'जब कपल खुश, तो केस चलाना वक्त की बर्बादी', POCSO और रेप केस में बड़ी राहत – AajTak

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर पीड़िता और आरोपी आपसी सहमति से विवाह कर सुखद वैवाहिक जीवन जी रहे हैं, तो ऐसे मामलों में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायसंगत नहीं है. जस्टिस विवेक कुमार सिंह की बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए आरोपी के खिलाफ दर्ज POCSO और दुष्कर्म मामले की चार्जशीट और पूरी कार्यवाही रद्द कर दी. 
कोर्ट ने पाया कि पीड़िता ने अपने बयान में किसी तरह के अपराध से इनकार किया और आरोपी के साथ स्वेच्छा से रहने की बात कही. 
कोर्ट ने यह भी माना कि मुकदमा जारी रखने से उनके वैवाहिक जीवन और बच्चे के भविष्य पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.
हाई कोर्ट ने क्या है?
हाई कोर्ट का यह आदेश जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकल बेंच ने आकाश नाम के शख्स की याचिका पर दिया है. कोर्ट ने याची के खिलाफ दर्ज चार्जशीट और पूरी आपराधिक केस कार्यवाही को रद्द करने का आदेश दिया है.
साल 2018 में पीड़िता लड़की के पिता ने थाना रजपुरा, जनपद संभल में आरोपी आकाश के खिलाफ नाबालिग का अपहरण व दुष्कर्म के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कराई थी. आरोप लगाया गया था कि उनकी 13 वर्षीय नाबालिग बेटी को आरोपी बहला-फुसलाकर ले गया है. पुलिस ने विवेचना के बाद चार्जशीट दाखिल की थी.
मामले में नया मोड़ तब आया, जब पीड़िता ने पुलिस और मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए अपने बयानों में किसी भी तरह के अपराध या अपने साथ जबरदस्ती से इंकार कर दिया. पीड़िता ने साफ तौर से कहा कि वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई थी और दोनों ने गाजियाबाद में कोर्ट मैरिज कर ली है. पीड़िता ने खुद को बालिग बताया और आरोपी के साथ पत्नी के रूप में रहने की इच्छा जताई. 
मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक भी पीड़िता की उम्र करीब 18 साल पाई गई और उसके शरीर पर किसी चोट के निशान नहीं मिले. दोनों का विवाह 3 जुलाई 2018 को रजिस्टर्ड हुआ था और दिसंबर 2018 में उनकी एक बेटी का जन्म भी हुआ, जो मौजूदा वक्त में करीब 7 वर्ष की है.
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हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अगर पीड़िता ने आरोपी के साथ स्वेच्छा से जीवन बिताने का फैसला लिया है और वह अभियोजन का समर्थन नहीं कर रही है, तो मुकदमे को जारी रखना सिर्फ वक्त की बर्बादी होगी.
कोर्ट ने पाया कि पीड़िता ने निचली अदालत में गवाही के दौरान भी आरोपी पर कोई आरोप नहीं लगाया. इसके अलावा, पीड़िता के पिता ने भी एक समझौता पत्र दाखिल कर कोर्ट को बताया कि अब उन्हें इस मामले में आगे कोई कार्यवाही नहीं करनी है. कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर इस लेवल पर आरोपी को दंडित किया जाता है, तो इसका पीड़िता के वैवाहिक जीवन और उनके बच्चे के भविष्य पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा. 
हाई कोर्ट ने माना कि इस मामले में अपहरण, दुष्कर्म या पॉक्सो के बुनियादी तत्व मौजूद नहीं हैं क्योंकि पीड़िता एक सहमति देने वाली पक्षकार थी. कोर्ट ने न्याय हित में और कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए संभल की अदालत में लंबित स्पेशल सेशन ट्रायल और संबंधित चार्जशीट को पूरी तरह से रद्द कर दिया.
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