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केरलम विधानसभा चुनावों के नतीजों की तस्वीर तो ऐसे बड़े राजनीतिक बदलाव की ओर इशारा कर रही है, जैसे मौसम विभाग हर बारिश में भारी तूफान की चेतावनी दे देता है और फिर बूंदाबांदी भी ठीक से नहीं होती. यहां इस बार का चुनाव ऐसा रहा मानो किसी ने “विकास बनाम मूड स्विंग” का लाइव टेस्ट रख दिया हो. एक तरफ सरकार थी, जो लगातार बता रही थी कि सड़कें बन गईं, योजनाएं चल रही हैं और सब कुछ बढ़िया है. दूसरी तरफ जनता थी जो कह रही थी, “ठीक है, पर अब थोड़ा बदलाव भी देख लेते हैं.”
पूरा चुनाव धीरे-धीरे उम्मीदवारों और सीटों की लड़ाई से ज्यादा मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के “फैक्टर” का एग्जाम बन गया. हर सीट पर उनका नाम ऐसा गूंजा कि कई उम्मीदवारों की अपनी पहचान भी “ब्रांड विजयन” के नीचे दब सी गई. नतीजा ये कि कहीं वोट विकास के लिए पड़े, कहीं नाराज़गी के लिए, और कई जगह तो बस “अब बस भी करो” वाले मूड में.
एलडीएफ को भरोसा था कि जनता खुश है, लेकिन मतदाताओं ने अपने अंदाज़ में बता दिया कि खुशी और वोट हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलते. सत्ता-विरोधी लहर ऐसी चली कि योजनाओं की लिस्ट और भाषणों की लंबाई भी उसे रोक नहीं पाई. कुल मिलाकर, ये चुनाव कम और एक तरह का राजनीतिक रियलिटी टेस्ट ज्यादा लग रहा था जहां जनता ने शांत तरीके से बता दिया कि “काम हुआ होगा, लेकिन अब किरदार बदलना चाहिए.”
विजयन फैक्टर के खिलाफ वोट
सीपीआई(एम) को सबसे बड़ा झटका मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के “फैक्टर” से लगा माना जा रहा है. वो ही एलडीएफ के प्रचार का मुख्य चेहरा थे, जिससे चुनाव एक तरह से उनके नेतृत्व पर जनमत-संग्रह बन गया.140 में से सभी सीटों पर एलडीएफ ने विजयन को केंद्र में रखा, जिससे उम्मीदवारों की व्यक्तिगत छवि पीछे रह गई. कई जगह मजबूत और साफ-सुथरी छवि वाले उम्मीदवार भी विजयन के नाम से बने नकारात्मक माहौल का शिकार हुए. मतदाताओं ने उम्मीदवार की बजाय मुख्यमंत्री के प्रति समर्थन या विरोध के आधार पर वोट किया.
सत्ता-विरोधी लहर
नतीजे यह संकेत देते हैं कि मतदाताओं ने एलडीएफ के इस दावे को खारिज कर दिया कि सरकार के खिलाफ कोई खास नाराजगी नहीं है. दिसंबर के स्थानीय निकाय चुनावों में मिले झटकों के बावजूद पार्टी यह मानती रही कि जनता के बीच व्यापक असंतोष नहीं है.
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हालांकि, वेलफेयर योजनाओं, मेगा प्रोजेक्ट्स और वित्तीय सहायता कार्यक्रमों के बावजूद मतदाताओं में एक तरह की थकान और बदलाव की इच्छा स्पष्ट रूप से दिखाई दी. केरलम में ऐतिहासिक रूप से सत्ता परिवर्तन की प्रवृत्ति रही है, और 2021 का चुनाव इसका एक अपवाद माना जाता है. अब एक दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहने के बाद, इस बार बदलाव की भावना पहले से कहीं अधिक मजबूत होती दिख रही है.
अल्पसंख्यक वोटों का झुकाव
मुस्लिम वोटों का कांग्रेस की ओर एकजुट होना निर्णायक माना जा रहा है. 2014 के बाद से लोकसभा चुनावों में यह प्रवृत्ति लगातार दिखी है कि मुस्लिम मतदाता कांग्रेस को अधिक मजबूत विकल्प मानते हैं. इस बार भी यह रुझान जारी रहा. यह धारणा भी असर डालती दिखी कि सीपीआई(एम) और बीजेपी के बीच कहीं न कहीं समझ है. वहीं हिंदू वोटों को साधने की कोशिश में पार्टी ने कुछ अल्पसंख्यक वर्गों को दूर कर दिया.
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मुस्लिम वोटों का कांग्रेस की ओर एकजुट होना इस बार भी एक अहम और निर्णायक फैक्टर माना जा रहा है. 2014 के बाद से लोकसभा चुनावों में यह रुझान लगातार दिखता रहा है कि मुस्लिम मतदाता कांग्रेस को अपेक्षाकृत मजबूत और भरोसेमंद विकल्प के रूप में देखते हैं, और इस बार भी यह प्रवृत्ति जारी रही.
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वहीं राजनीतिक गलियारों में यह धारणा भी चर्चा में रही कि सीपीआई(एम) और बीजेपी के बीच कहीं न कहीं परोक्ष समझ या नरमी का माहौल है, जिसने भी वोटिंग पैटर्न को प्रभावित किया. दूसरी ओर, हिंदू वोटों को साधने की कोशिश में पार्टी की रणनीति कुछ जगह उलटी पड़ती दिखी, जिससे अल्पसंख्यक समुदाय के एक हिस्से में दूरी और असहजता बढ़ी.
लेफ्ट में असंतोष
एलडीएफ के पारंपरिक गढ़ों, खासकर उत्तर केरल में हार और वोट शेयर में गिरावट से स्पष्ट है कि उसके कोर वोट बैंक में असंतोष बढ़ा है. पार्टी ने विकास और संगठन पर जोर दिया, लेकिन मतदाताओं में यह भावना बनी कि विचारधारा की जगह सत्ता बनाए रखना प्राथमिकता बन गया. इससे वामपंथी समर्थकों में नाराजगी बढ़ी.
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विकास की कहानी का असर नहीं
सीपीआई(एम) ने सड़क, बुनियादी ढांचे और कल्याणकारी योजनाओं को अपनी बड़ी उपलब्धि बताया, लेकिन यह वोटों में तब्दील नहीं हो सका. महंगाई, बेरोजगारी, किसान संकट और कई क्षेत्रों में जंगली जानवरों के हमलों जैसे मुद्दों ने सरकार के खिलाफ माहौल बनाया.
ईसाई समुदाय का यूडीएफ की ओर रुझान
मध्य केरल में ईसाई मतदाताओं का बड़ा हिस्सा, जो 2021 में कुछ हद तक अलग हुआ था, इस बार फिर कांग्रेस की ओर लौटता दिखा. बीजेपी का ईसाई समुदाय तक पहुंच बनाने का प्रयास सफल नहीं हो पाया. फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) से जुड़ी बहस ने भी कुछ ईसाई मतदाताओं में बीजेपी को लेकर झिझक पैदा की.
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सबरीमला और अन्य मुद्दे
सबरीमला मंदिर से जुड़े कथित सोना चोरी मामले ने भी एलडीएफ के खिलाफ माहौल बनाने में भूमिका निभाई. हालांकि बीजेपी ने इस मुद्दे को अपेक्षाकृत सीमित रूप से ही उठाया. दूसरी ओर, कांग्रेस ने वायनाड राहत राशि के दुरुपयोग का मुद्दा सामने रखा, लेकिन उसका असर भी सीमित ही दिखाई दिया. इससे कई क्षेत्रों में हिंदू मतदाताओं ने वोट विभाजन के बजाय अधिकतर सीपीआई(एम) के खिलाफ मतदान को प्राथमिकता दी, जिसका सीधा लाभ यूडीएफ को मिलता दिखा.
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