ममता बनर्जी क्या अपनी राजनीतिक ज़मीन वापस हासिल कर पाएंगी? – BBC

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भारत की राजनीति ने कई प्रभावशाली महिला नेताओं को देखा है. इस सूची में तीन महिलाओं जे. जयललिता, मायावती और ममता बनर्जी का ज़िक्र भी ज़रूरी है, जो क्षेत्रीय ताक़त से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के केंद्र में रहीं और उन्होंने राजनीति को दिशा दी.
दृढ़ता, सशक्त नेतृत्व और मतदाताओं के साथ मज़बूत जुड़ाव के बल पर, वे राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय राजनीति का निर्णायक चेहरा बन गईं.
उन्होंने एक ऐसे राजनीतिक अखाड़े में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जिस पर लंबे समय से पुरुषों का वर्चस्व रहा था.
साल 2016 में जयललिता के निधन और हाल के वर्षों में मायावती के वर्चस्व के कमज़ोर पड़ने के साथ, ममता बनर्जी को एकमात्र कद्दावर महिला नेता माना जाने लगा था. उन्होंने अपने दम पर अपनी पार्टी खड़ी की और उसे सफलता दिलाई.
हालाँकि, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में मिली ताज़ा हार के बाद, यह सवाल बना हुआ है कि क्या भारत की इन 'आख़िरी महिला योद्धाओं' का अध्याय अब समाप्त हो गया है?
बीजेपी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में 207 सीटों के साथ एक ज़बरदस्त जीत हासिल की है. जबकि ममता बनर्जी अपनी सीट भी बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी से हार गई हैं.
शुभेंदु अधिकारी ने बनर्जी के गृह क्षेत्र भवानीपुर विधानसभा सीट से 15,000 से अधिक वोटों के अंतर से जीत हासिल की.
इस चुनाव परिणाम ने भारतीय राजनीति के बदलते स्वरूप पर बहस को फिर से तेज़ कर दिया है. ख़ास तौर पर ममता बनर्जी के घटते प्रभाव को लेकर, जो वाम मोर्चा के 34 साल लंबे शासन को समाप्त कर साल 2011 में बंगाल में सत्ता में आई थीं.
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हालाँकि, अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की प्रमुख अपनी हार स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. मंगलवार शाम को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने दावा किया, "हमारी हार नहीं हुई है. मैं इस्तीफ़ा नहीं दूँगी."
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स्वतंत्रता आंदोलन की नेता सुचेता कृपलानी जो बाद में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं, से लेकर देश की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक, कई महिला नेता लंबे समय से भारत की राजनीतिक यात्रा का एक अहम हिस्सा रही हैं.
इंदिरा गांधी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को उस मुश्किल दौर से बाहर निकाला, जो महंगाई, बेरोज़गारी और आर्थिक संकट से भरा था. यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें विपक्ष की बहुत सी आलोचना झेलनी पड़ी.
उनके कार्यकाल में कई बड़ी घटनाएँ भी हुईं, जिनमें पाकिस्तान के साथ साल 1971 का युद्ध, चीन के साथ संघर्ष और विवादित इमरजेंसी का दौर शामिल है. फिर भी, वह एक मज़बूत महिला राजनेता के तौर पर उभरीं, और उन्होंने भविष्य की महिला नेताओं के लिए रास्ता बनाया.
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दूसरी ओर, सुचेता कृपलानी अपनी प्रशासनिक क्षमता और मज़बूत फ़ैसले के लिए जानी जाती थीं. उन्होंने उत्तर प्रदेश में मज़दूर आंदोलनों और शासन से जुड़ी चुनौतियों को जिस तरह से संभाला, उससे एक मज़बूत नेता के तौर पर उनकी साख बनी.
भारतीय राजनीति के बड़े फलक पर, कई महिला नेताओं ने अपनी गहरी छाप छोड़ी है. इनमें क्षेत्रीय स्तर पर तीन नाम ख़ास तौर पर उभरकर सामने आते हैं- जे जयललिता, मायावती और ममता बनर्जी.
ये सभी अलग-अलग पृष्ठभूमि से आई थीं और इन्होंने अपने-अपने राज्यों में मज़बूत नेतृत्व का आधार तैयार किया.
आख़िरकार इन्हें क्षेत्रीय स्तर पर ज़बरदस्त लोकप्रियता मिली और राष्ट्रीय राजनीति में भी इनकी अहमियत बढ़ी.
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मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.
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दक्षिण भारतीय फ़िल्मों की एक मशहूर अदाकारा से लेकर एक लोकप्रिय राजनेता बनने तक जयललिता का सफ़र बेहद शानदार रहा. वह चार बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं, और उनके समर्थकों के बीच उन्हें प्यार से "अम्मा" कहा जाने लगा.
सख्त शासन और जन-कल्याणकारी नीतियों के लिए मशहूर जयललिता ने ज़मीनी स्तर पर लोगों से मज़बूत जुड़ाव बनाया. हालाँकि, उनके करियर पर विवादों और भ्रष्टाचार के आरोपों का साया भी पड़ा, जिनमें वह और उनके क़रीबी सहयोगी शामिल थे.
साल 2016 में उनका निधन हो गया. तमिलनाडु की राजनीति में उनके जाने को एक बड़ी क्षति माना गया.
मायावती, जो भारत की दलित राजनीति का एक अहम चेहरा हैं, एक साधारण पृष्ठभूमि से उठकर उत्तर प्रदेश की सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक बनीं.
समर्थकों के बीच "बहन जी" के नाम से लोकप्रिय मायावती ने कम उम्र में ही राजनीति में कदम रखा था, और बाद में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के संस्थापक कांशी राम ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया.
वह चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. पहचान-आधारित राजनीति और मतदाताओं के बीच उनकी मज़बूत पकड़ ही उनके प्रभाव का मुख्य आधार रही.
हालाँकि, पिछले कुछ सालों में, उनकी पार्टी को अंदरूनी टूट-फूट, चुनावी हार और संगठन की कमज़ोर होती ताक़त जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है.
करिश्मा और लोगों की पसंद के मामले में ममता बनर्जी को भी उसी श्रेणी में रखा गया है. समर्थकों के बीच "दीदी" के नाम से मशहूर ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में अपनी एक अलग राजनीतिक पहचान बनाई है.
मज़बूत क्षेत्रीय नेतृत्व, राजनीतिक सफर और शासन शैली के मामले में जयललिता और मायावती से ममता बनर्जी की कुछ समानताएँ हैं, लेकिन उनमें कुछ अहम अंतर भी नज़र आते हैं.
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जे जयललिता, मायावती और ममता बनर्जी ने अपनी-अपनी पार्टियों को ऐसी राजनीतिक ताक़तों में बदल दिया जो पूरी तरह से उनकी अपनी शख़्सियत पर आधारित थी. इससे वे अपनी-अपनी पार्टियों का सबसे अहम चेहरा बन गईं.
उन्होंने पुरुषों के दबदबे वाली राजनीतिक संस्कृति में अपने लिए जगह बनाई. इसके लिए उन्होंने ज़मीनी स्तर पर मज़बूत नेटवर्क बनाए, लोगों को लुभाने वाले जन-कल्याण के एजेंडे अपनाए और ज़ोरदार राजनीतिक संदेश दिए.
जहाँ जयललिता को एमजी रामचंद्रन का और मायावती को कांशी राम का मार्गदर्शन मिला, वहीं ममता बनर्जी का कोई ऐसा राजनीतिक 'गॉडफ़ादर' नहीं था.
मायावती की राजनीति ज़्यादातर जातिगत पहचान पर आधारित रही है. जयललिता का नेतृत्व उनके करिश्मे और जन-कल्याण पर ज़ोर देने वाले शासन से उभरा, जबकि ममता बनर्जी की सफलता का आधार ज़्यादातर आंदोलन-आधारित राजनीति और लोगों को लुभाने वाली जन-कल्याणकारी योजनाएँ थीं.
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ममता बनर्जी साल 2011 में 34 साल पुराने वामपंथी शासन को ख़त्म करके सत्ता में आईं. तब से लेकर इस विधानसभा चुनाव में हारने तक वे लगातार सत्ता में बनी रहीं.
राजनीति पर इसके व्यापक असर पर टिप्पणी करते हुए, ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉक्टर उमेश कुमार कहते हैं, "जे जयललिता, मायावती और ममता बनर्जी के नेतृत्व ने निस्संदेह भारतीय राजनीति के मायने और तौर-तरीके बदल दिए हैं."
"उनका महत्व सिर्फ़ महिला नेताओं के तौर पर उनकी मौजूदगी में ही नहीं है, बल्कि इस बात में भी है कि उन्होंने पार्टी बनाने, चुनाव प्रचार करने और शासन चलाने की अपनी ख़ास रणनीतियों के ज़रिए महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को किस तरह संस्थागत रूप दिया."
"मज़बूत राजनीतिक संगठन बनाकर, पुरानी और मज़बूत विपक्षी पार्टियों के ख़िलाफ़ चुनाव जीतकर, और लोगों को पसंद आने वाली जन-कल्याण की योजनाएँ लागू करके उन्होंने भारतीय राजनीति के उस स्वरूप को चुनौती दी है जिसमें ऐतिहासिक रूप से पुरुषों का ही दबदबा रहा है. ऐसा उन्होंने उन तरीकों से किया है जो पहले कभी नहीं देखे गए."
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हालाँकि ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा में बाक़ी दोनों नेताओं से कुछ अहम अंतर भी दिखाई देता है.
उनका जुझारू अंदाज़, ज़मीनी स्तर से गहरा जुड़ाव और उनकी सादगी भरी जीवनशैली की छवि उनके पक्ष में बहुत मज़बूती से काम आई. लेकिन हाल के कुछ सालों में उन्हें कुछ झटके भी लगे हैं.
शिक्षकों और नॉन-टीचिंग कर्मचारियों की भर्ती का विवाद, नगर निगम में नियुक्तियों में भ्रष्टाचार के आरोप, राशन वितरण घोटाला, और तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं पर लगे अन्य आरोपों ने उनकी पार्टी की छवि को कमज़ोर किया है.
विपक्ष ने उनकी सरकार पर "तुष्टीकरण की राजनीति" करने का भी आरोप लगाया, जबकि राज्य में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा की कई घटनाओं ने कानून-व्यवस्था को लेकर चिंताएँ बढ़ा दीं.
ये सब लोगों में बढ़ती असंतोष की भावना का कारण बने, और जानकारों का मानना ​​है कि हाल के चुनावी नतीजों में इस असंतोष ने एक अहम भूमिका निभाई है.
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तो क्या ममता बनर्जी को हालिया चुनाव में मिली हार उनके राजनीतिक करियर के अंत का संकेत है.
कोलकाता के सेंटर फॉर स्टडीज़ इन सोशल साइंसेज़ के प्रोफ़ेसर मैइदुल इस्लाम ने कहा, "एक महिला मुख्यमंत्री के तौर पर ममता की हार निश्चित रूप से राजनीतिक तौर पर अहम है. हाल के दिनों में राष्ट्रीय पार्टियों में हमने शीला दीक्षित और वसुंधरा राजे सिंधिया जैसी मुख्यमंत्रियों को देखा है."
"लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर, जयललिता, मायावती और ममता जैसी मज़बूत महिला नेताओं का अक्सर ज़िक्र होता है. इनमें जयललिता का निधन हो चुका है, चुनाव में हार का सामना करने के बाद मायावती फिर से उभर नहीं पाई हैं. अब देखना यह है कि ममता के मामले में क्या होता है."
दिल्ली के राजनीतिक अर्थशास्त्री डॉक्टर रोहित ज्योतिष ने कहा, "अगर हम ममता की तुलना जयललिता और मायावती से करें तो यह कहना होगा कि वे बहुत ज़्यादा केंद्रीकृत क्षेत्रीय नेतृत्व का हिस्सा थीं. जहाँ पार्टी संगठन और स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क पर कड़े नियंत्रण के ज़रिए सत्ता बनाई जाती थी."
उन्होंने आगे कहा, "ममता बनर्जी के मामले में जो बदलाव आया है, वह उस मुक़ाबले की बनावट है जिसका उन्हें सामना करना पड़ रहा है. ऐतिहासिक रूप से, पश्चिम बंगाल की राजनीति बहुत ज़्यादा स्थानीय नेटवर्क पर निर्भर थी."
"जो राज्य के संसाधनों तक पहुँच पर कंट्रोल और बँटवारे का ज़रिया बनते थे. जब तक ये नेटवर्क स्थिर रहे, वे या उनसे पहले के वामपंथी नेता मज़बूत राजनीतिक दबदबा बनाए रखने में कामयाब रहे."
उनके मुताबिक़, "अब संतुलन बदल गया है. हम उस संतुलन में एक तरह की उथल-पुथल देख रहे हैं. अब क्षेत्रीय राजनीति में राष्ट्रीय स्तर पर समर्थित चुनौती देने वाले उभर रहे हैं, जिससे मुक़ाबला कहीं ज़्यादा खुला और मुश्किल हो गया है. यह तमिलनाडु में जयललिता को जिस तरह के विरोध का सामना करना पड़ा था, उससे काफ़ी अलग है. मायावती के मामले में, विरोध हमेशा स्थानीय गठबंधनों के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रहा."
"मुझे नहीं लगता कि ममता की हार कोई निजी पतन है. बल्कि, केंद्रीकृत स्थानीय नेतृत्व अब कहीं ज़्यादा प्रतिस्पर्धी राजनीतिक माहौल का सामना कर रहा है."
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दूसरी ओर, डॉक्टर कुमार कहते हैं, "मौजूदा नतीजे निश्चित रूप से अहम ढाँचागत और राजनीतिक चुनौतियों को दिखाते हैं. सत्ता-विरोधी लहर का गहरा असर, ममता बनर्जी की सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप, और स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) के दौरान वोटर लिस्ट से मतदाताओं के नाम हटाए जाने जैसे मामले चुनावी माहौल को तय करने में अहम भूमिका निभाते दिख रहे हैं."
इसके अलावा, ऐसा लगता है कि बीजेपी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है. अब उसका ज़ोर स्थानीय स्तर के प्रचार, चुनावी क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर ज़्यादा ध्यान देने और बूथ-स्तर के बेहतर प्रबंधन पर है.
इन सभी बातों ने मिलकर टीएमसी की हार में भूमिका निभाई.
ऐसे में ममता बनर्जी के राजनीतिक भविष्य के लिए इसका क्या मतलब है?
मैइदुल इस्लाम कहते हैं, "साल 2004-2006 में मिली असफलताओं के बाद, कई लोगों ने उनके राजनीतिक करियर का अंत मान लिया था. उन्हें लगता था कि अब ममता बनर्जी वापस नहीं लौटेंगी. लेकिन साल 2006 के बाद, उन्होंने सिंगूर–नंदीग्राम आंदोलन के ज़रिए राजनीति में ज़ोरदार वापसी की."
"अब वही ममता 2026 में फिर से हार गई हैं. अब उनके पास समय है, क्योंकि अब वह सरकार में नहीं हैं. वह इस समय का उपयोग कैसे करती हैं, क्या वह अपने संगठन के आधार को फिर से मज़बूत करती हैं, राजनीति से कुछ समय का ब्रेक लेती हैं, या फिर से वापसी करती हैं."
डॉक्टर ज्योतिष ने भी कुछ ऐसी ही राय ज़ाहिर करते हुए कहा, "अगर हम उनकी तुलना जयललिता और मायावती से करें, तो मुझे नहीं लगता कि ममता का पतन हमेशा के लिए है. अभी तक ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है कि उनका राजनीतिक करियर ख़त्म हो गया है."
ममता बनर्जी ने ख़ुद भी अपनी हार मानने से इनकार कर दिया है, और कहा है, "हम डटकर मुक़ाबला करेंगे."
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