बंगाल चुनाव ने थामी महानगरों की रफ्तार, मेड गायब, ऐप्स पर स्लॉट फुल, बाजार भी सुनसान – AajTak

“हमारी ट्रेन की टिकटें कन्फर्म होने की उम्मीद बहुत कम है, लंबी वेटिंग लिस्ट चल रही है, लेकिन मुझे एक बात पता है, हम कल निकल रहे हैं. मुझे परवाह नहीं चाहे मेरी नौकरी ही क्यों न चली जाए,” ये कहना है पूर्वी दिल्ली के दल्लूपुरा में काम करने वाली घरेलू सहायिका पोद्दा का. वह इस बात पर अड़ी हैं कि वह अपने परिवार के आठ सदस्यों के साथ गुरुवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वोट डालने के लिए दक्षिण दिनाजपुर जिले में अपने गांव के लिए रवाना होंगी. उनका कहना है कि उनके जैसे सैकड़ों लोग बंगाल में अपने पैतृक गांवों की ओर भाग रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि अगर उन्होंने वोट नहीं दिया तो वे अपनी नागरिकता खो सकते हैं.
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव दो चरणों में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को है. पहले चरण में अब सिर्फ एक हफ्ता बचा है, ऐसे में दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे महानगरों और कई औद्योगिक इलाकों से प्रवासी मजदूरों, जिनमें घरेलू सहायिकाएं, नैनी, रसोइये और अन्य मजदूर शामिल हैं सबको बंगाल पहुंचने की होड़ मची हुई है.
पोद्दा इंडिया टुडे डिजिटल से बात करते हुए कहती हैं “मैं दिल्ली में जहां रहती हूं, वहां हमारे जैसे कई प्रवासी हैं जो घर वापस जा रहे हैं. उन्हें डर है कि अगर उन्होंने इस बार वोट नहीं दिया, तो उनका नाम वोटर लिस्ट से काट दिया जाएगा और वे सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हो जाएंगे. कुछ लोगों को तो अपनी नागरिकता खोने तक का डर सता रहा है.’
दिल्ली में पोद्दा की तरह ही बेंगलुरु में मुर्शिदा खातून हैं. आसनसोल की रहने वाली मुर्शिदा, जो एक नैनी के रूप में काम करती हैं, वे भी वोट डालने के लिए पश्चिम बंगाल वापस जा रही हैं. उनकी एम्प्लॉयर और बेंगलुरु में रहने वाली एक टेकी आकांक्षा ने बताया, “वह वोट देने वापस जाने के कारणों को लेकर बहुत स्पष्ट थी, उसे डर था कि अगर उसने इस बार वोट नहीं दिया, तो शायद उसे दोबारा कभी मौका न मिले.” आकांक्षा ने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया, “उसे इस बात का डर सता रहा था कि अगर उसने वोट नहीं दिया, तो उसे बांग्लादेश निर्वासित किया जा सकता है.”
यह भी पढ़ें: बंगाल में TMC बनाम बीजेपी! व्हाट्सऐप चैट से छिड़ी नई राजनीतिक जंग
घर लौट रहे हैं लोग
घरेलू सहायिकाओं और नैनी की तरह ही, भारत के महानगरों और औद्योगिक केंद्रों में काम करने वाले कई अन्य ब्लू-कॉलर कर्मचारी भी चाहे जो हो जाए, वोट डालने के लिए पश्चिम बंगाल पहुंचने की जल्दबाजी में हैं. जहां कुछ बंगाली प्रवासियों ने घर की अपनी वार्षिक यात्रा को चुनाव कार्यक्रम के साथ जोड़ लिया है, वहीं अन्य विशेष रूप से अपनी नागरिकता खोने के डर और मतदाता सूची  में अपना नाम बनाए रखने के लिए वापस भाग रहे हैं. हालांकि, मतदाता सूची से नाम कटने या नागरिकता खोने का यह डर निराधार है, लेकिन उन्हें लगता है कि किसी भी अनहोनी से बचने का यही एक मौका है.
मुंबई के सोने और हीरे के रिटेल हब ‘जवेरी बाजार’ के कुछ कर्मचारी, जिन्हें ट्रेन की कन्फर्म टिकट नहीं मिल पा रही है, वे लगभग 1,900-2,300 किलोमीटर की दूरी तय कर पश्चिम बंगाल वापस जाने के लिए बसों का इंतजाम कर रहे हैं. ब्लू-कॉलर श्रमिकों और असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लोगों के ये मामले SIR एक्सरसाइज के बाद और तेज हो गए हैं. हमने जिन कुछ श्रमिकों से बात की, उनका कहना था कि मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए उन्होंने जो मेहनत और संघर्ष किया है, उसे देखते हुए अब वोट डालना उनके लिए उस नाम को और सुरक्षित करने का एक अवसर है. 
बंगाल में राजनीतिक संदेशों ने नागरिकता को लेकर डर को कैसे हवा दी
तृणमूल प्रमुख और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी के लिए वोट मांगते समय इस डर को और बढ़ा दिया है कि लोगों के मतदान के अधिकार और नागरिकता खतरे में पड़ सकते हैं. मार्च में जलपाईगुड़ी जिले के मयनागुड़ी में एक रैली के दौरान SIR एक्सरसाइज और मतदाताओं के नाम हटाए जाने का जिक्र करते हुए बनर्जी ने कहा, “चुनाव आयोग भाजपा और केंद्र सरकार संविधान का पालन नहीं कर रहे हैं. वे वोट देने के अधिकार को छीनने की कोशिश कर रहे हैं.” उन्होंने आगे कहा, “आज वे वोट देने का अधिकार छीन रहे हैं, कल वे एनआरसी (NRC) लाकर नागरिकता छीन लेंगे.”
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की तैयारी के दौरान, कथित बांग्लादेशी घुसपैठियों और “बाहरी लोगों” का मुद्दा चुनावी अभियान का एक प्रमुख केंद्र बन गया है. भाजपा ने बार-बार पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में मतदाताओं की असामान्य वृद्धि को अवैध घुसपैठ के सबूत के तौर पर पेश किया है, जिसे SIR के जरिए हटाने का लक्ष्य रखा गया था. इसने कई वैध भारतीय नागरिकों के बीच भी व्यापक डर पैदा कर दिया है, विशेष रूप से बांग्लादेश की सीमा से लगी विधानसभा सीटों पर.
नागरिकता और अवैध प्रवासियों को लेकर दोनों पक्षों की ओर से दिए जा रहे राजनीतिक संदेशों ने राज्य के बाहर काम करने वाले बंगाल के मतदाताओं के बीच घबराहट पैदा कर दी है, जिससे घर वापस लौटने की होड़ मच गई है. 
पश्चिम बंगाल की ओर प्रवासियों के इस भारी पलायन का असर दिल्ली-एनसीआर, मुंबई और बेंगलुरु समेत अन्य शहरों के घरों में महसूस किया जा रहा है. यह स्थिति यह भी उजागर करती है कि बड़े शहरों का पेशेवर ईकोसिस्टम किस कदर असंगठित कार्यबल पर निर्भर है.
यह भी पढ़ें: बंगाल में ‘महिला शक्ति’ पर रार! स्मृति ईरानी का 33% आरक्षण का दांव, CM ममता ने याद दिलाया TMC का रिपोर्ट कार्ड 
खुर्जा के श्रमिक को सता रहा डर
पूर्वी दिल्ली के दल्लूपुरा में रहने वाली घरेलू सहायिका पोद्दा का कहना है, “अगर कुछ भी रास्ता नहीं निकला, तो मेरा परिवार और साथ जा रहे रिश्तेदार दक्षिण दिनाशपुर के गंगारामपुर तक जनरल बोगियों में ठिठककर सफर करने को तैयार हैं.” रिपोर्टों के अनुसार, ये बोगियां बिहार के छठ पर्व की तरह ही क्षमता से कहीं अधिक भरी हुई चल रही हैं.
पोद्दा ने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया, “हमने जिन लोगों से बात की, उनमें से कुछ को यह डर भी सता रहा है कि वे ‘लक्ष्मी भंडार’ और ‘कन्याश्री’ जैसी राज्य-पोषित योजनाओं के लाभार्थी नहीं रह पाएंगे.” उत्तर प्रदेश की ‘सिरेमिक सिटी’ खुर्जा में एक सिरेमिक उद्योग श्रमिक राहुल ने इंडिया टुडे डिजिटल से कहा कि उनके पास “अपना काम छोड़कर लगभग 20 दिनों के लिए घर वापस जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. “
पश्चिम बंगाल के मूल निवासी राहुल ने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया, “अगर मैं जाकर अपना वोट नहीं डालता हूं, तो मुझे डर है कि मेरा नाम मतदाता सूची से हटाया जा सकता है, इससे मेरी नागरिकता पर भी असर पड़ सकता है.” उन्होंने आगे कहा कि उनके जैसे प्रवासी आमतौर पर केवल दुर्गा पूजा जैसे त्योहारों के दौरान ही घर जाते हैं, लेकिन इस बार, SIR के बाद, वापस जाना लगभग अनिवार्य हो गया है. 
उत्तर प्रदेश के खुर्जा में 250 से अधिक सिरेमिक निर्माण इकाइयां काफी हद तक पश्चिम बंगाल के श्रमिकों पर निर्भर हैं. इंडिया टुडे डिजिटल को एक उद्योग विशेषज्ञ ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि श्रमिकों के बड़ी संख्या में जाने के कारण, खुर्जा की लगभग सभी सिरेमिक फैक्ट्रियां करीब 20 दिनों के लिए बंद होने वाली हैं.
दिल्ली-एनसीआर, जयपुर में घरेलू सहायकों की कमी
बेंगलुरु में काम करने वाले पश्चिम बंगाल के मूल निवासी निमाई माइसल कहते हैं कि राज्य के बाहर रहने और काम करने वाले उनके कई रिश्तेदारों के लिए वोट देना एक “परंपरा” रहा है, लेकिन अब वोट न देने के साथ एक डर जुड़ गया है. एक घरेलू सहायक के रूप में काम करने वाले माइसल ने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया, “हम हर चुनाव में घर लौटने का नियम रखते हैं, लेकिन, SIR एक्सरसाइज के मद्देनजर, इस यात्रा में अब एक अतिरिक्त जल्दबाजी जुड़ गई है, क्योंकि हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि हमारा नाम वोटर लिस्ट में बना रहे और वोटिंग का रिकॉर्ड बरकरार रहे.”
वर्किंग प्रोफेशनल्स भी परेशान
सोशल मीडिया पर घरेलू सहायकों, नैनी और रसोइयों की कमी को लेकर चर्चाओं की बाढ़ आ गई है, जिसमें कई लोग इससे होने वाली दिक्कतों को उजागर कर रहे हैं. मुंबई, नोएडा, गुरुग्राम, दिल्ली और अन्य शहरों के ‘सबरेडिट्स’ ऐसे पोस्ट से भरे हुए हैं. गुरुग्राम की एक रेडिट यूजर “superzzgirl” ने शहर के सबरेडिट पर पूछा, “मेड का क्या सीन है? सब छुट्टी पर क्यों हैं? हमारे यहां तीन मेड हैं और तीनों ही गांव जा रही हैं.”
जयपुर के रहने वाले एक व्यक्ति “CarpetIntrepid2721” ने लिखा, “मेरी हाउस हेल्प भी बंगाल चली गई है.” प्रवासियों के इस ‘रिवर्स फ्लो’ ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म द्वारा दी जाने वाली घरेलू सेवाओं को भी प्रभावित किया है. नोएडा के एक मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव, जो घरेलू कामों के लिए ऐसी ऐप्स पर निर्भर हैं, ने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया कि वह “अब उसी दिन की बुकिंग स्लॉट पाने में असमर्थ हैं, जबकि पहले बुकिंग के कुछ ही घंटों के भीतर मदद उपलब्ध हो जाती थी.”
गुरुग्राम की रेडिट यूजर “superzzgirl” ने कहा, “मैंने प्रोंटो, स्नैबिट (Snabbit) और अर्बन कंपनी (Urban Company) पर चेक किया, और उनमें से किसी के पास भी पूरे हफ्ते के लिए कोई स्लॉट खाली नहीं है.”
बंगाल चुनाव ने मुंबई के जवेरी बाजार को कैसे प्रभावित किया
वोट डालने की इस होड़ ने मुंबई के जवेरी बाजार के कारोबार को भी प्रभावित किया है, जहां अधिकांश कारीगर पश्चिम बंगाल से हैं. इंडिया टुडे टीवी के लिए मुस्तफा शेख ने रिपोर्ट किया कि यह क्षेत्र, जो सोने और हीरे के गहनों के निर्माण का केंद्र है, “पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के कारण बड़े पैमाने पर रिवर्स माइग्रेशन देख रहा है. 
बंगाल स्वर्ण शिल्प कल्याण संघ के महासचिव कालीदास सिन्हा रॉय ने बताया कि लगभग 60% कारीगर मुंबई छोड़ चुके हैं, और मतदान के दिनों के करीब आने पर और भी लोगों के जाने की उम्मीद है. सिन्हा रॉय ने इंडिया टुडे टीवी को बताया, “इस क्षेत्र में लगभग 1.5 लाख कारीगर हैं. SIR एक्सरसाइज के बाद, कारीगरों में इस चुनाव में वोट डालने की तीव्र इच्छा है.”
आभूषण निर्माता इकरामुत हक शेख ने कहा कि यह स्थिति एलपीजी सिलेंडर की कमी के बीच पैदा हुई है, जिससे मालिकों के लिए कामकाज जारी रखना मुश्किल हो गया है. शेख ने बताया, “मेरी कई इकाइयों में लगभग 40 कारीगर काम करते हैं. उनमें से आधे जा चुके हैं. बाकी भी जल्द ही जा सकते हैं. ट्रेनों की कमी के कारण बसों का इंतजाम किया जा रहा है. SIR एक प्रमुख कारक है जिसकी वजह से श्रमिक इस बार पश्चिम बंगाल में वोट डालने पर जोर दे रहे हैं.”
इनमें से अधिकांश घरेलू सहायकों और ब्लू-कॉलर श्रमिकों के लिए जिनमें से कई महानगरों और औद्योगिक क्षेत्रों के असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का मतलब ‘दिखना और गिना जाना’ है. उन्हें डर है कि वोट न देने से उन्हें सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और यहां तक कि नागरिकता से भी वंचित किया जा सकता है. और यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनका नाम वोटर लिस्ट में बना रहे, वे अपनी मजदूरी, नौकरी और लंबी यात्राओं का जोखिम उठाने को तैयार हैं ताकि वे अपने ‘होने के प्रमाण’ को बचाए रख सकें.
इनपुट- आनंद सिंह, मीनल शर्मा, मुस्तफा शेख
यह भी पढ़ें: Exclusive: पश्चिम बंगाल में 42 लोगों को मिला सिटिजनशिप सर्टिफिकेट, 800 ने किया आवेदन
Copyright © 2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today
होम
वीडियो
लाइव टीवी
न्यूज़ रील
मेन्यू
मेन्यू

source.freeslots dinogame telegram营销

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Toofani-News