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भारत की मशहूर सिंगर आशा भोसले अपनी अंतिम यात्रा पर हैं. उनके आखिरी दर्शन के लिए सड़कों पर जनसैलाब उमड़ा है. थोड़ी देर में देश की महान सिंगर का अंतिम संस्कार किया जाएगा. उनका अंतिम संस्कार शिवाजी पार्क श्मशान घाट में होगा, जिसकी सारी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. इस बीच देशभर में फैंस और सिलेब्रिटीज मायूस हैं और नम आंखों के साथ आशा ताई को विदाई दे रहे हैं. आशा भोसले का अंतिम संस्कार मराठी ब्राह्मण परिवार की परंपराओं द्वारा संपन्न किया जाएगा.
अंतिम संस्कार की प्रारंभिक प्रक्रिया
मराठी हिंदू रिवाजों के अनुसार, निधन के बाद सबसे पहले पार्थिव शरीर को स्नान कराया जाता है. इस क्रिया को अंत्येष्टि की शुद्धिकरण के नाम से जाना जाता है. इसके बार शरीर को स्वच्छ वस्त्रों में लपेटा जाता है, जिसमें पुरुषों को धोती और महिलाओं को साड़ी पहनाने की परंपरा है. मराठी ब्राह्मण परंपरा के तहत पार्थिव शरीर को सफेद वस्त्र पहनाए जाते हैं.
इसके बाद माथे पर चंदन या कुमकुम का तिलक लगाया जाता है और तुलसी दल व गंगाजल का प्रयोग किया जाता है. गरुड़ पुराण में गंगाजल और तुलसी के उपयोग को अत्यंत पवित्र बताया गया है. धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे पारंपरिक ग्रंथों में अंत्येष्टि से जुड़े नियम, मंत्र और समय का विस्तृत उल्लेख है. इसका पालन आज भी महाराष्ट्र में किया जाता है.
अर्थी और अंतिम यात्रा की परंपरा
फिर पार्थिव शरीर आमतौर पर दक्षिण दिशा की ओर ले जाया जाता है, क्योंकि शास्त्रों में इसे यम का मार्ग माना गया है. अंतिम यात्रा के दौरान ‘राम नाम सत्य है’ जैसे श्लोकों का उच्चारण किया जाता है.
मुखाग्नि और दाह संस्कार का महत्व
हिंदू धर्म में दाह संस्कार या मुखाग्नि के जरिए पार्थिव शरीर को नष्ट किया जाता है. इस दौरान पुत्र या निकट सगे-संबंधी द्वारा मुखाग्नि देने से आत्मा को शांति मिलती है. मराठी ब्राह्मण समाज में यह प्रक्रिया वैदिक मंत्रों के साथ संपन्न की जाती है.
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