उनकी लोकल लैंग्वेज के लिए स्वतंत्र कर दिया गया.
इसके बाद 1969 में फिर ये बदलाव हुआ, जिसमे कहा गया, जहां सुप्रीम कोर्ट से संबंधित मामला होगा वहां अंग्रेजी इस्तेमाल होगा. हाईकोर्ट में भी अंग्रेजी का इस्तेमाल होगा, लेकिन हाईकोर्ट की जो सबोर्डिनेट कोर्ट हैं उनके लिए अलग नियम बनाए गए, जिसमें लोअर कोर्ट, जिला न्यायालय के लिए कहा गया कि इनकी भाषा सिर्फ हिन्दी होगी और कोई भाषा नहीं होगी.

वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद जफर अली कहते हैं कि पूर्व में मुख्यमंत्री मुलायम सिंह की सरकार में 1951 एक्ट उत्तरप्रदेश राजभाषा अधिनियम में संसोधन करते हुए, उर्दू को भी शामिल किया गया और कहा गया कि हिन्दी रहेगी, लेकिन उर्दू भी अतिरिक्त भाषा के तौर पर इस्तेमाल हो सकेगी, लेकिन यहां भी व्यवहारिक तौर पर हिन्दी का इस्तेमाल करना होगा.

उत्तर प्रदेश राजभाषा नीति (हिंदी) का उल्लंघन करने पर ऐसे सरकारी अधिकारियों या कर्मचारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के साथ साथ, विभागीय जांच से लेकर चेतावनी भी जारी की सकती है. वहीं सेवा पुस्तिका यानी (Service Book) में प्रविष्टि की जा सकती है. जिस वजह से प्रमोशन तक रुक सकता है. वहीं बार बार ऐसा करने पर अधिकारीप पर शासन एक्शन भी ले सकता है.
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