सैलरी-इंक्रीमेंट को लेकर NCR में बवाल, न्यू लेबर कोड में क्या-क्या? अब जुबानी नहीं, हाथ में देना होगा ऑफर लेटर… – AajTak

दिल्ली के सटे नोएडा और फरीदाबाद में तमाम छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां हैं, जहां लाखों कर्मचारी काम करते हैं. लेकिन पिछले तीन दिनों कर्मचारियों अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, सोमवार को प्रदर्शन ने थोड़ा उग्र रूप ले लिया है, कर्मचारियों की शिकायत है कि उन्हें उचित सैलरी नहीं मिल रही है. 
दरअसल, ये आंदोलन एक तरह से कंपनी मालिकों और श्रम विभाग की अनदेखी के खिलाफ बढ़ते रोष के कारण शुरू हुआ है. जब श्रम कानून में श्रमिकों को लेकर एक-एक बातें लिखी हैं, लेकिन प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें सैलरी के नाम पर महीने में सिर्फ 10-12 रुपये मिलते हैं, जबकि कंपनी सरकारी जांच के दौरान उस सैलरी को 25 हजार रुपये तक दिखाती है. 
दरअसल,श्रमिकों को लेकर देश का कानून क्या कहता है, यानी लेबर कोड़. बता दें, देश में नया लेबर कोड लागू हो चुका है. जिसमें कंपनियों को सख्त निर्देश है कि कर्मचारियों के हितों की रक्षा सबसे ऊपर है. फिर नोएडा और फरीदाबाद में कर्मचारियों को सड़क पर उतरने की क्यों जरूरत पड़ी है.   
आइए नए लेबर कोड (New Labour Codes) को बिल्कुल सरल भाषा में समझते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जो छोटी फैक्ट्रियों या असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं, जहां अक्सर नियमों की अनदेखी होती है. उनके लिए इस नए कानून में सबकुछ है.
1. अब जुबानी वादा नहीं चलेगा
अक्सर छोटी कंपनियों में मालिक कह देते हैं कि कल से काम पर आ जाना, लेकिन कोई लिखित सबूत नहीं होता है. न्यू लेबर कोड के तहत हर कर्मचारी को अपॉइंटमेंट लेटर देना कानूनी रूप से जरूरी है. क्योंकि अगर भविष्य में सैलरी को लेकर या काम से निकालने को लेकर विवाद होता है, तो कर्मचारी के पास यह पक्का सबूत होगा कि वह उस कंपनी का हिस्सा है. ‘समान काम, समान वेतन’ को सख्ती से लागू किया जाएगा, ताकि जेंडर के आधार पर सैलरी में भेदभाव न हो सके. 
2. समय पर मिलेगी सैलरी 
कई बार मजदूर शिकायत करते हैं कि काम तो पूरा कर लिया, लेकिन पैसा रुक-रुक कर मिल रहा है. नए कोड के तहत सैलरी देने की एक तय समय सीमा होगी. उदाहरण के लिए कंपनियों को महीने के अंत के बाद एक निश्चित समय सीमा (आमतौर पर 7 दिन के भीतर) के अंदर वेतन का भुगतान करना होगा. चाहे कर्मचारी फुल-टाइम हो, कॉन्ट्रैक्ट पर हो या दिहाड़ी मजदूर, सभी को समय पर भुगतान का अधिकार दिया गया है. 
3. काम के घंटों का हिसाब 
छोटे कारखानों में अक्सर 10-12 घंटे काम कराया जाता है और पैसे सिर्फ शिफ्ट के मिलते हैं. लेकिन न्यू लेबर कोड में काम के घंटे अब पूरी तरह फिक्स हैं. अगर कोई अपनी शिफ्ट से ज्यादा रुककर काम करता है, तो उसे मिलने वाला ओवरटाइम सामान्य सैलरी से दोगुना (Double) होगा. यानी अगर 1 घंटे की सैलरी 100 रुपये है, तो एक्स्ट्रा घंटे के 200 रुपये मिलेंगे. 
न्यू लेबर कोड में अधिकतम काम के घंटे (राज्यों के नियमों के अनुसार आमतौर पर 8 से 12 घंटे के बीच) निर्धारित किए गए हैं. वीकली ऑफ का प्रावधान भी अनिवार्य रूप से लागू होगा.
4. छोटी फैक्ट्रियों में काम करने वालों को बड़ी राहत (सुरक्षा का दायरा)
अभी तक कई सरकारी सुविधाएं केवल बड़ी कंपनियों के कर्मचारियों को मिलती थीं. अब छोटे कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों को भी ESIC (मुफ्त इलाज) और PF (भविष्य निधि) जैसी सामाजिक सुरक्षा देने की तैयारी है. बीमारी की स्थिति में या रिटायरमेंट के समय छोटे वर्कर के पास भी आर्थिक सहारा होगा. 
5. महिलाओं के लिए सुरक्षित और बराबरी का माहौल
न्यू लेबर कोड में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए इसे और व्यावहारिक बनाया गया है. महिलाएं अपनी मर्जी से नाइट शिफ्ट में काम कर सकेंगी, लेकिन कंपनी की जिम्मेदारी होगी कि वह उन्हें घर तक सुरक्षित छोड़ने और दफ्तर में  सुरक्षा का पूरा इंतजाम करे. इसके अलावा समान वेतन का प्रावधान है. 
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