पीएम मोदी को 'सँपेरे' के रूप में दिखाने वाले नॉर्वे के अख़बार ने उनकी तारीफ़ में क्या कहा? – BBC

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नॉर्वे दौरा लगातार चर्चा में बना हुआ है.
पहले वहां की पत्रकार हेला लेंग का उनसे पूछा गया सवाल (जिसका उन्होंने जवाब नहीं दिया था) चर्चा में रहा वहीं अब नॉर्वे के एक अख़बार में पीएम मोदी पर छपा कार्टून सुर्ख़ियां बटोर रहा है.
इसकी चर्चा भी हो रही है और आलोचना भी.
जिस नॉर्वेजियन अख़बार की बात हो रही है, उसका नाम 'आफ़्टेनपोस्टेन' है, जो नॉर्वे के सबसे बड़े और प्रभावशाली अख़बारों में से एक माना जाता है.
पीएम मोदी की नॉर्वे यात्रा के दौरान आफ़्टेनपोस्टेन ने एक कार्टून प्रकाशित किया था जिसमें उन्हें 'सपेरे' के रूप में दिखाया गया था और पेट्रोल पंप के पाइप को सांप की तरह दर्शाया गया था.
यह कार्टून एक ओपिनियन लेख के साथ प्रकाशित हुआ था, जिसमें पीएम मोदी के लिए हेडलाइन दी गई है, 'एक चालाक और थोड़ा खीज दिलाने वाला आदमी'.
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इस तस्वीर पर ऑनलाइन कड़ी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं, खासकर भारत में.
कई यूज़र्स और टिप्पणीकारों ने इसे 'नस्लवादी' बताया और कहा कि यह उस औपनिवेशिक काल की याद दिलाता है जहां पश्चिमी मीडिया लंबे समय से भारत को पिछड़ा दिखाने की कोशिश करता रहा है.
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वरिष्ठ पत्रकार आदित्य राज कौल ने एक्स पर लिखा, "चौंकाने वाला. नस्लवादी. अपमानजनक. नॉर्वे का सबसे बड़ा ब्रॉडशीट अख़बार आफ़्टेनपोस्टेन एक चौंकाने वाला कार्टून प्रकाशित कर रहा है, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री को एक सपेरे के रूप में दिखाया गया है. इसके साथ हेडलाइन दी गई है- एक चालाक और थोड़ा खीज दिलाने वाला आदमी. वे भारत की तरक्की और सफलता को पचा नहीं पा रहे हैं. अफ़सोस."
वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.
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@samjawed65 नाम के एक्स हैंडल से पोस्ट किया गया, "पूरी तरह से नस्लवादी. जो बात और भी ध्यान खींचती है, वह है इसमें मौजूद विडंबना. प्रधानमंत्री मोदी पहले अक्सर यह कहते रहे हैं कि दुनिया पहले भारत को सांपों के खेल दिखाने वालों की धरती के रूप में देखती थी. और अब, उनके ओस्लो दौरे के दौरान, एक अहम यूरोपीय अख़बार उन्हें उसी छवि में दिखाता है."
'द हिंदू' ग्रुप से जुड़े पत्रकार और चीन मामलों के जानकार अनंत कृष्णन ने लिखा, "यह कार्टून, जिसे मैंने गलती से किसी सस्ते टैबलॉइड का समझा था, दरअसल नॉर्वे के सबसे बड़े अख़बार आफ़्टेनपोस्टेन में प्रकाशित हुआ है, जिसे पेपर ऑफ रिकॉर्ड भी कहा जाता है. यह कथित रूप से श्रेष्ठ पत्रकारिता मानकों की छवि के लिए कोई अच्छा उदाहरण नहीं है."
पत्रकार शशांक मट्टू ने लिखा, "नॉर्वे के सबसे बड़े अख़बार ने प्रधानमंत्री मोदी का एक कार्टून प्रकाशित किया है, जिसमें उन्हें उनके ओस्लो दौरे के दौरान सपेरे के रूप में दिखाया गया है. हेडलाइन में लिखा है, "एक चालाक और थोड़ा खीज दिलाने वाला आदमी"
Carlwheless के एक्स हैंडल से पोस्ट किया गया, "नॉर्वे के सबसे बड़े अख़बार ने अभी प्रधानमंत्री मोदी का एक कार्टून प्रकाशित किया है, जिसमें उन्हें सपेरे के रूप में दिखाया गया है. यह पत्रकारिता नहीं है-यह औपनिवेशिक युग के नस्लवाद को टिप्पणी के रूप में पेश करने जैसा है. वे भारत के उभार को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे, इसलिए वही पुराने स्टीरियोटाइप दोहरा रहे हैं जिन्हें उनके दादा-परदादा इस्तेमाल करते थे. हर बार असलियत सामने आ ही जाती है."
फ्रैंक रोज़ेविक नाम के टिप्पणीकार ने पीएम मोदी पर ये आर्टिकल लिखा था जिसका शीर्षक है, 'एक चालाक और थोड़ा खीज दिलाने वाला आदमी'
आफ़्टेनपोस्टेन अख़बार में छपे इस लेख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नॉर्वे यात्रा और उनकी विदेश नीति पर टिप्पणी की गई है.
इसमें लेखक ने कहा है कि मोदी की विदेश नीति बहुत व्यावहारिक (प्रेग्मेटिक) है, यानी वे विचारधारा से ज़्यादा राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हैं. मोदी ऐसे नेता के रूप में दिखाए गए हैं जो अलग-अलग देशों से एक साथ अच्छे संबंध रखना चाहते हैं, चाहे वे देश एक-दूसरे से सहमत हों या नहीं.
लेख में मोदी की इस नीति को 'रियलपॉलिटिक' कहा गया है- यानी राजनीति में व्यावहारिक हितों के आधार पर फ़ैसले लेना.
उन्होंने लेख में भारत को एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति बताया, जो व्यापार, तकनीक, ऊर्जा और रणनीति के क्षेत्र में कई देशों के साथ साझेदारी बढ़ा रहा है.
इसमें नॉर्डिक देश (उत्तरी यूरोप के ठंडे तापमान वाले देश- जैसे नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क, फ़िनलैंड और आइसलैंड) भारत के लिए इसलिए अहम बताए गए हैं क्योंकि वहां ग्रीन टेक्नोलॉजी, डिजिटलाइजेशन और आर्कटिक क्षेत्र से जुड़े अवसर हैं.
लेख यह भी बताता है कि पश्चिमी देशों को कभी-कभी भारत की विदेश नीति असंगत (इनकन्सिस्टेंट) लग सकती है, खासकर रूस के साथ संबंधों को लेकर. साथ ही, भारत में लोकतंत्र और प्रेस की आज़ादी को लेकर कुछ आलोचनाएँ भी लेख में शामिल हैं, जो पश्चिमी बहसों का हिस्सा हैं.
कुल मिलाकर लेख का टोन पूरी तरह समर्थन या विरोध वाला नहीं है. यह मोदी की विदेश नीति को एक रणनीतिक और हित-आधारित वैश्विक नीति के रूप में बताने की कोशिश करता है.
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नॉर्वे दौरा काफ़ी चर्चित रहा.
जब वे नॉर्वे के प्रधानमंत्री योनास गार स्टोरे से मीटिंग के बाद जा रहे थे तब वहां की पत्रकार हेला लेंग ने उनसे सवाल पूछा था लेकिन पीएम बिना जवाब दिए आगे बढ़ गए.
सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए वीडियो में पत्रकार हेला लिंग को यह कहते हुए सुना जा सकता है, "प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवालों को क्यों नहीं लेते?"
बाद में हेला लिंग ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा, "भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया. मुझे इसकी उम्मीद भी नहीं थी. वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे पहले स्थान पर है और भारत 157वें स्थान पर है."
इस घटना के बाद भारत में राहुल गांधी और महुआ मोइत्रा समेत कई विपक्षी नेताओं ने पीएम की आलोचना की और सवालों से घबरा जाने का आरोप लगाया तो वहीं भारतीय जनता पार्टी की आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने हेला लेंग के सवालों और बयानों को 'बेसिर-पैर' का बताया.
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