मिडिल ईस्ट की जंग के बाद से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का रास्ता अभी भी प्रभावित है. इस वजह से भारत में गैस की सप्लाई पहले की तरह नहीं हो रही है. लेकिन, क्या आप जानते हैं जब होर्मुज से गैस सप्लाई नहीं हो पा रही है तो भारत किस तरह से गैस सप्लाई को मैनेज कर रहा है. भारत के लिए गैस का आयात भी जरूरी है, क्योंकि भारत आयात पर ही निर्भर है. ऐसे में जानते हैं कि अभी होर्मुज के अलावा किन-किन तरीकों से भारत के पास गैस आ रही है और भारत तक गैसे कैसे पहुंच रही है…
भारत अपनी गैस जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है और इसका लगभग 60 फीसदी हिस्सा इसी रणनीतिक समुद्री मार्ग से होकर आता है, जिसमें मुख्य रूप से कतर और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे बड़े आपूर्तिकर्ता शामिल हैं. लेकिन, वास्तविक तस्वीर उतनी गंभीर नहीं बनी, जितनी आशंका थी. भारत ने तेजी से अपनी सप्लाई चेन को री-एडजस्ट किया और दूसरे सोर्स की ओर रुख करके ऊर्जा संकट को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया.
कैसे बना संतुलन
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जैसे ही होर्मुज मार्ग प्रभावित हुआ, मार्च में भारत के एलएनजी आयात में गिरावट दर्ज की गई. इसका कारण ये था कि इस वक्त कतर और यूएई से लगभग कोई नई खेप नहीं आई. इसके बावजूद भारत ने आपूर्ति बाधित नहीं होने दी, बल्कि तुरंत नए आपूर्तिकर्ताओं की ओर शिफ्ट किया. इस दौरान भारत ने ओमान, अमेरिका, नाइजीरिया, अंगोला की ओर रुख किया. इन देशों से आयात बढ़ाकर भारत ने कमी को काफी हद तक संतुलित किया.
ओमान और अमेरिका बने नए सप्लाई हब
सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह रहा कि ओमान भारत का सबसे भरोसेमंद वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा. इसकी वजह यह है कि ओमान का निर्यात होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर नहीं है और अरब सागर होते हुए सामान भारत आ रहा है. इसी तरह अमेरिका से भी एलएनजी आपूर्ति बढ़ी, जिससे भारत को लंबी दूरी की लेकिन स्थिर सप्लाई मिलती रही. नाइजीरिया और अंगोला ने भी अतिरिक्त मात्रा देकर सप्लाई गैप को भरने में योगदान दिया.
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में, कतर से एलएनजी के आयात की औसत मासिक मात्रा 0.95 मिलियन टन रही, इसके बाद संयुक्त अरब अमीरात से आयात 0.27 मिलियन टन रहा. मार्च-अप्रैल में, होर्मुज बंद होने से इन दो महीनों के दौरान कतर से केवल 0.06 मिलियन टन और संयुक्त अरब अमीरात से 0.13 मिलियन टन एलएनजी का आयात हुआ. ओमान, जो 2025 में भारत को एलएनजी की आपूर्ति करने वाला चौथा सबसे बड़ा देश था और जिसकी औसत मासिक आपूर्ति 0.18 मिलियन टन थी, मार्च-अप्रैल में बढ़कर 1.2 मिलियन टन हो गई, यानी औसतन प्रति माह 0.6 मिलियन टन.
बता दें कि मार्च में जहां एलएनजी आयात करीब 1.67 मिलियन टन तक गिर गया था, वहीं अप्रैल में यह बढ़कर करीब 1.95 मिलियन टन तक पहुंच गया. हालांकि, यह अभी भी सामान्य स्तर से थोड़ा कम था, लेकिन यह स्पष्ट संकेत था कि भारत ने सप्लाई शिफ्टिंग सफलतापूर्वक कर ली. अभी कतर के अलावा दूसरे देशों से बढ़ी हुई आपूर्ति ने बड़े संकट को टाल दिया.